अठरावा अध्याय


||ज्ञानेश्वरी भावार्थदीपिका अध्याय १८ || ||ॐ श्री परमात्मने नमः || अध्याय अठरावा || मोक्षसंन्यासयोगः | जयजय देव निर्मळ| निजजनाखिलमंगळ| जन्मजराजलदजाळ| प्रभंजन ||१|| जयजय देव प्रबळ| विदळितामंगळकुळ| निगमागमद्रुमफळ| फलप्रद ||२|| जयजय देव सकल| विगतविषयवत्सल| कलितकाळकौतूहल| कलातीत ||३|| जयजय देव निश्चळ| चलितचित्तपानतुंदिल| जगदुन्मीलनाविरल| केलिप्रिय ||४|| जयजय देव निष्कळ| स्फुरदमंदानंदबहळ| नित्यनिरस्ताखिलमळ| मूळभूत ||५|| जयजय देव स्वप्रभ| जगदंबुदगर्भनभ| भुवनोद्भवारंभस्तंभ| भवध्वंस ||६|| जयजय देव विशुद्ध| विदुदयोद्यानद्विरद| शमदम- मदनमदभेद| दयार्णव ||७|| जयजय देवैकरूप| अतिकृतकंदर्पसर्पदर्प| भक्तभावभुवनदीप| तापापह ||८|| जयजय देव अद्वितीय| परीणतोपरमैकप्रिय| निजजनजित भजनीय| मायागम्य ||९|| जयजय देव श्रीगुरो| अकल्पनाख्यकल्पतरो| स्वसंविद्रुमबीजप्ररो| हणावनी ||१०|| हे काय एकैक ऐसैसें| नानापरीभाषावशें| स्तोत्र करूं तुजोद्देशें| निर्विशेषा ||११|| जिहींं विशेषणीं विशेषिजे| तें दृश्य नव्हे रूप तुझें| हें जाणें मी म्हणौनि लाजें| वानणा इहीं ||१२|| परी मर्यादेचा सागरु| हा तंवचि तया डगरु| जंव न देखे सुधाकरु| उदया आला ||१३|| सोमकांतु निजनिर्झरींं| चंद्रा अर्घ्यादिक न करी| तें तोचि अवधारीं| करवी कीं जी ||१४|| नेणों कैसी वसंतसंगें| अवचितिया वृक्षाचीं अंगें| फुटती तैं हे तयांहि जोगें| धरणें नोहे ? ||१५|| पद्मिनी रविकिरण| लाहे मग लाजें कवण ? | | कां जळें शिवतलें लवण| आंग भुले ||१६|| तैसा तूतें जेथ मी स्मरें| तेथ मीपण मी विसरें| मग जाकळिला ढेंकरें| तृप्तु जैसा ||१७|| मज तुवां जी केलें तैसें| माझें मीपण दवडूनि देशें| स्तुतिमिषेंच पां पिसें| बांधलें वाचे ||१८|| ना येऱ्हवींं तरी आठवीं| राहोनि स्तुति जैं करावी| तैं गुणागुणिया धरावी| सरोभरी कींंं ||१९|| तरी तूं जी एकरसाचें लिंग| केवीं करूं गुणागुणीं विभाग| मोतीं फोडोनि सांधितां चांग| कीं तैसेंचि भलें ||२०|| आणि बाप तूं माय| इहीं बोलीं ना स्तुति होय| डिंभोपाधिक आहे| विटाळु तेथें ||२१|| जी जालेनि पाइकें आलें| तें गोसावीपण केवीं बोलें ? | ऐसें उपाधी उशिटलें| काय वर्णूं ||२२|| जरी आत्मा तूं एकसरा| हेंही म्हणतां दातारा| तरी आंतुल तूं बाहेरा| घापतासी ||२३|| म्हणौनि सत्यचि तुजलागींं| स्तुति न देखों जी जगीं| मौनावांचूनि लेणें आंगीं| सुसीना मा ||२४|| स्तुति कांहीं न बोलणें| पूजा कांहींं न करणें| सन्निधी कांहींंं न होणें| तुझ्या ठायीं ||२५|| तरी जिंतलें जैसें भुली| पिसें आलापु घाली| तैसें वानूं तें माऊली| उपसाहावें तुवां ||२६|| आतां गीतार्थाची मुक्तमुदी| लावीं माझिये वाग्वृद्धी| जे माने हे सभासदीं | सज्जनांच्या ||२७|| तेथ म्हणितलें श्रीनिवृत्ती| नको हें पुढतपुढती| परीसीं लोहा घृष्टी किती| वेळवेळां कीजे गा ||२८|| तंव विनवी ज्ञानदेवो| म्हणे हो कां जी पसावो| तरी अवधान देतु देवो| ग्रंथा आतां ||२९|| जी गीतारत्नप्रासादाचा| कळसु अर्थचिंतामणीचा| सर्व गीतादर्शनाचा| पाढ्ॐ जो ||३०|| लोकीं तरी आथी ऐसें| जे दुरूनि कळसु दिसे| आणी भेटीचि हातवसे| देवतेची तिये ||३१|| तैसेंचि एथही आहे| जे एकेचि येणें अध्यायें| आघवाचि दृष्ट होये| गीतागमु हा ||३२|| मी कळसु याचि कारणें| अठरावा अध्यायो म्हणें| उवाइला बादरायणें| गीताप्रासादा ||३३|| नोहे कळसापरतें कांहीं| प्रासादीं काम नाहीं| तें सांगतसे गीता ही| संपलेपणें ||३४|| व्यासु सहजें सूत्री बळी| तेणें निगमरत्नाचळीं| उपनिषदार्थाची माळी- | माजीं खांडिली ||३५|| तेथ त्रिवर्गाचा अणुआरु| आडऊ निघाला जो अपारु| तो महाभारतप्राकारु| भोंवता केला ||३६|| माजीं आत्मज्ञानाचें एकवट| दळवाडें झाडूनि चोखट| घडिलें पार्थवैकुंठ- | संवाद कुसरी ||३७|| निवृत्तिसूत्र सोडवणिया| सर्व शास्त्रार्थ पुरवणिया| आवो साधिला मांडणिया| मोक्षरेखेचा ||३८|| ऐसेनि करितां उभारा| पंधरा अध्यायांत पंधरा| भूमि निर्वाळलिया पुरा| प्रासादु जाहला ||३९|| उपरी सोळावा अध्यायो| तो ग्रीवघंटेचा आवो| सप्तदशु तोचि ठावो| पडघाणिये ||४०|| तयाहीवरी अष्टादशु| तो अपैसा मांडला कळसु| उपरि गीतादिकीं व्यासु| ध्वजें लागला ||४१|| म्हणौनि मागील जे अध्याये| ते चढते भूमीचे आये| तयांचें पुरें दाविताहे| आपुल्या आंगीं ||४२|| जालया कामा नाहीं चोरी| ते कळसें होय उजरी| तेवींं अष्टादशु विवरी| साद्यंत गीता ||४३|| ऐसा व्यासें विंदाणियें| गीताप्रासादु सोडवणिये| आणूनि राखिले प्राणिये| नानापरी ||४४|| एक प्रदक्षिणा जपाचिया| बाहेरोनि करिती यया| एक ते श्रवणमिषें छाया| सेविती ययाची ||४५|| एक ते अवधानाचा पुरा| विडापाऊड भीतरां| घेऊनि रिघती गाभारां| अर्थज्ञानाच्या ||४६|| ते निजबोधें उराउरी| भेटती आत्मया श्रीहरी| परी मोक्षप्रासादीं सरी| सर्वांही आथी ||४७|| समर्थाचिये पंक्तिभोजनें| तळिल्या वरील्या एकचि पक्वान्नें| तेवीं श्रवणें अर्थें पठणें| मोक्षुचि लाभे ||४८|| ऐसा गीता वैष्णवप्रासादु| अठरावा अध्याय कळसु विशदु| म्यां म्हणितला हा भेदु| जाणोनियां ||४९|| आतां सप्तदशापाठीं | अध्याय कैसेनि उठी| तो संबंधु सांगो दिठी| दिसे तैसा ||५०|| का गंगायमुना उदक| वोघबगें वेगळिक| दावी होऊनि एक| पाणीपणें ||५१|| न मोडितां दोन्ही आकार| घडिलें एक शरीर| हें अर्धनारी नटेश्वर- | रूपीं दिसें ||५२|| नाना वाढिली दिवसें| कळा बिंबीं पैसे| परी सिनानें लेवे जैसें| चंद्रीं नाहीं ||५३|| तैसींं सिनानीं चारीं पदें| श्लोक तो श्लोकावच्छेदें| अध्यावो अध्यायभेदें| गमे कीर ||५४|| परी प्रमेयाची उजरी| आनान रूप न धरी| नाना रत्नमणीं दोरी| एकचि जैसी ||५५|| मोतियें मिळोनि बहुवें| एकावळीचा पाडु आहे| परी शोभे रूप होये| एकचि तेथ ||५६|| फुलांफुलसरां लेख चढे| द्रुतीं दुजी अंगुळी न पडे| श्लोक अध्याय तेणें पाडें| जाणावे हे ||५७|| सात शतें श्लोक| अध्यायां अठरांचे लेख| परी देवो बोलिले एक| जें दुजें नाहीं ||५८|| आणि म्यांही न सांडूनि ते सोये| ग्रंथ व्यक्ति केली आहे| प्रस्तुत तेणें निर्वाहे| निरूपण आइका ||५९|| तरी सतरावा अध्यावो| पावतां पुरता ठावो| जें संपतां श्लोकीं देवो| बोलिले ऐसें ||६०|| अर्जुना ब्रह्मनामाच्याविखीं. बुद्धि सांडूनि आस्तिकीं| कर्मे कीजती तितुकींंंं| असंतें होतीं ||६१|| हा ऐकोनि देवाचा बोलु| अर्जुना आला डोलु| म्हणे कर्मनिष्ठां मळु| ठेविला देखों ||६२|| तो अज्ञानांधु तंव बापुडा| ईश्वरुचि न देखे एवढा| तेथ नामचि एक पुढां| कां सुझे तया ||६३|| आणि रजतमें दोन्हीं| गेलियावीण श्रद्धा सानी| ते कां लागे अभिधानीं| ब्रह्माचिये ? ||६४|| मग कोता खेंव देणें| वार्तेवरील धावणें| सांडी पडे खेळणें| नागिणीचें तें ||६५|| तैसीं कर्में दुवाडें| तयां जन्मांतराची कडे| दुर्मेळावे येवढे| कर्मामाजीं ||६६|| ना विपायें हें उजू होये| तरी ज्ञानाची योग्यता लाहे| येऱ्हवीं येणेंचि जाये| निरयालया ||६७|| कर्मीं हा ठायवरी| आहाती बहुवा अवसरी| आतां कर्मठां कैं वारी| मोक्षाची हे ||६८|| तरी फिटो कर्माचा पांगु| कीजो अवघाचि त्यागु| आदरिजो अव्यंगु| संन्यासु हा ||६९|| कर्मबाधेची कहीं| जेथ भयाची गोठी नाहीं| तें आत्मज्ञान जिहीं| स्वाधीन होय ||७०|| ज्ञानाचें आवाहनमंत्र| जें ज्ञान पिकतें सुक्षेत्र| ज्ञान आकर्षितें सूत्र| तंतु जे का ||७१|| ते दोनी संन्यास त्याग| अनुष्ठूनि सुटे जग| तरी हेंचि आतां चांग| व्यक्त पुसों ||७२|| ऐसें म्हणौनि पार्थें| त्यागसंन्यासव्यवस्थे| रूप होआवया जेथें| प्रश्नु केला ||७३|| तेथ प्रत्युत्तरें बोली| श्रीकृष्णें जे चावळिली| तया व्यक्ति जाली| अष्टादशा ||७४|| एवं जन्यजनकभावें| अध्यावो अध्यायातें प्रसवे| आतां ऐका बरवें| पुसिलें जें ||७५|| तरी पंडुकुमरें तेणें| देवाचें सरतें बोलणें| जाणोनि अंतःकरणें| काणी घेतली ||७६|| येऱ्हवीं तत्वविषयीं भला| तो निश्चितु असे कीर जाहला| परी देवो राहे उगला| तें साहावेना ||७७|| वत्स धालयाही वरी| धेनू न वचावी दुरी| अनन्य प्रीतीची परी| ऐसी आहे ||७८|| तेणें काजेवीणही बोलावें| तें देखीलें तरी पाहावें| भोगितां चाड दुणावे| पढियंतयाठायीं ||७९|| ऐसी प्रेमाची हे जाती| आणि पार्थ तंव तेचि मूर्ती| म्हणौनि करूं लाहे खंती| उगेपणाची ||८०|| आणि संवादाचेनि मिषें| जे अव्यवहारी वस्तु असे | ते भोगिजे कीं जैसें| आरिसां रूप ||८१|| मग संवादु तोही पारुखे| तरी भोगितां भोगणें थोके| हें कां साहवेल सुखें| लांचावलेया ? ||८२|| यालागीं त्याग संन्यास| पुसावयाचें घेऊनि मिस| मग उपलविलें दुस| गीतेंचें तें ||८३|| अठरावा अध्यावो नोहे| हे एकाध्यायी गीताचि आहे| जैं वांसरुचि गाय दुहे | तैं वेळु कायसा ||८४|| तैसी संपतां अवसरीं| गीता आदरविली माघारीं| स्वामी भृत्याचा न करी| संवादु काई ? ||८५|| परी हें असो ऐसें| अर्जुनें पुसिजत असे | म्हणे विनंती विश्वेशें| अवधारिजो ||८६|| अर्जुन उवाच | संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् | त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन ||१|| हां जी संन्यासु आणि त्यागु| इयां दोहीं एक अर्थीं लागु| जैसा सांघातु आणि संघु| संघातेंचि बोलिजे ||८७|| तैसेंचि त्यागें आणि संन्यासें| त्यागुचि बोलिजतु असे| | आमचेनि तंव मानसें| जाणिजे हेंचि ||८८|| ना कांहीं आथी अर्थभेदु| तो देवो करोतु विशदु| तेथ म्हणती श्रीमुकुंदु| भिन्नचि पैं ||८९|| तरी अर्जुना तुझ्या मनीं| त्याग संन्यास दोनी| एकार्थ गमलें हें मानीं| मीही साच ||९०|| इहीं दोहीं कीर शब्दीं| त्यागुचि बोलिजे त्रिशुद्धी| परी कारण एथ भेदीं| येतुलेंचि ||९१|| जें निपटूनि कर्म सांडिजे| तें सांडणें संन्यासु म्हणिजे| आणि फलमात्र का त्यजिजे| तो त्यागु गा ||९२|| तरी कोणा कर्माचें फळ| सांडिजे कोण कर्म केवळ| हेंही सांगों विवळ| चित्त दे पां ||९३|| तरी आपैसीं दांगें डोंगर| झाडें डाळती अपार| तैसें लांबे राजागर| नुठिती ते ||९४|| न पेरितां सैंघ तृणें| उठती तैसें साळीचें होणें| नाहीं गा राबाउणें| जियापरी ||९५|| कां अंग जाहलें सहजें| परी लेणें उद्यमें कीजे| नदी आपैसी आपादिजे| विहिरी जेवीं ||९६|| तैसें नित्य नैमित्तिक| कर्म होय स्वाभाविक| परी न कामितां कामिक| न निफजे जें ||९७|| श्रीभगवानुवाच | काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः | सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ||२|| कां कामनेचेनि दळवाडें| जें उभारावया घडे| अश्वमेधादिक फुडे| याग जेथ ||९८|| वापी कूप आराम| अग्रहारें हन महाग्राम| आणीकही नाना संभ्रम| व्रतांचे ते ||९९|| ऐसें इष्टापूर्त सकळ| जया कामना एक मूळ| जें केलें भोगवी फळ| बांधोनियां ||१००|| देहाचिया गांवा अलिया| जन्ममृत्यूचिया सोहळिया| ना म्हणों नये धनंजया| जियापरी ||१०१|| का ललाटींचें लिहिलें| न मोडे गा कांहीं केलें| काळेगोरेपण धुतलें| फिटों नेणे ||१०२|| केलें काम्य कर्म तैसें| फळ भोगावया धरणें बैसे| न फेडितां ऋण जैसें| वोसंडीना ||१०३|| कां कामनाही न करितां| अवसांत घडे पंडुसुता| तरी वायकांडें न झुंजतां| लागे जैसें ||१०४|| गूळ नेणतां तोंडीं| घातला देचि गोडी| आगी मानूनि राखोंडी| चेपिला पोळी ||१०५|| काम्यकर्मी हें एक| सामर्थ्य आथी स्वाभाविक| म्हणौनि नको कौतुक| मुमुक्षु एथ ||१०६|| किंबहुना पार्था ऐसें| जें काम्य कर्म गा असे | तें त्यजिजे विष जैसें| वोकूनियां ||१०७|| मग तया त्यागातें जगीं| संन्यासु ऐसया भंगीं| बोलिजे अंतरंगीं| सर्वद्रष्टा ||१०८|| हें काम्य कर्म सांडणें| तें कामनेतेंचि उपडणें| द्रव्यत्यागें दवडणें| भय जैसें ||१०९|| आणि सोमसूर्यग्रहणें| येऊनि करविती पार्वणें| का मातापितरमरणें| अंकित जे दिवस ||११०|| अथवा अतिथी हन पावे| हें ऐसैसें पडे जैं करावें| तैं तें कर्म जाणावें| नौमित्तिक गा ||१११|| वार्षिया क्षोमे गगन| वसंतें दुणावे वन| देहा श्रृंगारी यौवन- | दशा जैसी ||११२|| का सोमकांतु सोमें पघळें | सूर्यें फांकती कमळें| एथ असे तेंचि पाल्हाळे | आन नये ||११३|| तैसें नित्य जें का कर्म| तेंचि निमित्ताचे लाहे नियम| एथ उंचावे तेणें नाम| नैमित्तिक होय ||११४|| आणि सायंप्रातर्मध्यान्हीं| जें कां करणीय प्रतिदिनीं| परी दृष्टि जैसी लोचनीं| अधिक नोहे ||११५|| कां नापादितां गती| चरणीं जैसी आथी| नातरी ते दीप्ती| दीपबिंबीं ||११६|| वासु नेदितां जैसे| चंदनीं सौरभ्य असे | अधिकाराचे तैसें| रूपचि जें ||११७|| नित्य कर्म ऐसें जनीं| पार्था बोलिजे तें मानीं| एवं नित्य नैमित्तिक दोन्हीं| दाविलीं तुज ||११८|| हेंचि नित्य नैमित्तिक| अनुष्ठेय आवश्यक| म्हणौनि म्हणोंं पाहती एक| वांझ ययातें ||११९|| परी भोजनीं जैसें होये| तृप्ति लाहे भूक जाये| तैसे नित्यनैमित्तिकीं आहे| सर्वांगीं फळ ||१२०|| कीड आगिठां पडे| तरी मळु तुटे वानी चढे| यया कर्मा तया सांगडें| फळ जाणावें ||१२१|| जे प्रत्यवाय तंव गळे| स्वाधिकार बहुवें उजळे| तेथ हातोफळिया मिळे| सद्गतीसी ||१२२|| येवढेवरी ढिसाळ| नित्यनैमित्तिकीं आहे फळ| परी तें त्यजिजे मूळ| नक्षत्रीं जैसें ||१२३|| लता पिके आघवी| तंव च्यूत बांधे पालवीं| मग हात न लावित माधवीं| सोडूनि घाली ||१२४|| तैसी नोलांडितां कर्मरेखा| चित्त दीजे नित्यनैमित्तिका| पाठीं फळा कीजे अशेखा| वांताचे वानी ||१२५|| यया कर्म फळत्यागातें| त्यागु म्हणती पैं जाणते| एवं त्याग संन्यास तूतें| परीसविले ||१२६|| हा संन्यासु जैं संभवे| तैं काम्य बाधूं न पावे| निषिद्ध तंव स्वभावें| निषेधें गेलें ||१२७|| आणि नित्यादिक जें असे | तें येणें फलत्यागें नसे| शिर लोटलिया जैसें| येर आंग ||१२८|| मग सस्य फळपाकांत| तैसें निमालिया कर्मजात| आत्मज्ञान गिंवसीत| अपैसें ये ||१२९|| ऐसिया निगुती दोनी| त्याग संन्यास अनुष्ठानीं| पडले गा आत्मज्ञानीं | बांधती पाटु ||१३०|| नातरी हे निगुती चुके| मग त्यागु कीजे हाततुकें| तैं कांहीं न त्यजे अधिकें| गोंवींचि पडे ||१३१|| जें औषध व्याधी अनोळख| तें घेतलिया परतें विख| कां अन्न न मानितां भूक| मारी ना काय ? ||१३२|| म्हणौनि त्याज्य जें नोहे| तेथ त्यागातें न सुवावें| त्याज्यालागीं नोहावें| लोभापर ||१३३|| चुकलिया त्यागाचें वेझें| केला सर्वत्यागुही होय वोझें| न देखती सर्वत्र दुजें| वीतराग ते ||१३४|| त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः | यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे ||३|| एकां फळाभिलाष न ठके| ते कर्मांते म्हणती बंधकें| जैसें आपण नग्न भांडकें| जगातें म्हणे ||१३५|| कां जिव्हालंपट रोगिया| अन्नें दूषी धनंजया| आंगा न रुसे कोढिया| मासियां कोपे ||१३६|| तैसे फळकाम दुर्बळ| म्हणती कर्मचि किडाळ| मग निर्णयो देती केवळ| त्यजावें ऐसा ||१३७|| एक म्हणती यागादिक| करावेंचि आवश्यक| जे यावांचूनि शोधक| आन नसे ||१३८|| मनशुद्धीच्या मार्गीं| जैं विजयी व्हावें वेगीं| तैं कर्म सबळालागीं | आळसु न कीजे ||१३९|| भांगार आथी शोधावें| तरी आगी जेवी नुबगावें| कां दर्पणालागीं सांचावें| अधिक रज ||१४०|| नाना वस्त्रें चोख होआवीं| ऐसें आथी जरी जीवीं| तरी संवदणी न मनावी| मलिन जैसी ||१४१|| तैसीं कर्में क्लेशकारें| म्हणौनि न न्यावीं अव्हेरें| कां अन्नलाभें अरुवारें| रांधितिये उणें ||१४२|| इहीं इहीं गा शब्दीं| एक कर्मीं बांधिती बुद्धी| ऐसा त्यागु विसंवादीं| पडोनि ठेला ||१४३|| तरी विसंवादु तो फिटे| त्यागाचा निश्चयो भेटे| तैसें बोलों गोमटें| अवधान देईं ||१४४|| निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम | त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः ||४|| तरी त्यागु एथें पांडवा| त्रिविधु पैं जाणावा| तया त्रिविधाही बरवा| विभाग करूं ||१४५|| त्यागाचे तीन्ही प्रकार| कीजती जरी गोचर| तरी तूं इत्यर्थाचें सार| इतुलें जाण ||१४६|| मज सर्वज्ञाचिये बुद्धी| जें अलोट माने त्रिशुद्धी| निश्चयतत्व तें आधीं| अवधारीं पां ||१४७|| तरी आपुलिये सोडवणें| जो मुमुक्षु जागों म्हणे| तया सर्वस्वें करणें| हेंचि एक ||१४८|| यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् | यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ||५|| जियें यज्ञदानतपादिकें| इयें कर्में आवश्यकें| तियें न सांडावीं पांथिकें| पाउलें जैसीं ||१४९|| हारपलें न देखिजे| तंव तयाचा मागु न सांडिजे| कां तृप्त न होतां न लोटिजे| भाणें जेवीं ||१५०|| नाव थडी न पवतां| न खांडिजे केळी न फळतां| कां ठेविलें न दिसतां| दीपु जैसा ||१५१|| तैसी आत्मज्ञानविखीं| जंव निश्चिती नाहीं निकी| तंव नोहावें यागादिकीं| उदासीन ||१५२|| तरी स्वाधिकारानुरुपें| तियें यज्ञदानें तपें| अनुष्ठावींचि साक्षेपें| अधिकेंवर ||१५३|| जें चालणें वेगावत जाये| तो वेगु बैसावयाचि होये| तैसा कर्मातिशयो आहे| नैष्कर्म्यालागीं ||१५४|| अधिकें जंव जंव औषधी| सेवनेची मांडी बांधी| तंव तंव मुकिजे व्याधी| तयाचिये ||१५५|| तैसीं कर्में हातोपातीं| जैं कीजती यथानिगुती| तैं रजतमें झडती| झाडा देऊनी ||१५६|| कां पाठोवाटीं पुटें| भांगारा खारु देणें घटे| तैं कीड झडकरी तुटे| निर्व्याजु होय ||१५७|| तैसें निष्ठा केलें कर्म| तें झाडी करूनि रजतम| सत्वशुद्धीचें धाम| डोळां दावी ||१५८|| म्हणौनियां धनंजया| सत्वशुद्धी गिंवसितया| तीर्थांचिया सावाया| आलीं कर्में ||१५९|| तीर्थें बाह्यमळु क्षाळे| कर्में अभ्यंतर उजळे| एवं तीर्थें जाण निर्मळें| सत्कर्मेॅहि ||१६०|| तृषार्ता मरुदेशीं| झळे अमृतें वोळलीं जैसींं| कीं अंधालागीं डोळ्यांसी| सूर्यु आला ||१६१|| बुडतया नदीच धाविन्नली| पडतया पृथ्वीच कळवळिली| निमतया मृत्यूनें दिधली| आयुष्यवृद्धी ||१६२|| तैसें कर्में कर्मबद्धता| मुमुक्षु सोडविले पंडुसुता| जैसा रसरीति मरतां| राखिला विषें ||१६३|| तैसीं एके हातवटिया| कर्में कीजती धनंजया| बंधकेंचि सोडवावया| मुख्यें होती ||१६४|| आतां तेचि हातवटी| तुज सांगों गोमटी| जया कर्मातें किरीटी| कर्मचि रुसे ||१६५|| एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च | कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् ||६|| तरी महायागप्रमुखें| कर्मे निफजतांही अचुकें| कर्तेपणाचें न ठाके| फुंजणें आंगीं ||१६६|| जो मोलें तीर्था जाये| तया मी यात्रा करितु आहे| ऐसिये श्लाघ्यतेचा नोहे| तोषु जेवीं ||१६७|| कां मुद्रा समर्थाचिया| जो एकवटु झोंबे राया| तो मी जिणता ऐसिया| न येचि गर्वा ||१६८|| जो कासें लागोनि तरे| तया पोहती ऊर्मी नुरे| पुरोहितु नाविष्करे| दातेपणें ||१६९|| तैसें कर्तृत्व अहंकारें| नेघोनि यथा अवसरें| कृत्यजातांचें मोहरें| सारीजती ||१७०|| केल्या कर्मा पांडवा| जो आथी फळाचा यावा| तया मोहरा हों नेदावा| मनोरथु ||१७१|| आधींचि फळीं आस तुटिया| कर्मे आरंभावीं धनंजया| परावें बाळ धाया| पाहिजे जैसें ||१७२|| पिंपरुवांचिया आशा| न शिंपिजे पिंपळु जैसा| तैसिया फळनिराशा| कीजती कर्में ||१७३|| सांडूनि दुधाची टकळी| गोंवारी गांवधेनु वेंटाळी| किंबहुना कर्मफळीं| तैसें कीजे ||१७४|| ऐसी हे हातवटी| घेऊनि जे क्रिया उठी| आपणा आपुलिया गांठी| लाहेची तो ||१७५|| म्हणौनि फळीं लागु| सांडोनि देहसंगु| कर्में करावीं हा चांगु| निरोपु माझा ||१७६|| जो जीवबंधेएं शिणला| सुटके जाचे आपला| तेणें पुढतपुढतीं या बोला| आन न कीजे ||१७७|| नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते | मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः ||७|| नातरी आंधाराचेनि रोखें| जैसीं डोळां रोंविजती नखें| तैसा कर्मद्वेषें अशेखें| कर्मेंचि सांडी ||१७८|| तयाचें जें कर्म सांडणें| तें तामस पैं मी म्हणें| शिसाराचे रागें लोटणें| शिरचि जैसें ||१७९|| हां गा मार्गु दुवाडु होये| तरी निस्तरितील पाये| कीं तेचि खांडणें आहे| मार्गापराधें ||१८०|| भुकेलियापुढें अन्न| हो कां भलतैसें उन्ह| तरी बुद्धी न घेतां लंघन| भाणें पापरां हल्या ||१८१|| तैसा कर्माचा बाधु कर्में| निस्तरीजे करितेनि वर्में| हे तामसु नेणें भ्रमें| माजविला ||१८२|| कीं स्वभावें आलें विभागा| तें कर्मचि वोसंडी पैं गा| तरी झणें आतळा त्यागा| तामसा तया ||१८३|| दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् | स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् ||८|| अथवा स्वाधिकारु बुझे| आपले विहितही सुजे| परी करितया उमजे| निबरपणा ||१८४|| जे कर्माची ऐलीकड| नावेक दिसे दुवाड| जे वाहतिये वेळे जड| शिदोरी जैसी ||१८५|| जैसा निंब जिभे कडवटु| हिरडा पहिलें तुरटु| तैसा कर्मा ऐल शेवटु| खणुवाळा होय ||१८६|| कां धेनु दुवाड शिंग| शेवंतीये अडव आंग| भोजनसुख महाग| पाकु करितां ||१८७|| तैसें पुढतपुढती कर्म | आरंभींच अति विषम| म्हणौनि तो तें श्रम| करितां मानी ||१८८|| येऱ्हवीं विहितत्वें मांडी| परी घालितां असुरवाडीं| तेथ पोळला ऐसा सांडी| आदरिलेंही ||१८९|| म्हणे वस्तु देहासारिखी| आली बहुतीं भाग्यविशेखीं| मा जाचूं कां कर्मादिकीं| पापिया जैसा ? ||१९०|| केलें कर्मीं जे द्यावें| तें झणें मज होआवें| आजि भोगूं ना कां बरवे| हातींचे भोग ? ||१९१|| ऐसा शरीराचिया क्लेशा| भेणें कर्में वीरेशा| सांडी तो परीयेसा| राजसु त्यागु ||१९२|| येऱ्हवीं तेथही कर्म सांडे| परी तया त्यागफळ न जोडे| जैसें उतलें आगीं पडे| तें नलगेचि होमा ||१९३|| कां बुडोनि प्राण गेले| ते अर्धोदकीं निमाले| हें म्हणों नये जाहलें| दुर्मरणचि ||१९४|| तैसें देहाचेनि लोभें| जेणें कर्मा पाणी सुभे| तेणें साच न लभे| त्यागाचें फळ ||१९५|| किंबहुना आपुलें| जैं ज्ञान होय उदया आलें| तैं नक्षत्रातें पाहलें| गिळी जैसें ||१९६|| तैशा सकारण क्रिया| हारपती धनंजया| तो कर्मत्यागु ये जया| मोक्षफळासी ||१९७|| तें मोक्षफळ अज्ञाना| त्यागिया नाहीं अर्जुना| म्हणौनि तो त्यागु न माना| राजसु जो ||१९८|| तरी कोणे पां एथ त्यागें| तें मोक्षफळ घर रिघे| हेंही आइक प्रसंगे| बोलिजेल ||१९९|| कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन | सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः ||९|| तरी स्वाधिकाराचेनि नांवें| जें वांटिया आलें स्वभावें| तें आचरे विधिगौरवें| शृंगारोनि ||२००|| परी हें मी करितु असें| ऐसा आठवु त्यजी मानसें| तैसेचि पाणी दे आशे| फळाचिये ||२०१|| पैं अवज्ञा आणि कामना| मातेच्या ठायीं अर्जुना| केलिया दोनी पतना| कारण होती ||२०२|| तरी दोनीं यें त्यजावीं| मग माताची ते भजावी| वांचूनि मुखालागीं वाळावी| गायचि सगळी ? ||२०३|| आवडतियेही फळीं| असारें साली आंठोळीं| त्यासाठीं अवगळी| फळातें कोण्ही ? ||२०४|| तैसा कर्तृत्वाचा मदु| आणि कर्मफळाचा आस्वादु| या दोहींचें नांव बंधु| कर्माचा कीं ||२०५|| तरी या दोहींच्या विखीं| जैसा बापु नातळे लेंकीं | तैसा हों न शके दुःखी| विहिता क्रिया ||२०६|| हा तो त्याग तरुवरु| जो गा मोक्षफळें ये थोरु| सात्विक ऐसा डगरु| यासींच जगीं ||२०७|| आतां जाळूनि बीज जैसें| झाडा कीजे निर्वंशें| फळ त्यागूनि कर्म तैसें| त्यजिलें जेणें ||२०८|| लोह लागतखेंवो परीसीं| धातूची गंधिकाळिमा जैसी| जाती रजतमें तैसीं| तुटलीं दोन्ही ||२०९|| मग सत्वें चोखाळें| उघडती आत्मबोधाचे डोळे| तेथ मृगांबु सांजवेळे| होय जैसें ||२१०|| तैसा बुद्ध्यादिकांपुढां| असतु विश्वाभासु हा येवढा| तो न देखे कवणीकडां| आकाश जैसें ||२११|| न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते | त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः ||१०|| म्हणौनि प्राचिनाचेनि बळें| अलंकृतें कुशलाकुशलें| तियें व्योमाआंगीं आभाळें| जिरालीं जैसीं ||२१२|| तैसीं तयाचिये दिठी| कर्में चोखाळलीं किरीटी. म्हणौनि सुखदुःखीं उठी| पडेना तो ||२१३|| तेणें शुभकर्म जाणावें| मग तें हर्षें करावें| कां अशुभालागीं होआवें| द्वेषिया ना ||२१४|| तरी इयाविषयींचा कांहीं| तया एकुही संदेहो नाहीं| जैसा स्वप्नाच्या ठायीं| जागिन्नलिया ||२१५|| म्हणौनि कर्म आणि कर्ता| या द्वैतभावाची वार्ता| नेणें तो पंडुसुता| सात्विक त्यागु ||२१६|| ऐसेनि कर्में पार्था| त्यजिलीं त्यजिती सर्वथा | अधिकें बांधिती अन्यथा| सांडिलीं तरी ||२१७|| न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः | यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते ||११|| आणि हां गा सव्यसाची| मूर्ति लाहोनि देहाची| खंती करिती कर्माची| ते गांवढे गा ||२१८|| मृत्तिकेचा वीटु| घेऊनि काय करील घटु ? | केउता ताथु पटु| सांडील तो ? ||२१९|| तेवींचि वन्हित्व आंगीं| आणि उबे उबगणें आगी| कीं तो दीपु प्रभेलागीं| द्वेषु करील काई ? ||२२०|| हिंगु त्रासिला घाणी| तरी कैचें सुगंधत्व आणी ? | द्रवपण सांडूनि पाणी | कें राहे तें ? ||२२१|| तैसा शरीराचेनि आभासें| नांदतु जंव असे | तंव कर्मत्यागाचें पिसें| काइसें तरी ? ||२२२|| आपण लाविजे टिळा| म्हणौनि पुसों ये वेळोवेळा| मा घाली फेडी निडळा| कां करूं ये गा ? ||२२३|| तैसें विहित स्वयें आदरिलें| म्हणौनि त्यजूं ये त्यजिलें| परी कर्मचि देह आतलें| तें कां सांडील गा ? ||२२४|| जें श्वासोच्छ्वासवरी| होत निजेलियाहीवरी| कांहीं न करणेंयाचि परी| होती जयाची ||२२५|| या शरीराचेनि मिसकें| कर्मची लागलें असिकें| जितां मेलया न ठाके| इया रीती ||२२६|| यया कर्मातें सांडिती परी| एकीचि ते अवधारीं| जे करितां न जाइजे हारीं| फळशेचिये ||२२७|| कर्मफळ ईश्वरीं अर्पे| तत्प्रसादें बोधु उद्दीपें| तेथ रज्जुज्ञानें लोपे| व्याळशंका ||२२८|| तेणें आत्मबोधें तैसें| अविद्येसीं कर्म नाशे| पार्था त्यजिजे जैं ऐसें| तैं त्यजिलें होय ||२२९|| म्हणौनि इयापरी जगीं| कर्में करितां मानूं त्यागी| येर मुर्छने नांव रोगी| विसांवा जैसा ||२३०|| तैसा कर्मीं शिणे एकीं| तो विसांवो पाहे आणिकीं| दांडेयाचे घाय बुकी| धाडणें जैसें ||२३१|| परी हें असो पुढती| तोचि त्यागी त्रिजगतीं| जेणें फळत्यागें निष्कृती| नेलें कर्म ||२३२|| अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् | भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित् ||१२|| येऱ्हवीं तरी धनंजया| त्रिविधा कर्मफळा गा यया| समर्थ ते कीं भोगावया| जे न सांडितीचि आशा ||२३३|| आपणचि विऊनि दुहिता| कीं न मम म्हणे पिता| तो सुटे कीं प्रतिग्रहीता| जांवई शिरके ||२३४|| विषाचे आगरही वाहती| तें विकितां सुखें लाभे जिती| येर निमालें जे घेती| वेंचोनि मोलें ||२३५|| तैसें कर्ता कर्म करू| अकर्ता फळाशा न धरू| एथ न शके आवरूं| दोहींतें कर्म ||२३६|| वाटे पिकलिया रुखाचें| फळ अपेक्षी तयाचें| तेवीं साधारण कर्माचें| फळ घे तया ||२३७|| परी करूनि फळ नेघे| तो जगाच्या कामीं न रिघे| जे त्रिविध जग अवघें| कर्मफळ हें ||२३८|| देव मनुष्य स्थावर| यया नांव जगडंबर| आणि हे तंव तिन्ही प्रकार| कर्मफळांचे ||२३९|| तेंचि एक गा अनिष्ट| एक तें केवळ इष्ट| आणि एक इष्टानिष्ट| त्रिविध ऐसें ||२४०|| परी विषयमंतीं बुद्धी| आंगीं सूनि अविधी| प्रवर्तती जे निषिद्धीं| कुव्यापारीं ||२४१|| तेथ कृमि कीट लोष्ट| हे देह लाहती निकृष्ट| तया नाम तें अनिष्ट| कर्मफळ ||२४२|| कां स्वधर्मा मानु देतां| स्वाधिकारु पुढां सूतां| सुकृत कीजे पुसतां| आम्नायातें ||२४३|| तैं इंद्रादिक देवांचीं| देहें लाहिजती सव्यसाची| तया कर्मफळा इष्टाची| प्रसिद्धि गा ||२४४|| आणि गोड आंबट मिळे| तेथ रसांतर फरसाळें| उठी दोंही वेगळें| दोहीं जिणतें ||२४५|| रेचकुचि योगवशें| होय स्तंभावयादोषें| तेवीं सत्यासत्य समरसें| सत्यासत्यचि जिणिजे ||२४६|| म्हणौनि समभागें शुभाशुभें| मिळोनि अनुष्ठानाचें उभें. तेणें मनुष्यत्व लाभे| तें मिश्र फळ ||२४७|| ऐसें त्रिविध यया भागीं| कर्मफळ मांडलेसें जगीं| हें न सांडी तयां भोगीं| जें सूदले आशा ||२४८|| जेथें जिव्हेचा हातु फांटे| तंव जेवितां वाटे गोमटें| मग परीणामीं शेवटें| अवश्य मरण ||२४९|| संवचोरमैत्री चांग| जंव न पविजे तें दांग| सामान्या भली आंग| न शिवे तंव ||२५०|| तैसीं कर्में करितां शरीरीं| लाहती महत्त्वाची फरारी| पाठीं निधनीं एकसरी| पावती फळें ||२५१|| तैसा समर्थु आणि ऋणिया| मागों आला बाइणिया| न लोटे तैसा प्राणिया| पडे तो भोगु ||२५२|| मग कणिसौनि कणु झडे| तो विरूढला कणिसा चढे| पुढती भूमी पडे| पुढती उठी ||२५३|| तैसें भोगीं जें फळ होय| तें फळांतरें वीत जाय| चालतां पावो पाय| जिणिजे जैसा ||२५४|| उताराचिये सांगडी| ठाके ते ऐलीच थडी| तेवीं न मुकीजती वोढी| भोग्याचिये ||२५५|| पैं साध्यसाधनप्रकारें| फळभोगु तो पसरे| एवं गोंविले संसारें| अत्यागी ते ||२५६|| येऱ्हवीं जाईचियां फुलां फांकणें| त्याचि नाम जैसें सुकणें| तैसें कर्ममिषें न करणें| केलें जिहीं ||२५७|| बीजचि वरोसि वेंचे| तेथ वाढती कुळवाडी खांचे| तेवीं फळत्यागें कर्माचें| सारिलें काम ||२५८|| ते सत्वशुद्धि साहाकारें| गुरुकृपामृततुषारें| सासिन्नलेनि बोधें वोसरे| द्वैतदैन्य ||२५९|| तेव्हां जगदाभासमिषें| स्फुरे तें त्रिविध फळ नाशे| एथ भोक्ता भोग्य आपैसें| निमालें हें ||२६०|| घडे ज्ञानप्रधानु हा ऐसा| संन्यासु जयां वीरेशा| तेचि फलभोग सोसा| मुकले गा ||२६१|| आणि येणें कीर संन्यासें| जैं आत्मरूपीं दिठी पैसे| तैं कर्म एक ऐसें | देखणें आहे ? ||२६२|| पडोनि गेलिया भिंती| चित्रांची केवळ होय माती| कां पाहालेया राती| आंधारें उरे ? ||२६३|| जैं रूपचि नाहीं उभें| तैं साउली काह्याची शोभे ? | दर्पणेवीण बिंबें| वदन कें पां ? ||२६४|| फिटलिया निद्रेचा ठावो| कैचा स्वप्नासि प्रस्तावो ? | मग साच का वावो| कोण म्हणे ? ||२६५|| तैसें गा संन्यासें येणें| मूळ अविद्येसीचि नाहीं जिणें| मा तियेचें कार्य कोणें| घेपे दीजे ? ||२६६|| म्हणौनि संन्यासी ये पाहीं| कर्माची गोठी कीजेल ख़ई | परी अविद्या आपुलाम् देहीं| आहे जै कां ||२६७|| जैं कर्तेपणाचेनि थांवें| आत्मा शुभाशुभीं धांवें| दृष्टि भेदाचिये राणिवे| रचलीसे जैं ||२६८|| तैं तरी गा सुवर्मा| बिजावळी आत्मया कर्मा| अपाडें जैसी पश्चिमा| पूर्वेसि कां ||२६९|| नातरी आकाशा का आभाळा| सूर्या आणि मृगजळा| बिजावळी भूतळा| वायूसि जैसी ||२७०|| पांघरौनि नईचें उदक| असे नईचिमाजीं खडक| परी जाणिजे का वेगळिक | कोडीची ते ||२७१|| हो कां उदकाजवळी| परी सिनानीचि ते बाबुळी| काय संगास्तव काजळी| दीपु म्हणों ये ? ||२७२|| जरी चंद्रीं जाला कलंकु| तरी चंद्रेसीं नव्हे एकु| आहे दृष्टी डोळ्यां विवेकु| अपाडु जेतुला ||२७३|| नाना वाटा वाटे जातया| वोघा वोघीं वाहातया| आरसा आरसां पाहातया| अपाडु जेतुला ||२७४|| पार्था गा तेतुलेनि मानें| आत्मेंनिसीं कर्म सिनें| परी घेवविजे अज्ञानें| तें कीर ऐसें ||२७५|| विकाशें रवीतें उपजवी| द्रुती अलीकरवी भोगवी| ते सरोवरीं कां बरवी | अब्जिनी जैसी ||२७६|| पुढतपुढती आत्मक्रिया| अन्यकारणकाचि तैशिया| करूं पांचांही तयां| कारणां रूप ||२७७|| पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे | साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम् ||१३|| आणि पांचही कारणें तियें| तूंही जाणसील विपायें| जें शास्त्रें उभऊनी बाहे| बोलती तयांते ||२७८|| वेदरायाचिया राजधानीं| सांख्यवेदांताच्या भुवनीं| निरूपणाच्या निशाणध्वनीं| गर्जती जियें ||२७९|| जें सर्वकर्मसिद्धीलागीं| इयेंचि मुद्दलें हो जगीं| तेथ न सुवावा अभंगीं| आत्मराजु ||२८०|| ह्या बोलाचि डांगुरटी| तियें प्रसिद्धीचि आली किरीटी| म्हणौनि तुझ्या हन कर्णपुटीं| वसों हें काज ||२८१|| आणि मुखांतरीं आइकिजे| तैसें कायसें हें ओझें| मी चिद्रत्न तुझें | असतां हातीं ||२८२|| दर्पणु पुढां मांडलेया| कां लोकांचियां डोळयां| मानु द्यावा पहावया| आपुलें निकें ||२८३|| भक्त जैसेनि जेथ पाहे| तेथ तें तेंचि होत जाये| तो मी तुझें जाहालों आहें| खेळणें आजी ||२८४|| ऐसें हें प्रीतीचेनि वेगें| देवो बोलतां से नेघे| तंव आनंदामाजीं आंगें| विरतसे येरु ||२८५|| चांदिणियाचा पडिभरु| होतां सोमकांताचा डोंगरु| विघरोनि सरोवरु| हों पाहे जैसा ||२८६|| तैसें सुख आणि अनुभूती| या भावांची मोडूनि भिंती| आतलें अर्जुनाकृति| सुखचि जेथ ||२८७|| तेथ समर्थु म्हणौनि देवा| अवकाशु जाहला आठवा| मग बुडतयाचा धांवा| जीवें केला ||२८८|| अर्जुना येसणें धेंडें| प्रज्ञा पसरेंसीं बुडे| आलें भरतें एवढें| तें काढूनि पुढती ||२८९|| देवो म्हणे हां गा पार्था| तूं आपणपें देख सर्वथा| तंव श्वासूनि येरें माथा| तुकियेला ||२९०|| म्हणे जाणसी दातारा| मी तुजशीं व्यक्तिशेजारा| उबगला आजी एकाहारा| येवों पाहें ||२९१|| तयाही हा ऐसा| लोभें देतसां जरी लालसा| तरी कां जी घालीतसां| आड आड जीवा ? ||२९२|| तेथ श्रीकृष्ण म्हणती निकें| अद्यापि नाहीं मा ठाऊकें| वेडया चंद्रा आणि चंद्रिके| न मिळणें आहे ? ||२९३|| आणि हाही बोलोनि भावो| तुज द्ॐ आम्ही भिवों| जे रुसतां बांधे थांवो| तें प्रेम गा हें ||२९४|| एथ एकमेकांचिये खुणें| विसंवादु तंवचि जिणें| म्हणौनि असो हें बोलणें| इयेविषयींचें ||२९५|| मग कैशी कैशी ते आतां | बोलत होतों पंडुसुता| सर्व कर्मा भिन्नता| आत्मेनिसीं ||२९६|| तंव अर्जुन म्हणे देवें| माझिये मनींचेंचि स्वभावें| प्रस्ताविलें बरवें| प्रमेय तें जी ||२९७|| जें सकळ कर्माचें बीज| कारणपंचक तुज| सांगेन ऐसी पैज| घेतली कां ||२९८|| आणि आत्मया एथ कांहीं| सर्वथा लागु नाहीं| हें पुढारलासि ते देईं| लाहाणें माझें ||२९९|| यया बोला विश्वेशें| म्हणितलें तोषें बहुवसे| इयेविषयीं धरणें बैसे. ऐसें कें जोडे ? ||३००|| तरी अर्जुना निरूपिजेल| तें कीर भाषेआंतुल| परी मेचु ये होईजेल| ऋणिया तुज ||३०१|| तंव अर्जुन म्हणे देवो| काई विसरले मागील भावो ? | इये गोंठीस कीं राखत आहों| मीतूंपण जी ? ||३०२|| एथ श्रीकृष्ण म्हणती हो कां| आतां अवधानाचा पसरु निका| करूनियां आइका| पुढारलों तें ||३०३|| तरी सत्यचि गा धनुर्धरा| सर्वकर्मांचा उभारा| होतसे बहिरबाहिरा| करणीं पांचें ||३०४|| आणि पांच कारण दळवाडें| जिहीं कर्माकारु मांडे| ते हेतुस्तव घडे| पांच आथी ||३०५|| येर आत्मतत्त्व उदासीन| तें ना हेतु ना उपादान| ना ते अंगें करी संवाहन| कर्मसिद्धीचें ||३०६|| तेथ शुभाशुभीं अंशीं| निफजती कर्में ऐसीं| राती दिवो आकाशीं| जियापरी ||३०७|| तोय तेज धूमु| ययां वायूसीं संगमु| जालिया होय अभ्रागमु| व्योम तें नेणें ||३०८|| नाना काष्ठीं नाव मिळे| ते नावाडेनि चळे| चालविजे अनिळें| उदक तें साक्षी ||३०९|| कां कवणे एकें पिंडे| वेंचितां अवतरे भांडें| मग भवंडीजे दंडें| भ्रमे चक्र ||३१०|| आणि कर्तृत्व कुलालाचें| तेथ काय तें पृथ्वीयेचें| आधारावांचूनि वेंचे| विचारीं पां ||३११|| हेंहि असो लोकांचिया| राहाटी होतां आघविया| कोण काम सवितया| आंगा आलें ? ||३१२|| तैसें पांचहेतुमिळणीं| पांचेंचि इहीं कारणीं| कीजे कर्मलतांची लावणी| आत्मा सिना ||३१३|| आतां तेंचि वेगळालीं| पांचही विवंचूं गा भलीं| तुकोनि घेतलीं| मोतियें जैसीं ||३१४|| अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् | विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् ||१४|| तैसीं यथा लक्षणें| आइकें कर्म- कारणें| तरी देह हें मी म्हणें| पहिलें एथ ||३१५|| ययातें अधिष्ठान ऐसें| म्हणिजे तें याचि उद्देशें| जे स्वभोग्येंसीं वसे| भोक्ता येथ ||३१६|| इंद्रियांच्या दाहें हातीं| जाचोनियां दिवोराती| सुखदुःखें प्रकृती| जोडीजती जियें ||३१७|| तियें भोगावया पुरुखा| आन ठावोचि नाहीं देखा| म्हणौनि अधिष्ठानभाखा| बोलिजे देह ||३१८|| हें चोविसांही तत्वांचें| कुटुंबघर वस्तीचें| तुटे बंधमोक्षाचें| गुंथाडे एथ ||३१९|| किंबहुना अवस्थात्रया| हें अधिष्ठान धनंजया| म्हणौनि देहा यया| हेंचि नाम ||३२०|| आणि कर्ता हें दुजें| कर्माचें कारण जाणिजे| प्रतिबिंब म्हणिजे| चैतन्याचें जें ||३२१|| आकाशचि वर्षे नीर| तें तळवटीं बांधे नाडर| मग बिंबोनि तदाकार| होय जेवीं ||३२२|| कां निद्राभरें बहुवें| राया आपणपें ठाउवें नव्हे| मग स्वप्नींचिये सामावे| रंकपणीं ||३२३|| तैसें आपुलेनि विसरें| चैतन्यचि देहाकारें| आभासोनि आविष्करें| देहपणें जें ||३२४|| जया विसराच्या देशीं| प्रसिद्धि गा जीवु ऐसी| जेणें भाष केली देहेंसी| आघवाविषयीं ||३२५|| प्रकृति करी कर्में| तीं म्यां केलीं म्हणे भ्रमें| येथ कर्ता येणें नामें| बोलिजे जीवु ||३२६|| मग पातेयांच्या केशीं| एकीच उठी दिठी जैसी| मोकळी चवरी ऐसी| चिरीव गमे ||३२७|| कां घराआंतुल एकु| दीपाचा तो अवलोकु| गवाक्षभेदें अनेकु| आवडे जेवीं ||३२८|| कां एकुचि पुरुषु जैसा| अनुसरत नवां रसां| नवविधु ऐसा| आवडों लागे ||३२९|| तेवीं बुद्धीचें एक जाणणें| श्रोत्रादिभेदें येणें| बाहेरी इंद्रियपणें| फांके जें कां ||३३०|| तें पृथग्विध करण| कर्माचें इया कारण| तिसरें गा जाण| नृपनंदना ||३३१|| आणि पूर्वपश्चिमवाहणीं| निघालिया वोघाचिया मिळणी| होय नदी नद पाणी| एकचि जेवीं ||३३२|| तैसी क्रियाशक्ति पवनीं| असे जे अनपायिनी| ते पडिली नानास्थानीं| नाना होय ||३३३|| जैं वाचे करी येणें| तैं तेंचि होय बोलणें| हाता आली तरी घेणें| देणें होय ||३३४|| अगा चरणाच्या ठायीं| तरी गति तेचि पाहीं| अधोद्वारीं दोहीं| क्षरणें तेचि ||३३५|| कंदौनि हृदयवरी| प्रणवाची उजरी| करितां तेचि शरीरीं| प्राणु म्हणिजे ||३३६|| मग उर्ध्वींचिया रिगानिगा| पुढती तेचि शक्ति पैं गा| उदानु ऐसिया लिंगा| पात्र जाहली ||३३७|| अधोरंध्राचेनि वाहें| अपानु हें नाम लाहे| व्यापकपणें होये| व्यानु तेचि ||३३८|| आरोगिलेनि रसें| शरीर भरी सरिसें| आणि न सांडितां असे | सर्वसंधीं ||३३९|| ऐसिया इया राहटीं| मग तेचि क्रिया पाठीं| समान ऐसी किरीटी| बोलिजे गा ||३४०|| आणि जांभई शिंक ढेंकर| ऐसैसा होतसे व्यापार| नाग कूर्म कृकर| इत्यादि होय ||३४१|| एवं वायूची हे चेष्टा| एकीचि परी सुभटा| वर्तनास्तव पालटा| येतसे जे ||३४२|| तें भेदली वृत्तिपंथें| वायुशक्ति गा एथें| कर्मकारण चौथें| ऐसें जाण ||३४३|| आणि ऋतु बरवा शारदु| शारदीं पुढती चांदु| चंद्री जैसा संबंधु| पूर्णिमेचा ||३४४|| कां वसंतीं बरवा आरामु| आरामींही प्रियसंगमु | संगमीं आगमु. उपचारांचा ||३४५|| नाना कमळीं पांडवा| विकासु जैसा बरवा| विकासींही यावा| परागाचा ||३४६|| वाचे बरवें कवित्व| कवित्वीं बरवें रसिकत्व| रसिकत्वीं परतत्व| स्पर्शु जैसा ||३४७|| तैसी सर्ववृत्तिवैभवीं| बुद्धिचि एकली बरवी| बुद्धिही बरव नवी| इंद्रियप्रौढी ||३४८|| इंद्रियप्रौढीमंडळा| शृंगारु एकुचि निर्मळा| जैं अधिष्ठात्रियां कां मेळा| देवतांचा जो ||३४९|| म्हणौनि चक्षुरादिकीं दाहें| इंद्रियां पाठीं स्वानुग्रहें| सूर्यादिकां कां आहे| सुरांचें वृंद ||३५०|| तें देववृंद बरवें| कर्मकारण पांचवें| अर्जुना एथ जाणावें| देवो म्हणे ||३५१|| एवं माने तुझिये आयणी| तैसी कर्मजातांची हे खाणी| पंचविध आकर्णीं| निरूपिली ||३५२|| आतां हेचि खाणी वाढे| मग कर्माची सृष्टि घडे| जिहीं ते हेतुही उघडे| द्ॐ पांचै ||३५३|| शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः | न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः ||१५|| तरी अवसांत आली माधवी| ते हेतु होय नवपल्लवीं| पल्लव पुष्पपुंज दावी| पुष्प फळातें ||३५४|| कां वार्षिये आणिजे मेघु| मेघें वृष्टिप्रसंगु| वृष्टीस्तव भोगु| सस्यसुखाचा ||३५५|| नातरी प्राची अरुणातें विये| अरुणें सूर्योदयो होये| सूर्यें सगळा पाहे| दिवो जैसा ||३५६|| तैसें मन हेतु पांडवा| होय कर्मसंकल्पभावा| तो संकल्पु लावी दिवा| वाचेचा गा ||३५७|| मग वाचेचा तो दिवटा| दावी कृत्यजातांचिया वाटा| तेव्हां कर्ता रिगे कामठां | कर्तृत्वाच्या ||३५८|| तेथ शरीरादिक दळवाडें| शरीरादिकां हेतुचि घडे| लोहकाम लोखंडें| निर्वाळिजे जैसें ||३५९|| कां तांथुवाचा ताणा| तांथु घालितां वैरणा| तो तंतुचि विचक्षणा| होय पटु ||३६०|| तैसें मनवाचादेहाचें| कर्म मनादि हेतुचि रचे| रत्नीं घडे रत्नाचें| दळवाडें जेवीं ||३६१|| एथ शरीरादिकें कारणें| तेंचि हेतु केवीं हें कोणें| अपेक्षिजे तरी तेणें| अवधारिजो ||३६२|| आइका सूर्याचिया प्रकाशा| हेतु कारण सूर्युचि जैसा| कां ऊंसाचें कांडें ऊंसा| वाढी हेतु ||३६३|| नाना वाग्देवता वानावी| तैं वाचाचि लागे कामवावी| कां वेदां वेदेंचि बोलावी| प्रतिष्ठा जेवीं ||३६४|| तैसें कर्मा शरीरादिकें| कारण हें कीर ठाउकें| परी हेंचि हेतु न चुके| हेंही एथ ||३६५|| आणि देहादिकीं कारणीं| देहादि हेतु मिळणीं| होय जया उभारणी| कर्मजातां ||३६६|| तें शास्त्रार्थेंं मानिलेया| मार्गा अनुसरे धनंजया| तरी न्याय तो न्याया| हेतु होय ||३६७|| जैसा पर्जन्योदकाचा लोटु| विपायें धरी साळीचा पाटु| तो जिरे परी अचाटु| उपयोगु आथी ||३६८|| कां रोषें निघालें अवचटें| पडिलें द्वारकेचिया वाटे | तें शिणे परी सुनाटें| न वचिती पदें ||३६९|| तैसें हेतुकारण मेळें| उठी कर्म जें आंधळें| तें शास्त्राचें लाहे डोळे| तैं न्याय म्हणिपे ||३७०|| ना दूध वाढिता ठावो पावे| तंव उतोनि जाय स्वभावें| तोही वेंचु परी नव्हे| वेंचिलें तें ||३७१|| तैसें शास्त्रसाह्येंवीण| केलें नोहे जरी अकारण| तरी लागो कां नागवण| दानलेखीं ||३७२|| अगा बावन्ना वर्णांपरता| कोण मंत्रु आहे पंडुसुता| कां बावन्नही नुच्चारितां| जीवु आथी ? ||३७३|| परी मंत्राची कडसणी| जंव नेणिजे कोदंडपाणी| तंव उच्चारफळ वाणी| न पवे जेवीं ||३७४|| तेवीं कारणहेतुयोगें| जें बिसाट कर्म निगे| तें शास्त्राचिये न लगे| कांसे जंव ||३७५|| कर्म होतचि असे तेव्हांही| परी तें होणें नव्हे पाहीं| तो अन्यायो गा अन्यायीं| हेतु होय ||३७६|| तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः | पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः ||१६|| एवं पंचकारणा कर्मा| पांचही हेतु हे सुमहिमा| आतां एथें पाहें पां आत्मा| सांपडला असे ? ||३७७|| भानु न होनि रूपें जैसीं| चक्षुरूपातें प्रकाशी| आत्मा न होनि कर्में तैसीं| प्रकटित असे गा ||३७८|| पैं प्रतिबिंब आरिसा| दोन्ही न होनि वीरेशा| दोहींतें प्रकाशी जैसा| न्याहाळिता तो ||३७९|| कां अहोरात्र सविता| न होनि करी पंडुसुता| तैसा आत्मा कर्मकर्ता| न होनि दावी ||३८०|| परी देहाहंमान भुली| जयाची बुद्धि देहींचि आतली| तया आत्मविषयीं जाली| मध्यरात्री गा ||३८१|| जेणें चैतन्या ईश्वरा ब्रह्मा| देहचि केलें परमसीमा| तया आत्मा कर्ता हे प्रमा| अलोट उपजे ||३८२|| आत्माचि कर्मकर्ता| हाही निश्चयो नाहीं तत्वतां| देहोचि मी कर्मकर्ता| मानितो साचे ||३८३|| जे आत्मा मी कर्मातीतु| सर्वकर्मसाक्षिभूतु| हे आपुली कहीं मातु| नायकेचि कानीं ||३८४|| म्हणौनि उमपा आत्मयातें| देहचिवरी मविजे एथें| विचित्र काई रात्रि दिवसातें| डुडुळ न करी ? ||३८५|| पैं जेणें आकाशींचा कहीं| सत्य सूर्यु देखिला नाहीं| तो थिल्लरींचें बिंब काई| मानू न लाहे ? ||३८६|| थिल्लराचेनि जालेपणें| सूर्यासि आणी होणें| त्याच्या नाशीं नाशणें| कंपें कंपू ||३८७|| आणि निद्रिस्ता चेवो नये| तंव स्वप्न साच हों लाहे| रज्जु नेणतां सापा बिहे| विस्मो कवण ? ||३८८|| जंव कवळ आथि डोळां| तंव चंद्रु देखावा कींं पिंवळा| काय मृगींहीं मृगजळा| भाळावें नाहीं ? ||३८९|| तैसा शास्त्रगुरूचेनि नांवे| जो वाराही टेंकों नेदी सिवें| केवळ मौढ्याचेनिचि जीवें| जियाला जो ||३९०|| तेणें देहात्मदृष्टीमुळें| आत्मया घापे देहाचें जाळें| जैसा अभ्राचा वेगु कोल्हें| चंद्रीं मानीं ||३९१|| मग तया मानणयासाठीं| देहबंदीशाळे किरीटी| कर्माच्या वज्रगांठी| कळासे तो ||३९२|| पाहे पां बद्ध भावना दृढा| नळियेवरी तो बापुडा| काय मोकळेयाही पायाचा चवडा| न ठकेचि पुंसा ||३९३|| म्हणौनि निर्मळा आत्मस्वरूपीं| तो प्रकृतीचें केलें आरोपी| तो कल्पकोडीच्या मापीं| मवीचि कर्में ||३९४|| आता कर्मामाजीं असे | परी तयातें कर्म न स्पर्शे| वडवानळातें जैसें| समुद्रोदक ||३९५|| तैसेंनि वेगळेपणें| जयाचें कर्मीं असणें| तो कीर वोळखावा कवणें| तरी सांगो ||३९६|| जे मुक्तातें निर्धारितां| लाभे आपलीच मुक्तता| जैसी दीपें दिसें पाहतां| आपली वस्तु ||३९७|| नातरी दर्पणु जंव उटिजे| तंव आपणपयां आपण भेटिजे| कां तोय पावतां तोय होईजे| लवणें जेंवीं ||३९८|| हें असो परतोनि मागुतें| प्रतिबिंब पाहे बिंबातें| तंव पाहणें जाउनी आयितें| बिंबचि होय ||३९९|| तैसें हारपलें आपणपें पावे| तैं संतांतें पाहतां गिंवसावें| म्हणौनि वानावे ऐकावे| तेचि सदा ||४००|| परी कर्मीं असोनि कर्में | जो नावरे समेंविषमें| चर्मचक्षूंचेनि चामें| दृष्टि जैसी ||४०१|| तैसा सोडवला जो आहे| तयाचें रूप आतां पाहें| उपपत्तीची बाहे| उभऊनि सांगों ||४०२|| यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते | हत्वाऽपि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते ||१७|| तरी अविद्येचिया निदा| विश्वस्वप्नाचा हा धांदा| भोगीत होता प्रबुद्धा| अनादि जो ||४०३|| तो महावाक्याचेनि नांवें| गुरुकृपेचेनि थांवें| माथां हातु ठेविला नव्हे| थापटिला जैसा ||४०४|| तैसा विश्वस्वप्नेंसीं माया| नीद सांडूनि धनंजया| सहसा चेइला अद्वया- | नंदपणें जो ||४०५|| तेव्हां मृगजळाचे पूर| दिसते एक निरंतर| हारपती कां चंद्रकर| फांकतां जैसे ||४०६|| कां बाळत्व निघोनि जाय| तैं बागुला नाहीं त्राय| पैं जळालिया इंधन न होय| इंधन जेवीं ||४०७|| नाना चेवो आलिया पाठीं| तैं स्वप्न न दिसे दिठी| तैसी अहं ममता किरीटी| नुरेचि तया ||४०८|| मग सूर्यु आंधारालागीं| रिघो कां भलते सुरंगीं| परी तो तयाच्या भागीं| नाहींचि जैसा ||४०९|| तैसा आत्मत्वें वेष्टिला होये| तो जया जया दृश्यातें पाहें| तें दृष्य द्रष्टेपणेंसीं होत जाये| तयाचेंचि रूप ||४१०|| जैसा वन्हि जया लागे| तें वन्हिचि जालिया आंगें| दाह्यदाहकविभागें| सांडिजे तें ||४११|| तैसा कर्माकारा दुजेया| तो कर्तेपणाचा आत्मया| आळु आला तो गेलिया| कांहीं बाहीं जें उरे ||४१२|| तिये आत्मस्थितीचा जो रावो| मग तो देहीं इये जाणेल ठावो ? | काय प्रलयांबूचा उन्नाहो| वोघु मानी ? ||४१३|| तैसी ते पूर्ण अहंता| काई देहपणें पंडुसुता| आवरे काई सविता| बिंबें धरिला ? ||४१४|| पैं मथूनि लोणी घेपे| तें मागुती ताकीं घापे| तरी तें अलिप्तपणें सिंपे| तेणेंसी काई ? ||४१५|| नाना काष्ठौनि वीरेशा| वेगळा केलिया हुताशा| राहे काष्ठाचिया मांदुसा| कोंडलेपणें ? ||४१६|| कां रात्रीचिया उदराआंतु| निघाला जो हा भास्वतु| तो रात्री ऐसी मातु| ऐके कायी ? ||४१७|| तैसें वेद्य वेदकपणेंसी| पडिलें कां जयाचे ग्रासीं| तया देह मी ऐसी| अहंता कैंची ? ||४१८|| आणि आकाशें जेथें जेथुनी| जाइजे तेथ असे भरोनी| म्हणौनि ठेलें कोंदोनी| आपेंआप ||४१९|| तैसें जें तेणें करावें| तो तेंचि आहे स्वभावें| मा कोणें कर्मीं वेष्टावें| कर्तेपणें ? ||४२०|| नुरेचि गगनावीण ठावो| नोहेचि समुद्रा प्रवाहो| नुठीचि ध्रुवा जावों| तैसें जाहालें ||४२१|| ऐसेनि अहंकृतिभावो| जयाचा बोधीं जाहला वावो| तऱ्ही देहा जंव निर्वाहो| तंव आथी कर्में ||४२२|| वारा जरी वाजोनि वोसरे| तरी तो डोल रुखीं उरे| कां सेंदें द्रुति राहे कापुरें| वेंचलेनी ||४२३|| कां सरलेया गीताचा समारंभु| न वचे राहवलेपणाचा क्षोभु| भूमी लोळोनि गेलिया अंबु| वोल थारे ||४२४|| अगा मावळलेनि अर्कें| संध्येचिये भूमिके| ज्योतिदीप्ति कौतुकें| दिसे जैसी ||४२५|| पैं लक्ष भेदिलियाहीवरी| बाण धांवेचि तंववरी| जंव भरली आथी उरी| बळाची ते ||४२६|| नाना चक्रीं भांडें जालें| तें कुलालें परतें नेलें| परी भ्रमेंचि तें मागिले| भोवंडिलेपणें ||४२७|| तैसा देहाभिमानु गेलिया| देह जेणें स्वभावें धनंजया. जालें तें अपैसया| चेष्टवीच तें ||४२८|| संकल्पेंवीण स्वप्न| न लावितां दांगीचें बन| न रचितां गंधर्वभुवन| उठी जैसें ||४२९|| आत्मयाचेनि उद्यमेंवीण| तैसें देहादिपंचकारण| होय आपणयां आपण| क्रियाजात ||४३०|| पैं प्राचीनसंस्कारवशें| पांचही कारणें सहेतुकें| कामवीजती गा अनेकें| कर्माकारें ||४३१|| तया कर्मामाजीं मग| संहरो आघवें जग| अथवा नवें चांग| अनुकरो ||४३२|| परी कुमुद कैसेनि सुके| कैसें तें कमळ फांके| हीं दोन्ही रवी न देखे| जयापरी ||४३३|| कां वीजु वर्षोनि आभाळ| ठिकरिया आतो भूतळ| अथवा करूं शाड्वळ| प्रसन्नावृष्टी ||४३४|| तरी तया दोहींतें जैसें| नेणिजेचि कां आकाशें| तैसा देहींच जो असे | विदेहदृष्टी ||४३५|| तो देहादिकीं चेष्टीं| घडतां मोडतां हे सृष्टी| न देखे स्वप्न दृष्टी| चेइला जैसा ||४३६|| येऱ्हवीं चामाचे डोळेवरी| जे देखती देहचिवरी| ते कीर तो व्यापारी| ऐसेंचि मानिती ||४३७|| कां तृणाचा बाहुला| जो आगरामेरें ठेविला| तो साचचि राखता कोल्हा| मानिजे ना ? ||४३८|| पिसेंं नेसलें कां नागवें| हें लोकीं येऊनि जाणावें| ठाणोरियांचें मवावें| आणिकीं घाय ||४३९|| कां महासतीचे भोग| देखे कीर सकळ जग| परी ते आगी ना आंग| ना लोकु देखे ||४४०|| तैसा स्वस्वरूपें उठिला| जो दृश्येंसी द्रष्टा आटला| तो नेणें काय राहटला| इंद्रियग्रामु ||४४१|| अगा थोरीं कल्लोळीं कल्लोळ साने| लोपतां तिरींचेनि जनें| एकीं एक गिळिलें हें मनें| मानिजे जऱ्ही ||४४२|| तऱ्ही उदकाप्रति पाहीं| कोण ग्रसितसे काई| तैसें पूर्णा दुजें नाहीं| जें तो मारी ||४४३|| सुवर्णाचिया चंडिका| सुवर्णशूळेंचि देखा| सुवर्णाचिया महिखा| नाशु केला ||४४४|| तो देवलवसिया कडा| व्यवहारु गमला फुडा| वांचूनि शूळ महिष चामुंडा| सुवर्णचि तें ||४४५|| पैं चित्रींचें जळ हुतांशु| तो दृष्टीचाचि आभासु| पटीं आगी वोलांशु| दोन्ही नाहीं ||४४६|| मुक्ताचें देह तैसें | हालत संस्कारवशें | तें देखोनि लोक पिसे | कर्ता म्हणती ||४४७|| आणि तयां करणेया आंतु| घडो तिहीं लोकां घातु| परी तेणें केला हे मातु| बोलों नये ||४४८|| अगा अंधारुचि देखावा तेजें| मग तो फेडी हें बोलिजे| | तैसें ज्ञानिया नाहीं दुजें| जें तो मारी ||४४९|| म्हणौनि तयाचि बुद्धी| नेणे पापपुण्याची गंधी| गंगा मीनलिया नदी| विटाळु जैसा ||४५०|| आगीसी आगी झगटलिया| काय पोळे धनंजया| | कीं शस्त्र रुपे आपणया| आपणचि ||४५१|| तैसें आपणपयापरतें| जो नेणें क्रियाजातातें| तेथ काय लिंपवी बुद्धीतें| तयाचिये ||४५२|| म्हणौनि कार्य कर्ता क्रिया| हें स्वरूपचि जाहलें जया| नाहीं शरीरादिकीं तया| कर्मी बंधु ||४५३|| जे कर्ता जीव विंदाणीं| काढूनि पांचही खाणी| घडित आहे करणीं| आउतीं दाहें ||४५४|| तेथ न्यावो आणि अन्यावो| हा द्विविधु साधूनि आवो| उभविता न लवी खेंवो| कर्मभुवनें ||४५५|| या थोराडा कीर कामा| विरजा नोहे आत्मा| परी म्हणसी हन उपक्रमा| हातु लावी ||४५६|| तो साक्षी चिद्रूपु| कर्मप्रवृत्तीचा संकल्पु| उठी तो कां निरोपु| आपणचि दे ? ||४५७|| तरी कर्मप्रवृत्तीहीलागीं| तया आयासु नाहीं आंगीं| जे प्रवृत्तीचेही उळिगीं| लोकुचि आथी ||४५८|| म्हणौनि आत्मयाचें केवळ| जो रूपचि जाहला निखिळ| तया नाहीं बंदिशाळ| कर्माचि हे ||४५९|| परी अज्ञानाच्या पटीं| अन्यथा ज्ञानाचें चित्र उठी| तेथ चितारणी हे त्रिपुटी| प्रसिद्ध जे कां ||४६०|| ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना | करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसंग्रहः ||१८|| जें ज्ञान ज्ञाता ज्ञेय| हें जगाचें बीज त्रय| ते कर्माची निःसंदेह| प्रवृत्ति जाण ||४६१|| आतां ययाचि गा त्रया| व्यक्ति वेगळालिया| आइकें धनंजया| करूं रूप ||४६२|| तरी जीवसूर्यबिंबाचे| रश्मी श्रोत्रादिकें पांचें| धांवोनि विषयपद्माचे| फोडिती मढ ||४६३|| कीं जीवनृपाचे वारु उपलाणें| घेऊनि इंद्रियांचीं केकाणें| विषयदेशींचें नागवणें| आणीत जे ||४६४|| हें असो इहीं इंद्रियीं राहाटे| जें सुखदुःखेंसीं जीवा भेटे| तें सुषुप्तिकालीं वोहटे| जेथ ज्ञान ||४६५|| तया जीवा नांव ज्ञाता| आणि जें हें सांगितलें आतां| तेंचि एथ पंडुसुता| ज्ञान जाण ||४६६|| जें अविद्येचिये पोटीं| उपजतखेंवो किरीटी| आपणयातें वांटी| तिहीं ठायीं ||४६७|| आपुलिये धांवे पुढां| घालूनि ज्ञेयाचा गुंडा| उभारी मागिलीकडां| ज्ञातृत्वातें ||४६८|| मग ज्ञातया ज्ञेया दोघां| तो नांदणुकेचा बगा| माजीं जालेनि पैं गा| वाहे जेणें ||४६९|| ठाकूनि ज्ञेयाची शिंव| पुरे जयाची धांव| सकळ पदार्थां नांव| सूतसे जें ||४७०|| तें गा सामान्य ज्ञान| या बोअला नाहीं आन| ज्ञेयाचेंही चिन्ह| आइक आतां ||४७१|| तरी शब्दु स्पर्शु| रूप गंध रसु| हा पंचविध आभासु| ज्ञेयाचा तो ||४७२|| जैसें एकेचि चूतफळें| इंद्रियां वेगवेगळे| रसें वर्णें परीमळें| भेटिजे स्पर्शें ||४७३|| तैसें ज्ञेय तरी एकसरें| परी ज्ञान इंद्रियद्वारें| घे म्हणौनि प्रकारें| पांचें जालें ||४७४|| आणि समुद्रीं वोघाचें जाणें| सरे लाणीपासीं धावणें| कां फळीं सरे वाढणें| सस्याचें जेवीं ||४७५|| तैसें इंद्रियांच्या वाहवटीं| धांवतया ज्ञाना जेथ ठी| होय तें गा किरीटी| विषय ज्ञेय ||४७६|| एवं ज्ञातया ज्ञाना ज्ञेया| तिहीं रूप केलें धनंजया| हे त्रिविध सर्व क्रिया- | प्रवृत्ति जाण ||४७७|| जे शब्दादि विषय| हें पंचविध जें ज्ञेय| तेंचि प्रिय कां अप्रिय| एकेपरीचें ||४७८|| ज्ञान मोटकें ज्ञातया| दावी ना जंव धनंजया| तंव स्वीकारा कीं त्यजावया| प्रवर्तेचि तो ||४७९|| परी मीनातें देखोनि बकु| जैसा निधानातें रंकु| कां स्त्री देखोनि कामुकु| प्रवृत्ति धरी ||४८०|| जैसें खालारां धांवे पाणी| भ्रमर पुष्पाचिये घाणीं| नाना सुटला सांजवणीं| वत्सुचि पां ||४८१|| अगा स्वर्गींची उर्वशी | ऐकोनि जेंवी माणुसीं| वराता लावीजती आकाशीं| यागांचिया ||४८२|| पैं पारिवा जैसा किरीटी| चढला नभाचिये पोटीं| पारवी देखोनि लोटी| आंगचि सगळें ||४८३|| हें ना घनगर्जनासरिसा| मयूर वोवांडे आकाशा| ज्ञाता ज्ञेय देखोनि तैसा| धांवचि घे ||४८४|| म्हणौनि ज्ञान ज्ञेय ज्ञाता| हे त्रिविध गा पंडुसुता| होयचि कर्मा समस्तां| प्रवृत्ति येथ ||४८५|| परी तेंचि ज्ञेय विपायें| जरी ज्ञातयातें प्रिय होये| तरी भोगावया न साहे| क्षणही विलंबु ||४८६|| नातरी अवचटें| तेंचि विरुद्ध होऊनि भेटे| तरी युगांत वाटे| सांडावया ||४८७|| व्याळा कां हारा| वरपडा जालेया नरा| हरिखु आणि दरारा| सरिसाचि उठी ||४८८|| तैसें ज्ञेय प्रियाप्रियें| देखिलेनि ज्ञातया होये| मग त्याग स्वीकारीं वाहे| व्यापारातें ||४८९|| तेथ रागी प्रतिमल्लाचा| गोसांवी सर्वदळाचा| रथु सांडूनि पायांचा| होय जैसा ||४९०|| तैसें ज्ञातेपणें जें असे | तें ये कर्ता ऐसिये दशे| जेवितें बैसलें जैसें| रंधन करूं ||४९१|| कां भंवरेंचि केला मळा| वरकलुचि जाला अंकसाळा| नाना देवो रिगाला देऊळा- | चिया कामा ||४९२|| तैसा ज्ञेयाचिया हांवा| ज्ञाता इंद्रियांचा मेळावा| राहाटवी तेथ पांडवा| कर्ता होय ||४९३|| आणि आपण होउनी कर्ता| ज्ञाना आणी करणता| तेथें ज्ञेयचि स्वभावतां| कार्य होय ||४९४|| ऐसा ज्ञानाचिये निजगति| पालटु पडे गा सुमति| डोळ्याची शोभा रातीं| पालटे जैसी ||४९५|| कां अदृष्ट जालिया उदासु| पालटे श्रीमंताचा विलासु| पुनिवेपाठीं शीतांशु| पालटे जैसा ||४९६|| तैसा चाळितां करणें| ज्ञाता वेष्टिजे कर्तेपणें| तेथींचीं तियें लक्षणें| ऐक आतां ||४९७|| तरी बुद्धि आणि मन| चित्त अहंकार हन| हें चतुर्विध चिन्ह| अंतःकरणाचें ||४९८|| बाह्य त्वचा श्रवण| चक्षु रसना घ्राण| हें पंचविध जाण| इंद्रियें गा ||४९९|| तेथ आंतुले तंव करणें| कर्ता कर्तव्या घे उमाणें| मग तैं जरी जाणें| सुखा येतें ||५००|| तरी बाहेरीलें तियेंही| चक्षुरादिकें दाहाही| उठौनि लवलाहीं| व्यापारा सूये ||५०१|| मग तो इंद्रियकदंंबु| करविजे तंव राबु| जंव कर्तव्याचा लाभु| हातासि ये ||५०२|| ना तें कर्तव्य जरी दुःखें| फळेल ऐसें देखे| तो लावी त्यागमुखें| तियें दाहाही ||५०३|| मग फिटे दुःखाचा ठावो| तंव राहाटवी रात्रिदिवो| विकणवातें कां रावो| जयापरी ||५०४|| तैसेनि त्याग स्वीकारीं| वाहातां इंद्रियांची धुरी| ज्ञातयातें अवधारीं| कर्ता म्हणिपे ||५०५|| आणि कर्तयाच्या सर्व कर्मीं| आउतांचिया परी क्षमी| म्हणौनि इंद्रियांतें आम्ही| करणें म्हणों ||५०६|| आणि हेचि करणेंवरी| कर्ता क्रिया ज्या उभारी| तिया व्यापे तें अवधारीं| कर्म एथ ||५०७|| सोनाराचिया बुद्धि लेणें| व्यापे चंद्रकरीं चांदणें| कां व्यापे वेल्हाळपणें| वेली जैसी ||५०८|| नाना प्रभा व्यापे प्रकाशु| गोडिया इक्षुरसु| हें असो अवकाशु| आकाशीं जैसा ||५०९|| तैसें कर्तयाचिया क्रिया| व्यापलें जें धनंजया| तें कर्म गा बोलावया| आन नाहीं ||५१०|| एवं कर्म कर्ता करण | या तिहींचेंही लक्षण| सांगितलें तुज विचक्षण- | शिरोमणी ||५११|| एथ ज्ञाता ज्ञान ज्ञेय| हें कर्माचें प्रवृत्तित्रय| तैसेंचि कर्ता करण कार्य| हा कर्मसंचयो ||५१२|| वन्हीं ठेविला असे धूमु| आथी बीजीं जेवीं द्रुमु| कां मनीं जोडे कामु| सदा जैसा ||५१३|| तैसा कर्ता क्रिया करणीं| कर्माचें आहे जिंतवणीं| सोनें जैसें खाणी| सुवर्णाचिये ||५१४|| म्हणौनि हें कार्य मी कर्ता| ऐसें आथि जेथ पंडुसुता| तेथ आत्मा दूरी समस्ता| क्रियांपासीं ||५१५|| यालागीं पुढतपुढती| आत्मा वेगळाचि सुमती| आतां असो हे किती| जाणतासि तूं ||५१६|| ज्ञानं कर्म च कर्ताच त्रिधैव गुणभेदतः | प्रोच्यते गुणसङ्ख्याने यथावच्छृणु तान्यपि ||१९|| परी सांगितलें जें ज्ञान| कर्म कर्ता हन| ते तिन्ही तिहीं ठायीं भिन्न| गुणीं आहाती ||५१७|| म्हणौनि ज्ञाना कर्मा कर्तया| पातेजों नये धनंजया| जे दोनी बांधती सोडावया| एकचि प्रौढ ||५१८|| तें सात्विक ठाऊवें होये| तो गुणभेदु सांगों पाहे| जो सांख्यशास्त्रीं आहे| उवाइला ||५१९|| जें विचारक्षीरसमुद्र| स्वबोधकुमुदिनीचंद्र| ज्ञानडोळसां नरेंद्र| शास्त्रांचा जें ||५२०|| कीं प्रकृतिपुरुष दोनी| मिसळलीं दिवोरजनीं| तियें निवडितां त्रिभुवनीं| मार्तंडु जें ||५२१|| जेथ अपारा मोहराशी| तत्वाच्या मापीं चोविसीं| उगाणा घेऊनि परेशीं| सुरवाडिजे ||५२२|| अर्जुना तें सांख्यशास्त्र| पढे जयाचें स्तोत्र| तें गुणभेदचरित्र| ऐसें आहे ||५२३|| जे आपुलेनि आंगिकें| त्रिविधपणाचेनि अंकें| दृश्यजात तितुकें| अंकित केलें ||५२४|| एवं सत्वरजतमा| तिहींची एवढी असे महिमा| जें त्रैविध्य आदी ब्रह्मा| अंतीं कृमी ||५२५|| परी विश्वींची आघवी मांदी| जेणें भेदलेनि गुणभेदीं| पडिली तें तंव आदी| ज्ञान सांगो ||५२६|| जे दिठी जरी चोख कीजे| तरी भलतेंही चोख सुजे| तैसें ज्ञानें शुद्धें लाहिजे| सर्वही शुद्ध ||५२७|| म्हणौनि तें सात्विक ज्ञान| आतां सांगों दे अवधान| कैवल्यगुणनिधान| श्रीकृष्ण म्हणे ||५२८|| सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते | अविभक्तं विभक्तेषु तज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् ||२०|| तरी अर्जुना गा तें फुडें| सात्विक ज्ञान चोखडें| जयाच्या उदयीं ज्ञेय बुडे| ज्ञातेनिसीं ||५२९|| जैसा सूर्य न देखे अंधारें| सरिता नेणिजती सागरें| कां कवळिलिया न धरे| आत्मछाया ||५३०|| तयापरी जया ज्ञाना| शिवादि तृणावसाना| इया भूतव्यक्ति भिन्ना| नाडळती ||५३१|| जैसें हातें चित्र पाहातां| होय पाणियें मीठ धुतां| कां चेवोनि स्वप्ना येतां| जैसें होय ||५३२|| तैसें ज्ञानें जेणें| करितां ज्ञातव्यातें पाहाणें| जाणता ना जाणणें| जाणावें उरे ||५३३|| पैं सोनें आटूनि लेणीं| न काढिती आपुलिया आयणी| कां तरंग न घेपती पाणी| गाळूनि जैसें ||५३४|| तैसी जया ज्ञानाचिया हाता| न लगेचि दृश्यपथा| तें ज्ञान जाण सर्वथा| सात्विक गा ||५३५|| आरिसा पाहों जातां कोडें| जैसें पाहातेंचि कां रिगे पुढें| तैसें ज्ञेय लोटोनि पडे| ज्ञाताचि जें ||५३६|| पुढती तेंचि सात्विक ज्ञान| जें मोक्षलक्ष्मीचें भुवन| हें असो ऐक चिन्ह| राजसाचें ||५३७|| पृथक्त्वेन तु यज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान् | वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ञानं विद्धि राजसम् ||२१|| तरी पार्था परीयेस| तें ज्ञान गा राजस| जें भेदाची कांस| धरूनि चाले ||५३८|| विचित्रता भूतांचिया| आपण आंतोनि ठिकरिया| बहु चकै ज्ञातया| आणिली जेणें ||५३९|| जैसें साचा रूपाआड| घालूनि विसराचें कवाड| मग स्वप्नाचें काबाड| ओपी निद्रा ||५४०|| तैसें स्वज्ञानाचिये पौळी| बाहेरि मिथ्या महीं खळीं| तिहीं अवस्थांचिया वह्याळी| दावी जें जीवा ||५४१|| अलंकारपणें झांकलें| बाळा सोनें कां वायां गेलें| तैसें नामीं रूपीं दुरावलें| अद्वैत जया ||५४२|| अवतरली गाडग्यां घडां| पृथ्वी अनोळख जाली मूढां| वन्हि जाला कानडा| दीपत्वासाठीं ||५४३|| कां वस्त्रपणाचेनि आरोपें| मूर्खाप्रति तंतु हारपे| नाना मुग्धा पटु लोपे| दाऊनि चित्र ||५४४|| तैशी जया ज्ञाना| जाणोनि भूतव्यक्ती भिन्ना| ऐक्यबोधाची भावना| निमोनि गेली ||५४५|| मग इंधनीं भेदला अनळु| फुलांवरी परीमळु| कां जळभेदें शकलु| चंद्रु जैसा ||५४६|| तैसें पदार्थभेद बहुवस| जाणोनि लहानथोर वेष| आंतलें तें राजस| ज्ञान येथ ||५४७|| आतां तामसाचेंही लिंग| सांगेन तें वोळख चांग| डावलावया मातंग- | सदन जैसें ||५४८|| यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम् | अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम् ||२२|| तरी किरीटी जें ज्ञान| हिंडे विधीचेनि वस्त्रेंहीन| श्रुति पाठमोरी नग्न| म्हणौनि तया ||५४९|| येरींही शास्त्र बटिकरीं| जें निंदेचे विटाळवरी| बोळविलेंसे डोंगरीं| म्लेंच्छधर्माच्या ||५५०|| जें गा ज्ञान ऐसें| गुणग्रहें तामसें| घेतलें भवें पिसें| होऊनियां ||५५१|| जें सोयरिकें बाधु नेणें| पदार्थीं निषेधु न म्हणे| निरोविलें जैसें सुणें | शून्यग्रामीं ||५५२|| तया तोंडीं जें नाडळे| कां खातां जेणें पोळे| तेंचि येक वाळे| येर घेणेचि ||५५३|| पैं सोनें चोरितां उंदिरु| न म्हणे थरुविथरु| नेणे मांसखाइरु| काळें गोरें ||५५४|| नाना वनामाजीं बोहरी| कडसणी जेवीं न करी| कां जीत मेलें न विचारी| बैसतां माशी ||५५५|| अगा वांता कां वाढिलेया| साजुक कां सडलिया| विवेकु कावळिया| नाहीं जैसा ||५५६|| तैसें निषिद्ध सांडूनि द्यावें| कां विहित आदरें घ्यावें| हें विषयांचेनि नांवें. नेणेंचि जें ||५५७|| जेतुलें आड पडे दिठी| तेतुलें घेचि विषयासाठीं| मग तें स्त्री- द्रव्य वाटी | शिश्नोदरां ||५५८|| तीर्थातीर्थ हे भाख| उदकीं नाहीं सनोळख| तृषा वोळे तेंचि सुख| वांचूनियां ||५५९|| तयाचिपरी खाद्याखाद्य| न म्हणे निंद्यानिंद्य| तोंडा आवडे तें मेध्य| ऐसाचि बोधु ||५६०|| आणि स्त्रीजात तितुकें| त्वचेंद्रियेंचि वोळखे| तियेविषयीं सोयरिकें| एकचि बोधु ||५६१|| पैं स्वार्थीं जें उपकरे| तयाचि नाम सोयिरें| देहसंबंधु न सरे| जिये ज्ञानीं ||५६२|| मृत्यूचें आघवेंचि अन्न| आघवेंचि आगी इंधन| तैसें जगचि आपलें धन| तामसज्ञाना ||५६३|| ऐसेनि विश्व सकळ| जेणें विषयोचि मानिलें केवळ| तया एक जाण फळ| देहभरण ||५६४|| आकाशपतिता नीरा| जैसा सिंधुचि येक थारा| तैसें कृत्यजात उदरा- | लागिंचि बुझे ||५६५|| वांचूनि स्वर्गु नरकु आथी| तया हेतु प्रवृत्ति निवृत्ती| इये आघवियेचि राती| जाणिवेची जें ||५६६|| जें देहखंडा नाम आत्मा| ईश्वर पाषाणप्रतिमा| ययापरौती प्रमा| ढळों नेणें ||५६७|| म्हणे पडिलेनि शरीरें| केलेनिसीं आत्मा सरे| मा भोगावया उरे| कोण वेषें ||५६८|| ना ईश्वरु पाहातां आहे| तो भोगवी हें जरी होये| तरी देवचि खाये| विकूनियां ||५६९|| गांवींचें देवळेश्वर| नियामकचि होती साचार| तरी देशींचे डोंगर| उगे कां असती ? ||५७०|| ऐसा विपायें देवो मानिजे| तरी पाषाणमात्रचि जाणिजे| आणि आत्मा तंव म्हणिजे| देहातेंचि ||५७१|| येरें पापपुण्यादिकें| तें आघवेंचि करोनि लटिकें| हित मानी अग्निमुखे| चरणें जें कां ||५७२|| जें चामाचे डोळे दाविती| जें इंद्रियें गोडी लाविती| तेंचि साच हे प्रतीती| फुडी जया ||५७३|| किंबहुना ऐसी प्रथा| वाढती देखसी पार्था| धूमाची वेली वृथा| आकाशीं जैसी ||५७४|| कोरडा ना वोला| उपेगा आथी गेला| तो वाढोनि मोडला| भेंडु जैसा ||५७५|| नाना उंसांचीं कणसें| कां नपुंसकें माणुसें| वन लागलें जैसें| साबरीचें ||५७६|| नातरी बाळकाचें मन| कां चोराघरींचें धन| अथवा गळास्तन| शेळियेचे ||५७७|| तैसें जें वायाणें| वोसाळ दिसे जाणणें| तयातें मी म्हणें| तामस ज्ञान ||५७८|| तेंही ज्ञान इया भाषा| बोलिजे तो भावो ऐसा| जात्यंधाचा कां जैसा| डोळा वाडु ||५७९|| कां बधिराचे नीट कान| अपेया नाम पान| तैसें आडनांव ज्ञान| तामसा तया ||५८०|| हें असो किती बोलावें| तरी ऐसें जें देखावें| तें ज्ञान नोहे जाणावें| डोळस तम ||५८१|| एवं तिहीं गुणीं| भेदलें यथालक्षणीं| ज्ञान श्रोतेशिरोमणी| दाविलें तुज ||५८२|| आतां याचि त्रिप्रकारा| ज्ञानाचेनि धनुर्धरा| प्रकाशें होती गोचरा| कर्तयांच्या क्रिया ||५८३|| म्हणौनि कर्म पैं गा| अनुसरे तिहीं भागां| मोहरे जालिया वोघा| तोय जैसे ||५८४|| तेंचि ज्ञानत्रयवशें| त्रिविध कर्म जें असे | तेथ सात्विक तंव ऐसें| परीसे आधीं ||५८५|| नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम् | अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते ||२३|| तरी स्वाधिकाराचेनि मार्गेंं| आलें जें मानिलें आंगें| पतिव्रतेचेनि परीष्वंगें| प्रियातें जैसें ||५८६|| सांवळ्या आंगा चंदन| प्रमदालोचनीं अंजन| तैसें अधिकारासी मंडण| नित्यपणें जें ||५८७|| तें नित्य कर्म भलें| होय नैमित्तिकीं सावाइलें| सोनयासि जोडलें| सौरभ्य जैसें ||५८८|| आणि आंगा जीवाची संपत्ती| वेंचूनि बाळाची करी पाळती| परी जीवें उबगणें हें स्थिती| न पाहे माय ||५८९|| तैसें सर्वस्वें कर्म अनुष्ठी| परी फळ न सूये दिठी| उखिती क्रिया पैठी| ब्रह्मींचि करी ||५९०|| आणि प्रिय आलिया स्वभावें| शंबळ उरे वेंचे ठाउवें | नव्हे तैसें सत्प्रसंगें करावें| पारुषे जरी ||५९१|| तरी अकरणाचेनि खेदें| द्वेषातें जीवीं न बांधे| जालियाचेनि आनंदें| फुंजों नेणें ||५९२|| ऐसाइसिया हातवटिया| कर्म निफजे जें धनंजया| जाण सात्विक हें तया| गुणनाम गा ||५९३|| ययावरी राजसाचें| लक्षण सांगिजेल साचें| न करीं अवधानाचें| वाणेंपण ||५९४|| यत्तु कामेप्सुना कर्म साहंकारेण वा पुनः | क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम् ||२४|| तरी घरीं मातापितरां| धड बोली नाहीं संसारा| येर विश्व भरी आदरा| मूर्खु जैसा ||५९५|| का तुळशीचिया झाडा| दुरूनि न घापें सिंतोडा| द्राक्षीचिया तरी बुडा| दूधचि लाविजे ||५९६|| तैसी नित्यनैमित्तिकें| कर्में जियें आवश्यकें| तयांचेविषयीं न शके| बैसला उठूं ||५९७|| येरां काम्याचेनि तरी नांवें| देह सर्वस्व आघवें| वेचितांही न मनवे| बहु ऐसें ||५९८|| अगा देवढी वाढी लाहिजे| तेथ मोल देतां न धाइजे| पेरितां पुरें न म्हणिजे| बीज जेवीं ||५९९|| कां परीसु आलिया हातीं| लोहालागीं सर्वसंपत्ती| वेचितां ये उन्नती| साधकु जैसा ||६००|| तैसीं फळें देखोनि पुढें| काम्यकर्में दुवाडें| करी परी तें थोकडें| केलेंही मानी ||६०१|| तेणें फळकामुकें| यथाविधी नेटकें | काम्य कीजे तितुकें| क्रियाजात ||६०२|| आणि तयाही केलियाचें| तोंडीं लावी दौंडीचें| कर्मी या नांवपाटाचें| वाणें सारी ||६०३|| तैसा भरे कर्माहंकारु| मग पिता अथवा गुरु| ते न मनी काळज्वरु| औषध जैसें ||६०४|| तैसेनि साहंकारें| फळाभिलाषियें नरें| कीजे गा आदरें| जें जें कांहीं ||६०५|| परी तेंही करणें बहुवसा| वळघोनि करी सायासा| जीवनोपावो कां जैसा| कोल्हाटियांचा ||६०६|| एका कणालागींँ उंदिरु| आसका उपसे डोंगरु| कां शेवाळोद्देशें दर्दुरु| समुद्रु डहुळी ||६०७|| पैं भिकेपरतें न लाहे| तऱ्ही गारुडी सापु वाहे| काय कीजे शीणुचि होये| गोडु येकां ||६०८|| हे असो परमाणूचेनि लाभें| पाताळ लंघिती वोळंबे| तैसें स्वर्गसुखलोभें| विचंबणें जें ||६०९|| तें काम्य कर्म सक्लेश| जाणावें येथ राजस| आतां चिन्ह परिस| तामसाचें ||६१०|| अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम् | मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते ||२५|| तरी तें गा तामस कर्म| जें निंदेचें काळें धाम| निषेधाचें जन्म| सांच जेणें ||६११|| जें निपजविल्यापाठींं| कांहींच न दिसे दिठी| रेघ काढलिया पोटीं| तोयाचे जेवीं ||६१२|| कां कांजी घुसळलिया| कां राखोंडी फुंकलिया| कांहीं न दिसे गाळिलिया| वाळुघाणा ||६१३|| नाना उपणिलिया भूंस| कां विंधिलिया आकाश| नाना मांडिलिया पाश| वारयासी ||६१४|| हें आवघेंचि जैसें| वांझें होऊनि नासे| जें केलिया पाठीं तैसें| वायांचि जाय ||६१५|| येऱ्हवीं नरदेहाही येवढें| धन आटणीये पडे| जें कर्म निफजवितां मोडे| जगाचें सुख ||६१६|| जैसा कमळवनीं फांसु| काढिलिया कांटसु| आपण झिजे नाशु| कमळां करी ||६१७|| कां आपण आंगें जळे| आणि नागवी जगाचे डोळे| पतंगु जैसा सळें| दीपाचेनि ||६१८|| तैसें सर्वस्व वायां जावो| वरी देहाही होय घावो| परी पुढिलां अपावो| निफजविजे जेणें ||६१९|| माशी आपणयातें गिळवी| परी पुढीला वांती शिणवी| तें कश्मळ आठवी| आचरण जें ||६२०|| तेंही करावयो दोषें| मज सामर्थ्य असे कीं नसे | हेंहीं पुढील तैसें| न पाहतां करी ||६२१|| केवढा माझा उपावो| करितां कोण प्रस्तावो| केलियाही आवो| काय येथ ||६२२|| इये जाणिवेची सोये| अविवेकाचेनि पायें| पुसोनियां होये| साटोप कर्मीं ||६२३|| आपला वसौटा जाळुनी| बिसाटे जैसा वन्ही| कां स्वमर्यादा गिळोनि| सिंधु उठी ||६२४|| मग नेणें बहु थोडें| न पाहे मागें पुढें| मार्गामार्ग येकवढें| करीत चाले ||६२५|| तैसें कृत्याकृत्य सरकटित| आपपर नुरवित| कर्म होय तें निश्चित| तामस जाण ||६२६|| ऐसी गुणत्रयभिन्ना| कर्माची गा अर्जुना| हे केली विवंचना| उपपत्तींसीं ||६२७|| आतां ययाचि कर्मा भजतां| कर्माभिमानिया कर्ता| तो जीवुही त्रिविधता| पातला असे ||६२८|| चतुराश्रमवशें| एकु पुरुषु चतुर्धा दिसे| कर्तया त्रैविध्य तैसें| कर्मभेदें ||६२९|| तरी तयां तिहीं आंतु| सात्विक तंव प्रस्तुतु| सांगेन दत्तचित्तु| आकर्णीं तूं ||६३०|| मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः | सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते ||२६|| तरी फळोद्देशें सांडिलिया| वाढती जेवीं सरळिया| शाखा कां चंदनाचिया| बावन्नया ||६३१|| कां न फळतांही सार्थका| जैसिया नागलतिका| तैसिया करी नित्यादिकां| क्रिया जो कां ||६३२|| परी फळशून्यता| नाहीं तया विफळता| पैं फळासीचि पंडुसुता| फळें कायिसी ||६३३|| आणि आदरें करी बहुवसें| परी कर्ता मी हें नुमसे| वर्षाकाळींचें जैसें| मेघवृंद ||६३४|| तेवींचि परमात्मलिंगा| समर्पावयाजोगा| कर्मकलापु पैं गा| निपजावया ||६३५|| तया काळातें नुलंघणें| देशशुद्धिही साधणें| कां शास्त्रांच्या वातीं पाहणें| क्रियानिर्णयो ||६३६|| वृत्ति करणें येकवळा| चित्त जावों न देणें फळा| नियमांचिया सांखळा| वाहणें सदा ||६३७|| हा निरोधु साहावयालागीं| धैर्याचिया चांगचांगीं| चिंतवणी जिती आंगीं| वाहे जो कां ||६३८|| आणि आत्मयाचिये आवडी| कर्में करितां वरपडीं| देहसुखाचिये परवडीं| येवों न लाहे ||६३९|| आळसा निद्रा दुऱ्हावे| क्षुधा न बाणवे| सुरवाडु न पावे| आंगाचा ठावो ||६४०|| तंव अधिकाधिक| उत्साहो धरी आगळीक| सोनें जैसें पुटीं तुक| तुटलिया कसीं ||६४१|| जरी आवडी आथी साच| तरी जीवितही सलंच| आगीं घालितां रोमांच| देखिजती सतिये ||६४२|| मा आत्मया येवढीया प्रिया| वालभेला जो धनंजया| देहही सिदतां तया| काय खेदु होईल ? ||६४३|| म्हणौनि विषयसुरवाडु तुटे| जंव जंव देहबुद्धि आटे| तंव तंव आनंदु दुणवटे| कर्मीं जया ||६४४|| ऐसेनि जो कर्म करी| आणि कोणे एके अवसरीं| तें ठाके ऐसी परी| वाहे जरी ||६४५|| तरी कडाडीं लोटला गाडा| तो आपणपें न मनी अवघडा| तैसा ठाकलेनिही थोडा| नोहे जो कां ||६४६|| नातरी आदरिलें| अव्यंग सिद्धी गेलें| तरी तेंही जिंतिलें| मिरवूं नेणें ||६४७|| इया खुणा कर्म करितां| देखिजे जो पंडुसुता| तयातें म्हणिपे तत्त्वतां| सात्विकु कर्ता ||६४८|| आतां राजसा कर्तेया| वोळखणें हें धनंजया| जे अभिलाषा जगाचिया. वसौटा तो ||६४९|| रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः | हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः ||२७|| जैसा गावींचिया कश्मळा| उकरडा होय येकवळा| कां स्मशानीं अमंगळा| आघवयांची ||६५०|| तया परी जो अशेषा| विश्वाचिया अभिलाषा| पायपाखाळणिया दोषां| घरटा जाला ||६५१|| म्हणौनि फळाचा लागु| देखे जिये असलगु| तिये कर्मीं चांगु| रोहो मांडी ||६५२|| आणि आपण जालिये जोडी| उपखों नेदी कवडी| क्षणक्षणा कुरोंडी| जीवाची करी ||६५३|| कृपणु चित्तीं ठेवा आपुला| तैसा दक्षु पराविया माला| बकु जैसा खुतला| मासेयासी ||६५४|| आणि गोंवी गेलिया जवळी| झगटलिया अंग फाळी| फळें तरी आंतु पोळी| बोरांटी जैसी ||६५५|| तैसें मनें वाचा कायें| भलतया दुःख देतु जाये| स्वार्थु साधितां न पाहे| पराचें हित ||६५६|| तेवींचि आंगें कर्मीं| आचरणें नोहे क्षमी| न निघे मनोधर्मीं| अरोचकु ||६५७|| कनकाचिया फळा| आंतु माज बाहेरी मौळा| तैसा सबाह्य दुबळा| शुचित्वें जो ||६५८|| आणि कर्मजात केलिया| फळ लाहे जरी धनंजया| तरी हरिखें जगा यया| वांकुलिया वाये ||६५९|| अथवा जें आदरिलें| हीनफळ होय केलें| तरीं शोकें तेणें जिंतिलें| धिक्कारों लागे ||६६०|| कर्मीं राहाटी ऐसी| जयातें होती देखसी| तोचि जाण त्रिशुद्धीसी| राजस कर्ता ||६६१|| आतां यया पाठीं येरु| जो कुकर्माचा आगरु| तोही करूं गोचरु| तामस कर्ता ||६६२|| अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः | विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते ||२८|| तरी मियां लागलिया कैसें| पुढील जळत असे | हें नेणिजे हुताशें | जियापरी ||६६३|| पैं शस्त्रें मियां तिखटें | नेणिजे कैसेनि निवटे| कां नेणिजे काळकूटें| आपुलें केलें ||६६४|| तैसा पुढीलया आपुलया| घातु करीत धनंजया| आदरी वोखटिया| क्रिया जो कां ||६६५|| तिया करितांही वेळीं| काय जालें हें न सांभाळी| चळला वायु वाहटुळी| चेष्टे तैसा ||६६६|| पैं करणिया आणि जया| मेळु नाहीं धनंजया| तो पाहुनी पिसेया| कैंचीं त्राय ? ||६६७|| आणि इंद्रियांचें वोगरिलें| चरोनि राखे जो जियालें| बैलातळीं लागलें| गोचिड जैसें ||६६८|| हांसया रुदना वेळु| नेणतां आदरी बाळु| राहाटे उच्छृंखळु| तयापरी ||६६९|| जो प्रकृती आंतलेपणें| कृत्याकृत्यस्वादु नेणे| फुगे केरें धालेपणें| उकरडा जैसा ||६७०|| म्हणौनि मान्याचेनि नांवें| ईश्वराही परी न खालवे| स्तब्धपणें न मनवे| डोंगरासी ||६७१|| आणि मन जयाचें विषकल्लोळीं| राहाटी फुडी चोरिली| दिठी कीर ते वोली| पण्यांगनेची ||६७२|| किंबहुना कपटाचें| देहचि वळिलें तयाचें| तें जिणें कीं जुंवाराचें| टिटेघर ||६७३|| नोहे तयाचा प्रादुर्भावो| तो साभिलाष भिल्लांचा गांवो| म्हणौनि नये येवों जावों| तया वाटा ||६७४|| आणि आणिकांचें निकें केलें| विरु होय जया आलें| जैसें अपेय पया मिनलें| लवण करी ||६७५|| कां हींव ऐसा पदार्थु| घातलिया आगीआंतु| तेचि क्षणीं धडाडितु| अग्नि होय ||६७६|| नाना सुद्रव्यें गोमटीं| जालिया शरीरीं पैठीं| होऊनि ठाती किरीटी| मळुचि जेवीं ||६७७|| तैसें पुढिलाचें बरवें| जयाच्या भीतरीं पावे| आणि विरुद्धचि आघवें| होऊनि निगे ||६७८|| जो गुण घे दे दोख| अमृताचें करी विख| दूध पाजलिया देख| व्याळु जैसा ||६७९|| आणि ऐहिकीं जियावें| जेणें परत्रा साच यावें| तें उचित कृत्य पावे| अवसरीं जिये ||६८०|| तेव्हां जया आपैसी| निद्रा ये ठेविली ऐसी| दुर्व्यवहारीं जैसी| विटाळें लोटे ||६८१|| पैं द्राक्षरसा आम्ररसा| वेळे तोंड सडे वायसा| कां डोळे फुटती दिवसा| डुडुळाचे ||६८२|| तैसा कल्याणकाळु पाहे| तैं तयातें आळसु खाये| ना प्रमादीं तरी होये| तो म्हणे तैसें ||६८३|| जेवींचि सागराच्या पोटीं| जळे अखंड आगिठी | तैसा विषादु वाहे गांठीं| जिवाचिये जो ||६८४|| लेंडोराआगीं धूमावधि| कां अपाना आंगीं दुर्गंधि| तैसा जो जीवितावधि| विषादें केला ||६८५|| आणि कल्पांताचिया पारा| वेगळेंही जो वीरा| सूत्र धरी व्यापारा| साभिलाषा ||६८६|| अगा जगाही परौती| शुचा वाहे पैं चित्तीं| करितां विषीं हातीं| तृणही न लगे ||६८७|| ऐसा जो लोकाआंतु| पापपुंजु मूर्तु| देखसी तो अव्याहतु| तामसु कर्ता ||६८८|| एवं कर्म कर्ता ज्ञान| या तिहींचें त्रिधा चिन्ह| दाविलें तुज सुजन| चक्रवर्ती ||६८९|| बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु | प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय ||२९|| आतां अविद्येचिया गांवीं| मोहाची वेढूनि मदवी| संदेहाचीं आघवीं| लेऊनि लेणीं ||६९०|| आत्मनिश्चयाची बरव| जया आरिसां पाहे सावयव| तिये बुद्धीचीही धांव| त्रिधा असे ||६९१|| अगा सत्वादि गुणीं इहीं| कायी एक तिहीं ठायीं| न कीजेचि येथ पाहीं| जगामाजीं ||६९२|| आगी न वसतां पोटीं| कवण काष्ठ असे सृष्टीं| तैसें तें कैंचें दृश्यकोटीं| त्रिविध जें नोहे ||६९३|| म्हणौनि तिहीं गुणीं| बुद्धी केली त्रिगुणी| धृतीसिही वांटणी| तैसीचि असे ||६९४|| तेंचि येक वेगळालें| यथा चिन्हीं अळंकारलें| सांगिजैल उपाइलें| भेदलेपणें ||६९५|| परी बुद्धि धृति इयां| दोहीं भागामाजीं धनंंजया| आधीं रूप बुद्धीचिया| भेदासि करूं ||६९६|| तरी उत्तमा मध्यमा निकृष्टा| संसारासि गा सुभटा| प्राणियां येतिया वाटा| तिनी आथी ||६९७|| जे अकरणीय काम्य निषिद्ध| ते हे मार्ग तिन्ही प्रसिद्ध| संसारभयें सबाध| जीवां ययां ||६९८|| प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये | बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ||३०|| म्हणौनि अधिकारें मानिलें| जें विधीचेनि वोघें आलें| तें एकचि येथ भलें| नित्य कर्म ||६९९|| तेंचि आत्मप्राप्ति फळ| दिठी सूनि केवळ| कीजे जैसें कां जळ| सेविजे ताहनें ||७००|| येतुलेनि तें कर्म| सांडी जन्मभय विषम| करूनि दे उगम| मोक्षसिद्धि ||७०१|| ऐसें करी तो भला| संसारभयें सांडिला| करणीयत्वें आला| मुमुक्षुभागा ||७०२|| तेथ जे बुद्धि ऐसा| बळिया बांधे भरंवसा| मोक्षु ठेविला ऐसा| जोडेल येथ ||७०३|| म्हणौनि निवृत्तीची मांडिली| सूनि प्रवृत्तितळीं| इये कर्मीं बुडकुळी| द्यावीं कीं ना ? ||७०४|| तृषार्ता उदकें जिणें| कां पुरीं पडलिया पोहणें| अंधकूपीं गति किरणें| सूर्याचेनि ||७०५|| नाना पथ्येंसीं औषध लाहे| तरी रोगें दाटलाही जिये| का मीना जिव्हाळा होये| जळाचा जरी ||७०६|| तरी तयाच्या जीविता| नाहीं जेवीं अन्यथा| तैसें कर्मीं इये वर्ततां| जोडेचि मोक्षु ||७०७|| हें करणीयाचिया कडे| जें ज्ञान आथी चोखडें| आणि अकरणीय हें फुडें| ऐसें जाण ||७०८|| जीं तिथें काम्यादिकें| संसारभयदायकें| अकृत्यपणाचें आंबुखें| पडिलें जयां ||७०९|| तिये कर्मीं अकार्यीं| जन्ममरणसमयीं| प्रवृत्ति पळवी पायीं| मागिलींचि ||७१०|| पैं आगीमाजीं न रिघवे| अथावीं न घालवे| धगधगीत नागवे| शूळ जेवीं ||७११|| कां काळियानाग धुंधुवातु| देखोनि न घालवे हातु| न वचवे खोपेआंतु| वाघाचिये ||७१२|| तैसें कर्म अकरणीय| देखोनि महाभय| उपजे निःसंदेह| बुद्धी जिये ||७१३|| वाढिलें रांधूनि विखें| तेथें जाणिजे मृत्यु न चुके| तेवीं निषेधीं कां देखे| बंधातें जे ||७१४|| मग बंधभयभरितीं| तियें निषिद्धीं प्राप्ती| विनियोगु जाणे निवृत्ती| कर्माचिये ||७१५|| ऐसेनि कार्याकार्यविवेकी| जे प्रवृत्ति निवृत्ति मापकी| खरा कुडा पारखी| जियापरी ||७१६|| तैसी कृत्याकृत्यशुद्धी| बुझे जे निरवधी| सात्विक म्हणिपे बुद्धी| तेचि तूं जाण ||७१७|| यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च | अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी ||३१|| आणि बकाच्या गांवीं| घेपे क्षीरनीर सकलवी| कां अहोरात्रींची गोंवी| आंधळें नेणे ||७१८|| जया फुलाचा मकरंदु फावे| तो काष्ठें कोरूं धांवे| परी भ्रमरपणा नव्हे| अव्हांटा जेवीं ||७१९|| तैसीं इयें कार्याकार्यें| धर्माधर्मरूपें जियें| तियें न चोजवितां जाये| जाणती जे कां ||७२०|| अगा डोळांवीण मोतियें| घेतां पाडु मिळे विपायें| न मिळणें तें आहे| ठेविलें तेथें ||७२१|| तैसें अकरणीय अवचटें| नोडवे तरीच लोटे| येऱ्हवीं जाणें एकवटें| दोन्ही जे कां ||७२२|| ते गा बुद्धि चोखविषीं| जाण येथ राजसी| अक्षत टाकिली जैसी| मांदियेवरी ||७२३|| अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता | सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी ||३२|| आणि राजा जिया वाटा जाये| ते चोरांसि आडव होये| कां राक्षसां दिवो पाहे| राती होऊनि ||७२४|| नाना निधानचि निदैवा| होये कोळसयाचा उडवा| पैं असतें आपणपें जीवा| नाहीं जालें ||७२५|| तैसें धर्मजात तितुकें| जिये बुद्धीसी पातकें| साच तें लटिकें| ऐसेंचि बुझे ||७२६|| ते आघवेचि अर्थ| करूनि घाली अनर्थ| गुण ते ते व्यवस्थित| दोषचि मानी ||७२७|| किंबहुना श्रुतिजातें| अधिष्ठूनि केलें सरतें| तेतुलेंही उपरतें| जाणे जे बुद्धी ||७२८|| ते कोणातेंही न पुसतां| तामसी जाणावी पंडुसुता| रात्री काय धर्मार्था| साच करावी ||७२९|| एवं बुद्धीचे भेद| तिन्ही तुज विशद| सांगितले स्वबोध- | कुमुदचंद्रा ||७३०|| आतां ययाचि बुद्धिवृत्ती| निष्टंकिला कर्मजातीं| खांदु मांडिजे धृती| त्रिविधा तया ||७३१|| तिये धृतीचेही विभाग| तिन्ही यथालिंग| सांगिजती चांग| अवधान देईं ||७३२|| धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः | योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी ||३३|| तरी उदेलिया दिनकरु| चोरीसिं थोके अंधारु| कां राजाज्ञा अव्यवहारु| कुंठवी जेवीं ||७३३|| नाना पवनाचा साटु| वाजीनलिया नीटु| आंगेंसीं बोभाटु| सांडिती मेघ ||७३४|| कां अगस्तीचेनि दर्शनें| सिंधु घेऊनि ठाती मौनें| चंद्रोदयीं कमळवनें| मिठी देती ||७३५|| हें असो पावो उचलिला| मदमुख न ठेविती खालां| गर्जोनि पुढां जाला| सिंहु जरी ||७३६|| तैसा जो धीरु| उठलिया अंतरु| मनादिकें व्यापारु| सांडिती उभीं ||७३७|| इंद्रियां विषयांचिया गांठी| अपैसया सुटती किरीटी| मन मायेच्या पोटीं| रिगती दाही ||७३८|| अधोर्ध्व गूढें काढी| प्राण नवांची पेंडी| बांधोनि घाली उडी| मध्यमेमाजीं ||७३९|| संकल्पविकल्पांचें लुगडे| सांडूनि मन उघडें| बुद्धि मागिलेकडे| उगीचि बैसे ||७४०|| ऐसी धैर्यराजें जेणें| मन प्राण करणें| स्वचेष्टांचीं संभाषणें| सांडविजती ||७४१|| मग आघवींचि सडीं| ध्यानाच्या आंतुल्या मढीं | कोंडिजती निरवडी| योगाचिये ||७४२|| परी परमात्मया चक्रवर्ती| उगाणिती जंव हातीं| तंव लांचु न घेतां धृती| धरिजती जिया ||७४३|| ते गा धृती येथें| सात्विक हें निरुतें| आईक अर्जुनातें| श्रीकांतु म्हणे ||७४४|| यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन | प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी ||३४|| आणि होऊनियां शरीरी| स्वर्गसंसाराच्या दोहीं घरीं| नांदे जो पोटभरी| त्रिवर्गोपायें ||७४५|| तो मनोरथांच्या सागरीं| धर्मार्थकामांच्या तारुवावरी| जेणें धैर्यबळें करी| क्रिया- वणिज ||७४६|| जें कर्म भांडवला सूये| तयाची चौगुणी येती पाहे| येवढें सायास साहे| जया धृती ||७४७|| ते गा धृती राजस| पार्था येथ परीयेस| आतां आइक तामस| तिसरी जे कां ||७४८|| यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च | न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी ||३५|| तरी सर्वाधमें गुणें| जयाचें कां रूपा येणें| कोळसा काळेपणें| घडला जैसा ||७४९|| अहो प्राकृत आणि हीनु| तयाही कीं गुणत्वाचा मानु| तरी न म्हणिजे पुण्यजनु| राक्षसु काई ? ||७५०|| पैं ग्रहांमाजीं इंगळु| तयातें म्हणिजे मंगळु| तैसा तमीं धसाळु| गुणशब्दु हा ||७५१|| जे सर्वदोषांचा वसौटा| तमचि कामऊनि सुभटा| उभारिला आंगवठा| जया नराचा ||७५२|| तो आळसु सूनि असे कांखे| म्हणौनि निद्रे कहीं न मुके| पापें पोषितां दुःखें| न सांडिजे जेवीं ||७५३|| आणि देहधनाचिया आवडी| सदा भय तयातें न सांडी| विसंबूं न सके धोंडीं| काठिण्य जैसें ||७५४|| आणि पदार्थजातीं स्नेहो| बांधे म्हणौनि तो शोकें ठावो| केला न शके पाप जावों| कृतघ्नौनि जैसें ||७५५|| आणि असंतोष जीवेंसीं| धरूनि ठेला अहर्निशीं| म्हणौनि मैत्री तेणेंसीं| विषादें केली ||७५६|| लसणातें न सांडी गंधी| कां अपथ्यशीळातें व्याधी| तैसी केली मरणावधी| विषादें तया ||७५७|| आणि वयसा वित्तकामु| ययांचा वाढवी संभ्रमु| म्हणौनि मदें आश्रमु| तोचि केला ||७५८|| आगीतें न सांडी तापु| सळातें जातीचा सापु| कां जगाचा वैरी वासिपु| अखंडु जैसा ||७५९|| नातरी शरीरातें काळु| न विसंबे कवणे वेळु| तैसा आथी अढळु| तामसीं मदु ||७६०|| एवं पांचही हे निद्रादिक| तामसाच्या ठाईं दोख| जिया धृती देख| धरिलें आहाती ||७६१|| तिये गा धृती नांवें| तामसी येथ हें जाणावें| म्हणितलें तेणें देवें| जगाचेनी ||७६२|| एवं त्रिविध जे बुद्धि| कीजे कर्मनिश्चयो आधि| तो धृती या सिद्धि| नेइजो येथ ||७६३|| सूर्यें मार्गु गोचरु होये| आणि तो चालती कीर पाये| परी चालणें तें आहे| धैर्यें जेवीं ||७६४|| तैसी बुद्धि कर्मातें दावी| ते करणसामग्री निफजवी| परी निफजावया होआवी| धीरता जे ||७६५|| ते हे गा तुजप्रती| सांगीतली त्रिविध धृती| यया कर्मत्रया निष्पत्ती| जालिया मग ||७६६|| येथ फळ जें एक निफजे| सुख जयातें म्हणिजे| तेंही त्रिविध जाणिजे| कर्मवशें ||७६७|| तरी फळरूप तें सुख | त्रिगुणीं भेदलें देख| विवंचूं आतां चोख| चोखीं बोलीं ||७६८|| परी चोखी ते कैसी सांगे| पैं घेवों जातां बोलबगें| कानींचियेही लागे| हातींचा मळु ||७६९|| म्हणौनि जयाचेनि अव्हेरें| अवधानही होय बाहिरें| तेणें आइक हो आंतरें| जीवाचेनि जीवें ||७७०|| ऐसें म्हणौनि देवो| त्रिविधा सुखाचा प्रस्तावो| मांडला तो निर्वाहो| निरूपित असें ||७७१|| सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ | अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति ||३६|| म्हणे सुखत्रयसंज्ञा| सांगों म्हणौनि प्रतिज्ञा| बोलिलों तें प्राज्ञा| ऐक आतां ||७७२|| तरी सुख तें गा किरीटी| दाविजेल तुज दिठी| जें आत्मयाचिये भेटी| जीवासि होय ||७७३|| परी मात्रेचेनि मापें| दिव्यौषध जैसें घेपें| कां कथिलाचें कीजे रुपें| रसभावनीं ||७७४|| नाना लवणाचें जळु| होआवया दोनि चार वेळु| देऊनि सांडिजती ढाळु| तोयाचें जेवीं ||७७५|| तेवीं जालेनि सुखलेशें| जीवु भाविलिया अभ्यासें| जीवपणाचें नासे| दुःख जेथें ||७७६|| तें येथ आत्मसुख | जालें असे त्रिगुणात्मक| तेंही सांगों एकैक| रूप आतां ||७७७|| यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् | तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् ||३७|| आतां चंदनाचें बूड| सर्पी जैसें दुवाड| कां निधानाचें तोंड| विवसिया जेवीं ||७७८|| अगा स्वर्गींचें गोमटें| आडव यागसंकटें| कां बाळपण दासटें| त्रासकाळें ||७७९|| हें असो दीपाचिये सिद्धी| अवघड धू आधीं| नातरी तो औषधीं| जिभेचा ठावो ||७८०|| तयापरी पांडवा| जया सुखाचा रिगावा| विषम तेथ मेळावा| यमदमांचा ||७८१|| देत सर्वस्नेहा मिठी| आगीं ऐसें वैराग्य उठी| स्वर्ग संसारा कांटी| काढितचि ||७८२|| विवेकश्रवणें खरपुसें| जेथ व्रताचरणें कर्कशें| करितां जाती भोकसे| बुद्ध्यादिकांचे ||७८३|| सुषुम्नेचेनि तोंडें| गिळिजे प्राणापानाचे लोंढे| बोहणियेसीचि येवढें| भारी जेथ ||७८४|| जें सारसांही विघडतां| होय वोहाहूनि वस्त काढितां| ना भणंगु दवडितां| भाणयावरुनी ||७८५|| पैं मायेपुढौनि बाळक| काळें नेतां एकुलतें एक| होय कां उदक| तुटतां मीना ||७८६|| तैसें विषयांचें घर| इंद्रियां सांडितां थोर| युगांतु होय तें वीर| विराग साहाती ||७८७|| ऐसा जया सुखाचा आरंभु| दावी काठिण्याचा क्षोभु| मग क्षीराब्धी लाभु| अमृताचा जैसा ||७८८|| पहिलया वैराग्यगरळा| धैर्यशंभु वोडवी गळा| तरी ज्ञानामृतें सोहळा| पाहे जेथें ||७८९|| पैं कोलिताही कोपे ऐसें| द्राक्षांचें हिरवेपण असे | तें परीपाकीं कां जैसें| माधुर्य आते ||७९०|| तें वैराग्यादिक तैसें| पिकलिया आत्मप्रकाशें| मग वैराग्येंसींही नाशे| अविद्याजात ||७९१|| तेव्हां सागरीं गंगा जैसी | आत्मीं मीनल्या बुद्धि तैसी| अद्वयानंदाची आपैसी| खाणी उघडे ||७९२|| ऐसें स्वानुभवविश्रामें| वैराग्यमूळ जें परिणमे| तें सात्विक येणें नामें| बोलिजे सुख ||७९३|| विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् | परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ||३८|| आणि विषयेंद्रियां| मेळु होतां धनंजया| जें सुख जाय थडिया| सांडूनि दोन्ही ||७९४|| अधिकारिया रिगतां गांवो| होय जैसा उत्साहो| कां रिणावरी विवाहो| विस्तारिला ||७९५|| नाना रोगिया जिभेपासीं| केळें गोड साखरेसीं| कां बचनागाची जैसी| मधुरता पहिली ||७९६|| पहिलें संवचोराचें मैत्र| हाटभेटीचें कलत्र| कां लाघवियाचे विचित्र| विनोद ते ||७९७|| तैसें विषयेंद्रियदोखीं| जें सुख जीवातें पोखी| मग उपडिला खडकीं| हंसु जैसा ||७९८|| तैसी जोडी आघवी आटे| जीविताचा ठाय फिटे| सुकृताचियाही सुटे| धनाची गांठी ||७९९|| आणिक भोगिलें जें कांहीं| तें स्वप्न तैसें होय नाहीं| मग हानीच्याचि घाईं| लोळावें उरे ||८००|| ऐसें आपत्ती जें सुख| ऐहिकीं परिणमे देख| परत्रीं कीर विख| होऊनि परते ||८०१|| जे इंद्रियजाता लळा| दिधलिया धर्माचा मळा| जाळूनि भोगिजे सोहळा| विषयांचा जेथ ||८०२|| तेथ पातकें बांधिती थावो| तियें नरकीं देती ठावो| जेणें सुखें हा अपावो| परत्रीं ऐसा ||८०३|| पैं नामें विष महुरें| परी मारूनि अंतीं खरें| तैसें आदि जें गोडिरें| अंतीं कडू ||८०४|| पार्था तें सुख साचें| वळिलें आहे रजाचें| म्हणौनि न शिवें तयाचें| आंग कहीं ||८०५|| यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः | निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् ||३९|| आणि अपेयाचेनि पानें| अखाद्याचेनि भोजनें| स्वैरस्त्रीसंनिधानें| होय जें सुख ||८०६|| का पुढिलांचेनि मारें| नातरी परस्वापहारें| जें सुख अवतरे| भाटाच्या बोलीं ||८०७|| जें आलस्यावरी पोखिजे| निद्रेमाजीं जें देखिजे| जयाच्या आद्यंतीं भुलिजे| आपुली वाट ||८०८|| तें गा सुख पार्था| तामस जाण सर्वथा| हें बहु न सांगोंचि जें कथा| असंभाव्य हे ||८०९|| ऐसें कर्मभेदें मुदलें| फळसुखही त्रिधा जालें| तें हें यथागमें केलें| गोचर तुज ||८१०|| ते कर्ता कर्म कर्मफळ| ये त्रिपुटी येकी केवळ| वांचूनि कांहींचि नसे स्थूल| सूक्ष्मीं इये ||८११|| आणि हे तंव त्रिपुटी| तिहीं गुणीं इहीं किरीटी| गुंफिली असे पटीं| तांतुवीं जैसी ||८१२|| न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः | सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः ||४०|| म्हणौनि प्रकृतीच्या आवलोकीं| न बंधिजे इहीं सत्वादिकीं| तैसी स्वर्गीं ना मृत्युलोकीं| आथी वस्तु ||८१३|| कैंचा लोंवेवीण कांबळा| मातियेवीण मोदळा| का जळेंवीण कल्लोळा| होणें आहे ? ||८१४|| तैसें न होनि गुणाचें| सृष्टीची रचना रचे| ऐसें नाहींचि गा साचें| प्राणिजात ||८१५|| यालागीं हें सकळ| तिहीं गुणांचेंचि केवळ| घडलें आहे निखिळ| ऐसें जाण ||८१६|| गुणीं देवां त्रयी लाविली| गुणीं लोकीं त्रिपुटी पाडिली| चतुर्वर्णा घातली| सिनानीं उळिगें ||८१७|| ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप | कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः ||४१|| तेचि चारी वर्ण| पुससी जरी कोण कोण| तरी जयां मुख्य ब्राह्मण| धुरेचे कां ||८१८|| येर क्षत्रिय वैश्य दोन्ही| तेही ब्राह्मणाच्याचि मानिजे मानी| जे ते वैदिकविधानीं| योग्य म्हणौनि ||८१९|| चौथा शूद्रु जो धनंजया| वेदीं लागु नाहीं तया| तऱ्हीं वृत्ति वर्णत्रया| आधीन तयाची ||८२०|| तिये वृत्तिचिया जवळिका| वर्णा ब्राह्मणादिकां| शूद्रही कीं देखा| चौथा जाला ||८२१|| जैसा फुलाचेनि सांगातें| तांतुं तुरंबिजे श्रीमंतें| तैसें द्विजसंगें शूद्रातें| स्वीकारी श्रुती ||८२२|| ऐसैसी गा पार्था| हे चतुर्वर्णव्यवस्था| करूं आतां कर्मपथा| यांचिया रूपा ||८२३|| जिहीं गुणीं ते वर्ण चारी| जन्ममृत्यूंचिये कातरी| चुकोनियां ईश्वरीं| पैठे होती ||८२४|| जिये आत्मप्रकृतीचे इहीं| गुणीं सत्त्वादिकीं तिहीं| कर्में चौघां चहूं ठाईं| वांटिलीं वर्णा ||८२५|| जैसें बापें जोडिलें लेंका| वांटिलें सूर्यें मार्ग पांथिका| नाना व्यापार सेवकां| स्वामी जैसें ||८२६|| तैसी प्रकृतीच्या गुणीं| जया कर्माची वेल्हावणी| केली आहे वर्णीं| चहूं इहीं ||८२७|| तेथ सत्त्वें आपल्या आंगीं| समीन- निमीन भागीं| दोघे केले नियोगी| ब्राह्मण क्षत्रिय ||८२८|| आणि रज परी सात्त्विक| तेथ ठेविलें वैश्य लोक| रजचि तमभेसक| तेथ शूद्र ते गा ||८२९|| ऐसा येकाचि प्राणिवृंदा| भेदु चतुर्वर्णधा| गुणींचि प्रबुद्धा| केला जाण ||८३०|| मग आपुलें ठेविलें जैसें| आइतेंचि दीपें दिसे| गुणभिन्न कर्म तैसें| शास्त्र दावी ||८३१|| तेंचि आतां कोण कोण| वर्णविहिताचें लक्षण| हें सांगों ऐक श्रवण- | सौभाग्यनिधी ||८३२|| शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च | ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ||४२|| तरी सर्वेंद्रियांचिया वृत्ती| घेऊनि आपुल्या हातीं| बुद्धि आत्मया मिळे येकांतीं| प्रिया जैसी ||८३३|| ऐसा बुद्धीचा उपरमु| तया नाम म्हणिपे शमु| तो गुण गा उपक्रमु| जया कर्माचा ||८३४|| आणि बाह्येंद्रियांचें धेंडें| पिटूनि विधीचेनि दंडें| नेदिजे अधर्माकडे| कहींचि जावों ||८३५|| तो पैं गा शमा विरजा| दमु गुण जेथ दुजा| आणि स्वधर्माचिया वोजा| जिणें जें कां ||८३६|| सटवीचिये रातीं| न विसंबिजे जेवीं वाती| तैसा ईश्वरनिर्णयो चित्तीं| वाहणें सदा ||८३७|| तया नाम तप| ते तिजया गुणाचें रूप| आणि शौचही निष्पाप| द्विविध जेथ ||८३८|| मन भावशुद्धी भरलें| आंग क्रिया अळंकारिलें| ऐसें सबाह्य जियालें| साजिरें जें कां ||८३९|| तया नाम शौच पार्था| तो कर्मीं गुण जये चौथा| आणि पृथ्वीचिया परी सर्वथा| सर्व जें साहाणें ||८४०|| ते गा क्षमा पांडवा| गुण जेथ पांचवा| स्वरांमाजीं सुहावा| पंचमु जैसा ||८४१|| आणि वांकडेनी वोघेंसीं| गंगा वाहे उजूचि जैसी| कां पुटीं वळला ऊसीं| गोडी जैसी ||८४२|| तैसा विषमांही जीवां- | लागीं उजुकारु बरवा| तें आर्जव गा साहावा| जेथींचा गुण ||८४३|| आणि पाणियें प्रयत्नें माळी| अखंड जचे झाडामुळीं| परी तें आघवेंचि फळीं| जाणे जेवीं ||८४४|| तैसें शास्त्राचारें तेणें| ईश्वरुचि येकु पावणें| हें फुडें जें कां जाणणें| तें येथ ज्ञान ||८४५|| तें गा कर्मीं जिये| सातवा गुण होये| आणि विज्ञान हें पाहें| एवंरूप ||८४६|| तरी सत्वशुद्धीचिये वेळे| शास्त्रें कां ध्यानबळें| ईश्वरतत्त्वींचि मिळे| निष्टंकबुद्धी ||८४७|| हें विज्ञान बरवें| गुणरत्न जेथ आठवें| आणि आस्तिक्य जाणावें| नववा गुण ||८४८|| पैं राजमुद्रा आथिलिया| प्रजा भजे भलतया| तेवीं शास्त्रें स्वीकारिलिया| मार्गमात्रातें ||८४९|| आदरें जें कां मानणें| तें आस्तिक्य मी म्हणें| तो नववा गुण जेणें| कर्म तें साच ||८५०|| एवं नवही शमादिक| गुण जेथ निर्दोख| तें कर्म जाण स्वाभाविक| ब्राह्मणाचें ||८५१|| तो नवगुणरत्नाकरु| यया नवरत्नांचा हारु| न फेडीत ले दिनकरु| प्रकाशु जैसा ||८५२|| नाना चांपा चांपौळी पूजिला| चंद्रु चंद्रिका धवळला| कां चंदनु निजें चर्चिला| सौरभ्यें जेवीं ||८५३|| तेवीं नवगुणटिकलग| लेणें ब्राह्मणाचें अव्यंग| कहींचि न संडी आंग| ब्राह्मणाचें ||८५४|| आतां उचित जें क्षत्रिया| तेंहीं कर्म धनंजया| सांगों ऐक प्रज्ञेचिया| भरोवरी ||८५५|| शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् | दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ||४३|| तरी भानु हा तेजें| नापेक्षी जेवीं विरजे| कां सिंहें न पाहिजे| जावळिया ||८५६|| ऐसा स्वयंभ जो जीवें लाठु| सावायेंवीण उद्भटु| ते शौर्य गा जेथ श्रेष्ठु| पहिला गुण ||८५७|| आणि सूर्याचेनि प्रतापें| कोडिही नक्षत्र हारपे| ना तो तरी न लोपे| सचंद्रीं तिहीं ||८५८|| तैसेनि आपुले प्रौढीगुणें| जगा या विस्मयो देणें| आपण तरी न क्षोभणें| कायसेनही ||८५९|| तें प्रागल्भ्यरूप तेजा| जिये कर्मीं गुण दुजा| आणि धीरु तो तिजा| जेथींचा गुण ||८६०|| वरिपडलिया आकाश| बुद्धीचे डोळे मानस| झांकी ना ते परीयेस| धैर्य जेथें ||८६१|| आणि पाणी हो कां भलतेतुकें| परी तें जिणौनि पद्म फांके| कां आकाश उंचिया जिंके| आवडे तयातें ||८६२|| तेवीं विविध अवस्था| पातलिया जिणौनि पार्था| प्रज्ञाफळ तया अर्था| वेझ देणें जें ||८६३|| तें दक्षत्व गा चोख| जेथ चौथा गुण देख| आणि झुंज अलौकिक| तो पांचवा गुण ||८६४|| आदित्याचीं झाडें| सदा सन्मुख सूर्याकडे| तेवीं समोर शत्रूपुढें| होणें जें कां ||८६५|| माहेवणी प्रयत्नेंसी| चुकविजे सेजे जैसी| रिपू पाठी नेदिजे तैसी| समरांगणीं ||८६६|| हा क्षत्रियाचेया आचारीं| पांचवा गुणेंद्रु अवधारीं| चहूं पुरुषार्थां शिरीं| भक्ति जैसी ||८६७|| आणि जालेनि फुलें फळें| शाखिया जैसीं मोकळे| कां उदार परीमळें| पद्माकरु ||८६८|| नाना आवडीचेनि मापें| चांदिणें भलतेणें घेपे| पुढिलांचेनि संकल्पें | तैसें जें देणें ||८६९|| तें उमप गा दान| जेथ सहावें गुणरत्न| आणि आज्ञे एकायतन| होणें जें कां ||८७०|| पोषूनि अवयव आपुले| करविजतीं मानविले| तेवीं पालणें लोभविलें| जग जें भोगणें ||८७१|| तया नाम ईश्वरभावो| जो सर्वसामर्थ्याचा ठावो| तो गुणांमाजीं रावो| सातवा जेथ ||८७२|| ऐसें जें शौर्यादिकीं| इहीं सात गुणविशेखीं| अळंकृत सप्तऋखीं| आकाश जैसें ||८७३|| तैसें सप्तगुणीं विचित्र| कर्म जें जगीं पवित्र| तें सहज जाण क्षात्र| क्षत्रियाचें ||८७४|| नाना क्षत्रिय नव्हे नरु| तो सत्त्वसोनयाचा मेरु| म्हणौनि गुणस्वर्गां आधारु| सातां इयां ||८७५|| नातरी सप्तगुणार्णवीं| परीवारली बरवी| हे क्रिया नव्हे पृथ्वी| भोगीतसे तो ||८७६|| कां गुणांचे सातांही ओघीं| हे क्रिया ते गंगा जगीं| तया महोदधीचिया आंगीं| विलसे जैसी ||८७७|| परी हें बहु असो देख| शौर्यादि गुणात्मक| कर्म गा नैसर्गिक| क्षात्रजातीसी ||८७८|| आतां वैश्याचिये जाती| उचित जे महामती| ते ऐकें गा निरुती| क्रिया सांगों ||८७९|| कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् | परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ||४४|| तरी भूमि बीज नांगरु| यया भांडवलाचा आधारु| घेऊनि लाभु अपारु| मेळवणें जें ||८८०|| किंबहुना कृषी जिणें| गोधनें राखोनि वर्तणें| कां समर्घीची विकणें| महर्घीवस्तु ||८८१|| येतुलाचि पांडवा| वैश्यातें कर्माचा मेळावा| हा वैश्यजातीस्वभावा| आंतुला जाण ||८८२|| आणि वैश्य क्षत्रिय ब्राह्मण| हे द्विजन्में तिन्ही वर्ण| ययांचें जें शुश्रूषण| तें शूद्रकर्म ||८८३|| पैं द्विजसेवेपरौतें| धांवणें नाहीं शूद्रातें| एवं चतुर्वर्णोचितें| दाविलीं कर्में ||८८४|| स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः | स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु ||४५|| आतां इयेचि विचक्षणा| वेगळालिया वर्णा| उचित जैसें करणां| शब्दादिक ||८८५|| नातरी जळदच्युता| पाणिया उचित सरिता| सरितेसी पंडुसुता| सिंधु उचितु ||८८६|| तैसें वर्णाश्रमवशें| जें करणीय आलें असे | गोरेया आंगा जैसें| गोरेपण ||८८७|| तया स्वभावविहिता कर्मा| शास्त्राचेनि मुखें वीरोत्तमा| प्रवर्तावयालागीं प्रमा| अढळ कीजे ||८८८|| पैं आपुलेंचि रत्न थितें| घेपे पारखियाचेनि हातें| तैसें स्वकर्म आपैतें| शास्त्रें करावीं ||८८९|| जैसी दिठी असे आपुलिया ठायीं| परी दीपेंवीण भोग नाहीं| मार्गु न लाहतां काई| पाय असतां होय ? ||८९०|| म्हणौनि ज्ञातिवशें साचारु| सहज असे जो अधिकारु| तो आपुलिया शास्त्रें गोचरु| आपण कीजे ||८९१|| मग घरींचाचि ठेवा| जेवीं डोळ्यां दावी दिवा| तरी घेतां काय पांडवा| आडळु असे ? ||८९२|| तैसें स्वभावें भागा आलें| वरी शास्त्रें खरें केलें| तें विहित जो आपुलें| आचरे गा ||८९३|| परी आळसु सांडुनी| फळकाम दवडुनी| आंगें जीवें मांडुनी| तेथेंचि भरु ||८९४|| वोघीं पडिलें पाणी| नेणें आनानी वाहणी| तैसा जाय आचरणीं| व्यवस्थौनी ||८९५|| अर्जुना जो यापरी| तें विहित कर्म स्वयें करी| तो मोक्षाच्या ऐलद्वारीं| पैठा होय ||८९६|| जे अकरणा आणि निषिद्धा| न वचेचि कांहीं संबंधा| म्हणौनि भवा विरुद्धा| मुकला तो ||८९७|| आणि काम्यकर्मांकडे| न परतेचि जेथ कोडें| तेथ चंदनाचेही खोडे| न लेचि तो ||८९८|| येर नित्य कर्म तंव| फळत्यागें वेंचिलें सर्व| म्हणौनि मोक्षाची शींव| ठाकूं लाहे ||८९९|| ऐसेनि शुभाशुभीं संसारीं| सांडिला तो अवधारीं| वौराग्यमोक्षद्वारीं| उभा ठाके ||९००|| जें सकळ भाग्याची सीमा| मोक्षलाभाची जें प्रमा| नाना कर्ममार्गश्रमा| शेवटु जेथ ||९०१|| मोक्षफळें दिधली वोल| जें सुकृततरूचें फूल| तयें वैराग्यीं ठेवी पाऊल| भंवरु जैसा ||९०२|| पाहीं आत्मज्ञानसुदिनाचा| वाधावा सांगतया अरुणाचा| उदयो त्या वैराग्याचा| ठावो पावे ||९०३|| किंबहुना आत्मज्ञान| जेणें हाता ये निधान| तें वैराग्य दिव्यांजन| जीवें ले तो ||९०४|| ऐसी मोक्षाची योग्यता| सिद्धी जाय तया पंडुसुता| अनुसरोनि विहिता| कर्मा यया ||९०५|| हें विहित कर्म पांडवा| आपुला अनन्य वोलावा| आणि हेचि परम सेवा| मज सर्वात्मकाची ||९०६|| पैं आघवाचि भोगेंसीं| पतिव्रता क्रीडे प्रियेंसीं| कीं तयाचीं नामें जैसीं| तपें तियां केलीं ||९०७|| कां बाळका एकी माये| वांचोनि जिणें काय आहे| म्हणौनि सेविजे कीं तो होये| पाटाचा धर्मु ||९०८|| नाना पाणी म्हणौनि मासा| गंगा न सांडितां जैसा| सर्व तीर्थ सहवासा| वरपडा जाला ||९०९|| तैसें आपुलिया विहिता| उपावो असे न विसंबितां| ऐसा कीजे कीं जगन्नाथा| आभारु पडे ||९१०|| अगा जया जें विहित| तें ईश्वराचें मनोगत| म्हणौनि केलिया निभ्रांत| सांपडेचि तो ||९११|| पैं जीवाचे कसीं उतरली| ते दासी कीं गोसावीण जाली| सिसे वेंचि तया मविली| वही जेवीं ||९१२|| तैसें स्वामीचिया मनोभावा| न चुकिजे हेचि परमसेवा| येर तें गा पांडवा| वाणिज्य करणें ||९१३|| यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् | स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ||४६|| म्हणौनि विहित क्रिया केली| नव्हे तयाची खूण पाळिली| जयापसूनि कां आलीं| आकारा भूतें ||९१४|| जो अविद्येचिया चिंधिया| गुंडूनि जीव बाहुलिया| खेळवीतसे तिगुणिया| अहंकाररज्जू ||९१५|| जेणें जग हें समस्त| आंत बाहेरी पूर्ण भरित| जालें आहे दीपजात| तेजें जैसें ||९१६|| तया सर्वात्मका ईश्वरा| स्वकर्मकुसुमांची वीरा| पूजा केली होय अपारा| तोषालागीं ||९१७|| म्हणौनि तिये पूजे| रिझलेनि आत्मराजें| वैराग्यसिद्धि देईजे| पसाय तया ||९१८|| जिये वैराग्यदशें| ईश्वराचेनि वेधवशें| हें सर्वही नावडे जैसें| वांत होय ||९१९|| प्राणनाथाचिया आधी| विरहिणीतें जिणेंही बाधी| तैसें सुखजात त्रिशुद्धी| दुःखचि लागे ||९२०|| सम्यक्ज्ञान नुदैजतां| वेधेंचि तन्मयता| उपजे ऐसी योग्यता| बोधाची लाहे ||९२१|| म्हणौनि मोक्षलाभालागीं| जो व्रतें वाहातसें आंगीं| तेणें स्वधर्मु आस्था चांगी| अनुष्ठावा ||९२२|| श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् | स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ||४७|| अगा आपुला हा स्वधर्मु| आचरणीं जरी विषमु| तरी पाहावा तो परिणामु| फळेल जेणें ||९२३|| जैं सुखालागीं आपणपयां| निंबचि आथी धनंजया| तैं कडुवटपणा तयाचिया| उबगिजेना ||९२४|| फळणया ऐलीकडे| केळीतें पाहातां आस मोडे| ऐसी त्यजिली तरी जोडे| तैसें कें गोमटें ||९२५|| तेवीं स्वधर्मु सांकडु| देखोनि केला जरी कडु| तरी मोक्षसुरवाडु| अंतरला कीं ||९२६|| आणि आपुली माये| कुब्ज जरी आहे| तरी जीये तें नोहे| स्नेह कुऱ्हें कीं ||९२७|| येरी जिया पराविया| रंभेहुनि बरविया| तिया काय कराविया| बाळकें तेणें ? ||९२८|| अगा पाणियाहूनि बहुवें| तुपीं गुण कीर आहे| परी मीना काय होये| असणें तेथ ||९२९|| पैं आघविया जगा जें विख| तें विख किडियाचें पीयूख| आणि जगा गूळ तें देख| मरण तया ||९३०|| म्हणौनि जे विहित जया जेणें| फिटे संसाराचें धरणें| क्रिया कठोर तऱ्ही तेणें| तेचि करावी ||९३१|| येरा पराचारा बरविया| ऐसें होईल टेंकलया| पायांचें चालणें डोइया| केलें जैसें ||९३२|| यालागीं कर्म आपुले| जें जातिस्वभावें असे आलें| तें करी तेणें जिंतिलें| कर्मबंधातें ||९३३|| आणि स्वधर्मुचि पाळावा| परधर्मु तो गाळावा| हा नेमुही पांडवा| न कीजेचि पै गा ? ||९३४|| तरी आत्मा दृष्ट नोहे| तंव कर्म करणें कां ठाये ? | आणि करणें तेथ आहे| आयासु आधीं ||९३५|| सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् | सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ||४८|| म्हणौनि भलतिये कर्मीं| आयासु जऱ्ही उपक्रमीं| तरी काय स्वधर्मीं| दोषु| सांगें ? ||९३६|| आगा उजू वाटा चालावें| तऱ्ही पायचि शिणवावे| ना आडरानें धांवावें| तऱ्ही तेंचि ||९३७|| पैं शिळा कां सिदोरिया| दाटणें एक धनंजया| परी जें वाहतां विसांवया| मिळिजे तें घेपे ||९३८|| येऱ्हवीं कणा आणि भूसा| कांडितांही सोसु सरिसा| जेंचि रंधन श्वान मांसा| तेंचि हवी ||९३९|| दधी जळाचिया घुसळणा| व्यापार सारिखेचि विचक्षणा| वाळुवे तिळा घाणा| गाळणें एक ||९४०|| पैं नित्य होम देयावया| कां सैरा आगी सुवावया| फुंकितां धू धनंजया| साहणें तेंचि ||९४१|| परी धर्मपत्नी धांगडी| पोसितां जरी एकी वोढी| तरी कां अपरवडी| आणावी आंगा ? ||९४२|| हां गा पाठीं लागला घाई| मरण न चुकेचि पाहीं| तरी समोरला काई| आगळें न कीजे ? ||९४३|| कुलस्त्री दांड्याचे घाये| परघर रिगालीहि जरी साहे| तरी स्वपतीतें वायें| सांडिलें कीं ||९४४|| तैसें आवडतेंही करणें| न निपजे शिणल्याविणें| तरी विहित बा रे कोणें| बोलें भारी ? ||९४५|| वरी थोडेंचि अमृत घेतां| सर्वस्व वेंचो कां पंडुसुता| जेणें जोडे जीविता| अक्षयत्व ||९४६|| येर काह्यां मोलें वेंचूनि| विष पियावे घेऊनि| आत्महत्येसि निमोनि| जाइजे जेणें ||९४७|| तैसें जाचूनियां इंद्रियें| वेंचूनि आयुष्याचेनि दिये| सांचलें पापीं आन आहे| दुःखावाचूनि ? ||९४८|| म्हणौनि करावा स्वधर्मु| जो करितां हिरोनि घे श्रमु| उचित देईल परमु| पुरुषार्थराजु ||९४९|| याकारणें किरीटी| स्वधर्माचिये राहाटी| न विसंबिजे संकटीं| सिद्धमंत्र जैसा ||९५०|| कां नाव जैसी उदधीं| महारोगी दिव्यौषधी| न विसंबिजे तया बुद्धी| स्वकर्म येथ ||९५१|| मग ययाचि गा कपिध्वजा| स्वकर्माचिया महापूजा| तोषला ईशु तमरजा| झाडा करुनी ||९५२|| शुद्धसत्त्वाचिया वाटा| आणी आपुली उत्कंठा| भवस्वर्ग काळकूटा| ऐसें दावी ||९५३|| जियें वैराग्य येणें बोलें| मागां संसिद्धी रूप केलें| किंबहुना तें आपुलें| मेळवी खागें ||९५४|| मग जिंतिलिया हे भोये| पुरुष सर्वत्र जैसा होये| कां जालाही जें लाहे| तें आतां सांगों ||९५५|| असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः | नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति ||४९|| तरी देहादिक हें संसारें| सर्वही मांडलेंसे जें गुंफिरें| तेथ नातुडे तो वागुरें| वारा जैसा ||९५६|| पैं परिपाकाचिये वेळे| फळ देठें ना देठु फळें| न धरे तैसें स्नेह खुळें| सर्वत्र होय ||९५७|| पुत्र वित्त कलत्र| हे जालियाही स्वतंत्र| माझें न म्हणे पात्र| विषाचें जैसें ||९५८|| हें असो विषयजाती| बुद्धि पोळली ऐसी माघौती| पाउलें घेऊनि एकांतीं| हृदयाच्या रिगे ||९५९|| ऐसया अंतःकरण| बाह्य येतां तयाची आण| न मोडी समर्था भेण| दासी जैसी ||९६०|| तैसें ऐक्याचिये मुठी| माजिवडें चित्त किरीटी| करूनि वेधी नेहटीं| आत्मयाच्या ||९६१|| तेव्हां दृष्टादृष्ट स्पृहे| निमणें जालेंचि आहे| आगीं दडपलिया धुयें| राहिजे जैसें ||९६२|| म्हणौनि नियमिलिया मानसीं| स्पृहा नासौनि जाय आपैसीं| किंबहुना तो ऐसी| भूमिका पावे ||९६३|| पैं अन्यथा बोधु आघवा| मावळोनि तया पांडवा| बोधमात्रींचि जीवा| ठावो होय ||९६४|| धरवणी वेंचें सरे| तैसें भोगें प्राचीन पुरे| नवें तंव नुपकरे| कांहीचि करूं ||९६५|| ऐसीं कर्में साम्यदशा| होय तेथ वीरेशा| मग श्रीगुरु आपैसा| भेटेचि गा ||९६६|| रात्रीची चौपाहरी| वेंचलिया अवधारीं| डोळ्यां तमारी| मिळे जैसा ||९६७|| का येऊनि फळाचा घडु| पारुषवी केळीची वाढु| श्रीगुरु भेटोनि करी पाडु| बुभुत्सु तैसा ||९६८|| मग आलिंगिला पूर्णिमा| जैसा उणीव सांडी चंद्रमा| तैसें होय वीरोत्तमा| गुरुकृपा तया ||९६९|| तेव्हां अबोधुमात्र असे| तो तंव तया कृपा नासे| तेथ निशीसवें जैसें| आंधारें जाय ||९७०|| तैसी अबोधाचिये कुशी| कर्म कर्ता कार्य ऐशी| त्रिपुटी असे ते जैसी| गाभिणी मारिली ||९७१|| तैसेंचि अबोधनाशासवें| नाशे क्रियाजात आघवें| ऐसा समूळ संभवे| संन्यासु हा ||९७२|| येणें मुळाज्ञानसंन्यासें| दृश्याचा जेथ ठावो पुसे| तेथ बुझावें तें आपैसें| तोचि आहे ||९७३|| चेइलियावरी पाहीं| स्वप्नींचिया तिये डोहीं| आपणयातें काई| काढूं जाइजे ? ||९७४|| तैं मी नेणें आतां जाणेन| हें सरलें तया दुःस्वप्न| जाला ज्ञातृज्ञेयाविहीन| चिदाकाश ||९७५|| मुखाभासेंसी आरिसा| परौता नेलिया वीरेशा| पाहातेपणेंवीण जैसा| पाहाता ठाके ||९७६|| तैसें नेणणें जें गेलें| तेणें जाणणेंही नेलें| मग निष्क्रिय उरलें| चिन्मात्रचि ||९७७|| तेथ स्वभावें धनंजया| नाहीं कोणीचि क्रिया| म्हणौनि प्रवादु तया| नैष्कर्म्यु ऐसा ||९७८|| तें आपुलें आपणपें| असे तेंचि होऊनि हारपे| तरंगु कां वायुलोपें| समुद्रु जैसा ||९७९|| तैसें न होणें निफजे| ते नैष्कर्म्यसिद्धि जाणिजे| सर्वसिद्धींत सहजें| परम हेचि ||९८०|| देउळाचिया कामा कळसु| उपरम गंगेसी सिंधु प्रवेशु| कां सुवर्णशुद्धी कसु| सोळावा जैसा ||९८१|| तैसें आपुलें नेणणें| फेडिजे का जाणणें| तेंहि गिळूनि असणें| ऐसी जे दशा ||९८२|| तियेपरतें कांहीं| निपजणें आन नाहीं| म्हणौनि म्हणिपे पाहीं| परमसिद्धि ते ||९८३|| सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे | समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा ||५०|| परी हेचि आत्मसिद्धि| जो कोणी भाग्यनिधि| श्रीगुरुकृपालब्धि- | काळीं पावे ||९८४|| उदयतांचि दिनकरु| प्रकाशुचि आते आंधारु| कां दीपसंगें कापुरु| दीपुचि होय ||९८५|| तया लवणाची कणिका| मिळतखेंवो उदका| उदकचि होऊनि देखा| ठाके जेवीं ||९८६|| कां निद्रितु चेवविलिया| स्वप्नेंसि नीद वायां| जाऊनि आपणपयां| मिळे जैसा ||९८७|| तैसें जया कोण्हासि दैवें| गुरुवाक्यश्रवणाचि सवें| द्वैत गिळोनि विसंवे| आपणया वृत्ती ||९८८|| तयासी मग कर्म करणें| हें बोलिजैलचि कवणें| | आकाशा येणें जाणें| आहे काई ? ||९८९|| म्हणौनि तयासि कांहीं| त्रिशुद्धि करणें नाहीं| परी ऐसें जरी हें कांहीं| नव्हे जया ||९९०|| कानावचनाचिये भेटी- | सरिसाचि पैं किरीटी| वस्तु होऊनि उठी| कवणि एकु जो ||९९१|| येऱ्हवीं स्वकर्माचेनि वन्ही| काम्यनिषिद्धाचिया इंधनीं| रजतमें कीर दोन्ही| जाळिलीं आधीं ||९९२|| पुत्र वित्त परलोकु| यया तिहींचा अभिलाखु| घरीं होय पाइकु| हेंही जालें ||९९३|| इंद्रियें सैरा पदार्थीं| रिगतां विटाळलीं होतीं| तिये प्रत्याहार तीर्थीं| न्हाणिलीं कीर ||९९४|| आणि स्वधर्माचें फळ| ईश्वरीं अर्पूनि सकळ| घेऊनि केलें अढळ| वैराग्यपद ||९९५|| ऐसी आत्मसाक्षात्कारीं| लाभे ज्ञानाची उजरी| ते सामुग्री कीर पुरी| मेळविली ||९९६|| आणि तेचि समयीं| सद्गुरु भेटले पाहीं| तेवींचि तिहीं कांहीं| वंचिजेना ||९९७|| परी वोखद घेतखेंवो| काय लाभे आपला ठावो ? | कां उदयजतांचि दिवो| मध्यान्ह होय ? ||९९८|| सुक्षेत्रीं आणि वोलटें| बीजही पेरिलें गोमटें| तरी आलोट फळ भेटे| परी वेळे कीं गा ||९९९|| जोडला मार्गु प्रांजळु| मिनला सुसंगाचाही मेळु| तरी पाविजे वांचूनि वेळु| लागेचि कीं ||१०००|| तैसा वैराग्यलाभु जाला| वरी सद्गुरुही भेटला| जीवीं अंकुरु फुटला| विवेकाचा ||१००१|| तेणें ब्रह्म एक आथी| येर आघवीचि भ्रांती| हेही कीर प्रतीती| गाढ केली ||१००२|| परी तेंचि जें परब्रह्म| सर्वात्मक सर्वोत्तम| मोक्षाचेंही काम| सरे जेथ ||१००३|| यया तिन्ही अवस्था पोटीं| जिरवी जें गा किरीटी| तया ज्ञानासिही मिठी| दे जे वस्तु ||१००४|| ऐक्याचें एकपण सरे| जेथ आनंदकणुही विरे| कांहींचि नुरोनि उरे| जें कांहीं गा ||१००५|| तियें ब्रह्मीं ऐक्यपणें| ब्रह्मचि होऊनि असणें| तें क्रमेंचि करूनि तेणें| पाविजे पैं ||१००६|| भुकेलियापासीं| वोगरिलें षड्रसीं| तो तृप्ति प्रतिग्रासीं| लाहे जेवीं ||१००७|| तैसा वैराग्याचा वोलावा| विवेकाचा तो दिवा| आंबुथितां आत्मठेवा| काढीचि तो ||१००८|| तरी भोगिजे आत्मऋद्धी| येवढी योग्यतेची सिद्धी| जयाच्या आंगीं निरवधी| लेणें जाली ||१००९|| तो जेणें क्रमें ब्रह्म| होणें करी गा सुगम| तया क्रमाचें आतां वर्म| आईक सांगों ||१०१०|| बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च | शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च ||५१|| तरी गुरु दाविलिया वाटा| येऊन विवेकतीर्थतटा| धुऊनियां मळकटा| बुद्धीचा तेणें ||१०११|| मग राहूनें उगळिली| प्रभा चंद्रें आलिंगिली| तैसी शुद्धत्वें जडली| आपणयां बुद्धि ||१०१२|| सांडूनि कुळें दोन्ही| प्रियासी अनुसरे कामिनी| द्वंद्वत्यागें स्वचिंतनीं| पडली तैसी ||१०१३|| आणि ज्ञान ऐसें जिव्हार| नेवों नेवों निरंतर| इंद्रियीं केले थोर| शब्दादिक जे ||१०१४|| ते रश्मिजाळ काढलेया| मृगजळ जाय लया| तैसें वृत्तिरोधें तयां| पांचांही केलें ||१०१५|| नेणतां अधमाचिया अन्ना| खादलिया कीजे वमना| तैसीं वोकविली सवासना| इंद्रियें विषयीं ||१०१६|| मग प्रत्यगावृत्ती चोखटें| लाविलीं गंगेचेनि तटें| ऐसीं प्रायश्चित्तें धुवटें| केलीं येणें ||१०१७|| पाठीं सात्विकें धीरें तेणें| शोधारलीं तियें करणें| मग मनेंसीं योगधारणें| मेळविलीं ||१०१८|| तेवींचि प्राचीनें इष्टानिष्टें| भोगेंसीं येउनी भेटे| तेथ देखिलियाही वोखटें| द्वेषु न करी ||१०१९|| ना गोमटेंचि विपायें| तें आणूनि पुढां सूये| तयालागीं न होये| साभिलाषु ||१०२०|| यापरी इष्टानिष्टींंं| रागद्वेष किरीटी| त्यजूनि गिरिकपाटीं | निकुंजीं वसे ||१०२१|| विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः | ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ||५२|| गजबजा सांडिलिया| वसवी वनस्थळिया| अंगाचियाचि मांदिया| एकलेया ||१०२२|| शमदमादिकीं खेळे| न बोलणेंचि चावळे| गुरुवाक्याचेनि मेळें| नेणे वेळु ||१०२३|| आणि आंगा बळ यावें| नातरी क्षुधा जावें| कां जिभेएचे पुरवावे| मनोरथ ||१०२४|| भोजन करितांविखीं| ययां तिहींतें न लेखी| आहारीं मिती संतोषीं| माप न सूये ||१०२५|| अशनाचेनि पावकें| हारपतां प्राणु पोखे| इतुकियाचि भागु मोटकें| अशन करी ||१०२६|| आणि परपुरुषें कामिली| कुळवधू आंग न घाली| निद्रालस्या न मोकली| आसन तैसें ||१०२७|| दंडवताचेनि प्रसंगें| भुयीं हन अंग लागे| वांचूनि येर नेघे| राभस्य तेथ ||१०२८|| देहनिर्वाहापुरतें| राहाटवी हातांपायांतें| किंबहुना आपैतें| सबाह्य केलें ||१०२९|| आणि मनाचा उंबरा| वृत्तीसी देखों नेदी वीरा| तेथ कें वाग्व्यापारा| अवकाशु असे ? ||१०३०|| ऐसेनि देह वाचा मानस| हें जिणौनि बाह्यप्रदेश| आकळिलें आकाश| ध्यानाचें तेणें ||१०३१|| गुरुवाक्यें उठविला| बोधीं निश्चयो आपुला| न्याहाळीं हातीं घेतला| आरिसा जैसा ||१०३२|| पैं ध्याता आपणचि परी| ध्यानरूप वृत्तिमाझारीं| ध्येयत्वें घे हे अवधारीं| ध्यानरूढी गा ||१०३३|| तेथ ध्येय ध्यान ध्याता| ययां तिहीं एकरूपता| होय तंव पंडुसुता| कीजे तें गा ||१०३४|| म्हणौनि तो मुमुक्षु| आत्मज्ञानीं जाला दक्षु| परी पुढां सूनि पक्षु| योगाभ्यासाचा ||१०३५|| अपानरंध्रद्वया| माझारीं धनंजया| पार्ष्णीं पिडूनियां| कांवरुमूळ ||१०३६|| आकुंचूनि अध| देऊनि तिन्ही बंध| करूनि एकवद| वायुभेदी ||१०३७|| कुंडलिनी जागवूनि| मध्यमा विकाशूनि| आधारादि भेदूनि| आज्ञावरी ||१०३८|| सहस्त्रदळाचा मेघु| पीयुषें वर्षोनि चांगु| तो मूळवरी वोघु| आणूनियां ||१०३९|| नाचतया पुण्यगिरी| चिद्भैरवाच्या खापरीं| मनपवनाची खीच पुरी| वाढूनियां ||१०४०|| जालिया योगाचा गाढा| मेळावा सूनि हा पुढां| ध्यान मागिलीकडां| स्वयंभ केलें ||१०४१|| आणि ध्यान योग दोन्ही| इयें आत्मतत्वज्ञानीं| पैठा होआवया निर्विघ्नीं| आधींचि तेणें ||१०४२|| वीतरागतेसारिखा| जोडूनि ठेविला सखा| तो आघवियाचि भूमिका- | सवें चाले ||१०४३|| पहावें दिसे तंववरी| दिठीतें न संडी दीप जरी| तरी कें आहे अवसरी| देखावया ||१०४४|| तैसें मोक्षीं प्रवर्तलया| वृत्ती ब्रह्मीं जाय लया| तंव वैराग्य आथी तया| भंगु कैचा ||१०४५|| म्हणौनि सवैराग्यु| ज्ञानाभ्यासु तो सभाग्यु| करूनि जाला योग्यु| आत्मलाभा ||१०४६|| ऐसी वैराग्याची आंगीं| बाणूनियां वज्रांगीं| राजयोगतुरंगीं| आरूढला ||१०४७|| वरी आड पडिलें दिठी| सानें थोर निवटी| तें बळीं विवेकमुष्टीं| ध्यानाचें खांडें ||१०४८|| ऐसेनि संसाररणाआंतु |आंधारीं सूर्य तैसा असे जातु | मोक्षविजयश्रीये वरैतु| होआवयालागीं ||१०४९|| अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् | विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते ||५३|| तेथ आडवावया आले| दोषवैरी जे धोपटिले| तयांमाजीं पहिलें| देहाहंकारु ||१०५०|| जो न मोकली मारुनी| जीवों नेदी उपजवोनि| विचंबवी खोडां घालुनी| हाडांचिया ||१०५१|| तयाचा देहदुर्ग हा थारा| मोडूनि घेतला तो वीरा| आणि बळ हा दुसरा| मारिला वैरी ||१०५२|| जो विषयाचेनि नांवें| चौगुणेंही वरी थांवे| जेणें मृतावस्था धांवे| सर्वत्र जगा ||१०५३|| तो विषय विषाचा अथावो| आघविया दोषांचा रावो| परी ध्यानखड्गाचा घावो| साहेल कैंचा ? ||१०५४|| आणि प्रिय विषयप्राप्ती| करी जया सुखाची व्यक्ती| तेचि घालूनि बुंथी| आंगीं जो वाजे ||१०५५|| जो सन्मार्गा भुलवी| मग अधर्माच्या आडवीं| सूनि वाघां सांपडवी| नरकादिकां ||१०५६|| तो विश्वासें मारितां रिपु| निवटूनि घातला दर्पु| आणि जयाचा अहा कंपु| तापसांसी ||१०५७|| क्रोधा ऐसा महादोखु| जयाचा देखा परिपाकु| भरिजे तंव अधिकु| रिता होय जो ||१०५८|| तो कामु कोणेच ठायीं| नसे ऐसें केलें पाहीं| कीं तेंचि क्रोधाही| सहजें आलें ||१०५९|| मुळाचें तोडणें जैसें| होय कां शाखोद्देशें| कामु नाशलेनि नाशे| तैसा क्रोधु ||१०६०|| म्हणौनि काम वैरी| जाला जेथ ठाणोरी| तेथ सरली वारी| क्रोधाचीही ||१०६१|| आणि समर्थु आपुला खोडा| शिसें वाहवी जैसा होडा| तैसा भुंजौनि जो गाढा| परीग्रहो ||१०६२|| जो माथांचि पालाणवी| अंगा अवगुण घालवी| जीवें दांडी घेववी| ममत्वाची ||१०६३|| शिष्यशास्त्रादिविलासें| मठादिमुद्रेचेनि मिसें| घातले आहाती फांसे| निःसंगा जेणें ||१०६४|| घरीं कुटुंबपणें सरे| तरी वनीं वन्य होऊनि अवतरे| नागवीयाही शरीरें| लागला आहे ||१०६५|| ऐसा दुर्जयो जो परीग्रहो| तयाचा फेडूनि ठावो| भवविजयाचा उत्साहो| भोगीतसे जो ||१०६६|| तेथ अमानित्वादि आघवे| ज्ञानगुणाचे जे मेळावे| ते कैवल्यदेशींचे आघवे| रावो जैसे आले ||१०६७|| तेव्हां सम्यक्ज्ञानाचिया| राणिवा उगाणूनि तया| परिवारु होऊनियां| राहत आंगें ||१०६८|| प्रवृत्तीचिये राजबिदीं| अवस्थाभेदप्रमदीं| कीजत आहे प्रतिपदीं| सुखाचें लोण ||१०६९|| पुढां बोधाचिये कांबीवरी| विवेकु दृश्याची मांदी सारी| योगभूमिका आरती करी| येती जैसिया ||१०७०|| तेथ ऋद्धिसिद्धींचीं अनेगें| वृंदें मिळती प्रसंगें| तिये पुष्पवर्षीं आंगें| नाहातसे तो ||१०७१|| ऐसेनि ब्रह्मैक्यासारिखें| स्वराज्य येतां जवळिकें| झळंबित आहे हरिखें| तिन्ही लोक ||१०७२|| तेव्हां वैरियां कां मैत्रियां| तयासि माझें म्हणावया| समानता धनंजया| उरेचिही ना ||१०७३|| हें ना भलतेणें व्याजें| तो जयातें म्हणे माझें| तें नोडवेचि कां दुजें| अद्वितीय जाला ||१०७४|| पैं आपुलिया एकी सत्ता| सर्वही कवळूनिया पंडुसुता| कहीं न लगती ममता| धाडिली तेणें ||१०७५|| ऐसा जिंतिलिया रिपुवर्गु| अपमानिलिया हें जगु| अपैसा योगतुरंगु| स्थिर जाला ||१०७६|| वैराग्याचें गाढलें| अंगी त्राण होतें भलें| तेंही नावेक ढिलें| तेव्हां करी ||१०७७|| आणि निवटी ध्यानाचें खांडें| तें दुजें नाहींचि पुढें| म्हणौनि हातु आसुडें| वृत्तीचाही ||१०७८|| जैसें रसौषध खरें| आपुलें काज करोनि पुरें| आपणही नुरे| तैसें होतसे ||१०७९|| देखोनि ठाकिता ठावो| धांवता थिरावे पावो| तैसा ब्रह्मसामीप्यें थावो| अभ्यासु सांडी ||१०८०|| घडतां महोदधीसी| गंगा वेगु सांडी जैसी| कां कामिनी कांतापासीं| स्थिर होय ||१०८१|| नाना फळतिये वेळे| केळीची वाढी मांटुळे| कां गांवापुढें वळे| मार्गु जैसा ||१०८२|| तैसा आत्मसाक्षात्कारु| होईल देखोनि गोचरु| ऐसा साधनहतियेरु| हळुचि ठेवी ||१०८३|| म्हणौनि ब्रह्मेंसी तया| ऐक्याचा समो धनंजया| होतसे तैं उपाया| वोहटु पडे ||१०८४|| मग वैराग्याची गोंधळुक| जे ज्ञानाभ्यासाचें वार्धक्य| योगफळाचाही परिपाक| दशा जे कां ||१०८५|| ते शांति पैं गा सुभगा| संपूर्ण ये तयाचिया आंगा| तैं ब्रह्म होआवया जोगा| होय तो पुरुषु ||१०८६|| पुनवेहुनी चतुर्दशी| जेतुलें उणेपण शशी| कां सोळे पाऊनि जैसी| पंधरावी वानी ||१०८७|| सागरींही पाणी वेगें| संचरे तें रूप गंगे| येर निश्चळ जें उगें| तें समुद्रु जैसा ||१०८८|| ब्रह्मा आणि ब्रह्महोतिये| योग्यते तैसा पाडु आहे| तेंचि शांतीचेनि लवलाहें| होय तो गा ||१०८९|| पैं तेंचि होणेंनवीण| प्रतीती आलें जें ब्रह्मपण| ते ब्रह्म होती जाण| योग्यता येथ ||१०९०|| ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति | समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ||५४|| ते ब्रह्मभावयोग्यता| पुरुषु तो मग पंडुसुता| आत्मबोधप्रसन्नता- | पदीं बैसे ||१०९१|| जेणें निपजे रससोय| तो तापुही जैं जाय| तैं ते कां होय| प्रसन्न जैसी ||१०९२|| नाना भरतिया लगबगा| शरत्काळीं सांडिजे गंगा| कां गीत रहातां उपांगा| वोहटु पडे ||१०९३|| तैसा आत्मबोधीं उद्यमु| करितां होय जो श्रमु| तोही जेथें समु| होऊनि जाय ||१०९४|| आत्मबोधप्रशस्ती| हे तिये दशेची ख्याती| ते भोगितसे महामती| योग्यु तो गा ||१०९५|| तेव्हां आत्मत्वें शोचावें| कांहीं पावावया कामावें| हें सरलें समभावें| भरितें तया ||१०९६|| उदया येतां गभस्ती| नाना नक्षत्रव्यक्ती| हारवीजती दीप्ती| आंगिका जेवीं ||१०९७|| तेवीं उठतिया आत्मप्रथा| हे भूतभेदव्यवस्था| मोडीत मोडीत पार्था| वास पाहे तो ||१०९८|| पाटियेवरील अक्षरें| जैसीं पुसतां येती करें| तैसीं हारपती भेदांतरें| तयाचिये दृष्टी ||१०९९|| तैसेनि अन्यथा ज्ञानें| जियें घेपती जागरस्वप्नें| तियें दोन्ही केलीं लीनें| अव्यक्तामाजीं ||११००|| मग तेंही अव्यक्त| बोध वाढतां झिजत| पुरलां बोधीं समस्त| बुडोनि जाय ||११०१|| जैसी भोजनाच्या व्यापारीं| क्षुधा जिरत जाय अवधारीं| मग तृप्तीच्या अवसरीं| नाहींच होय ||११०२|| नाना चालीचिया वाढी| वाट होत जाय थोडी| मग पातला ठायीं बुडी| देऊनि निमे ||११०३|| कां जागृति जंव जंव उद्दीपे| तंव तंव निद्रा हारपे| मग जागीनलिया स्वरूपें| नाहींच होय ||११०४|| हें ना आपुलें पूर्णत्व भेटें| जेथ चंद्रासीं वाढी खुंटे| तेथ शुक्लपक्षु आटे| निःशेषु जैसा ||११०५|| तैसा बोध्यजात गिळितु| बोधु बोधें ये मज आंतु| मिसळला तेथ साद्यंतु| अबोधु गेला ||११०६|| तेव्हां कल्पांताचिये वेळे| नदी सिंधूचें पेंडवळें| मोडूनि भरलें जळें |आब्रह्म जैसें ||११०७|| नाना गेलिया घट मठ| आकाश ठाके एकवट| कां जळोनि काष्ठें काष्ठ| वन्हीचि होय ||११०८|| नातरी लेणियांचे ठसे| आटोनि गेलिया मुसे| नामरूप भेदें जैसें| सांडिजे सोनें ||११०९|| हेंही असो चेइलया| तें स्वप्न नाहीं जालया| मग आपणचि आपणयां| उरिजे जैसें ||१११०|| तैसी मी एकवांचूनि कांहीं| तया तयाहीसकट नाहीं| हे चौथी भक्ति पाहीं| माझी तो लाहे ||११११|| येर आर्तु जिज्ञासु अर्थार्थी| हे भजती जिये पंथीं| ते तिन्ही पावोनी चौथी| म्हणिपत आहे ||१११२|| येऱ्हवीं तिजी ना चौथी| हे पहिली ना सरती| पैं माझिये सहजस्थिती| भक्ति नाम ||१११३|| जें नेणणें माझें प्रकाशूनि| अन्यथात्वें मातें दाऊनि| सर्वही सर्वीं भजौनि| बुझावीतसे जे ||१११४|| जो जेथ जैसें पाहों बैसे| तया तेथ तैसेंचि असे| हें उजियेडें कां दिसे| अखंडें जेणें ||१११५|| स्वप्नाचें दिसणें न दिसणें| जैसें आपलेनि असलेपणें| विश्वाचें आहे नाहीं जेणें| प्रकाशें तैसें ||१११६|| ऐसा हा सहज माझा| प्रकाशु जो कपिध्वजा| तो भक्ति या वोजा| बोलिजे गा ||१११७|| म्हणौनि आर्ताच्या ठायीं| हे आर्ति होऊनि पाहीं| अपेक्षणीय जें कांहीं | तें मीचि केला ||१११८|| जिज्ञासुपुढां वीरेशा| हेचि होऊनि जिज्ञासा| मी कां जिज्ञास्यु ऐसा| दाखविला ||१११९|| हेंचि होऊनि अर्थना| मीचि माझ्या अर्थीं अर्जुना| करूनि अर्थाभिधाना| आणी मातें ||११२०|| एवं घेऊनि अज्ञानातें| माझी भक्ति जे हे वर्ते| ते दावी मज द्रष्टयातें| दृश्य करूनि ||११२१|| येथें मुखचि दिसे मुखें| या बोला कांहीं न चुके| तरी दुजेपण हें लटिकें| आरिसा करी ||११२२|| दिठी चंद्रचि घे साचें| परी येतुलें हें तिमिराचें| जे एकचि असे तयाचे| दोनी दावी ||११२३|| तैसा सर्वत्र मीचि मियां| घेपतसें भक्ति इया| परी दृश्यत्व हें वायां| अज्ञानवशें ||११२४|| तें अज्ञान आतां फिटलें| माझें दृष्टृत्व मज भेटलें| निजबिंबीं एकवटलें| प्रतिबिंब जैसें ||११२५|| पैं जेव्हांही असे किडाळ| तेव्हांही सोनेंचि अढळ| परी तें कीड गेलिया केवळ| उरे जैसें ||११२६|| हां गा पूर्णिमे आधीं कायी| चंद्रु सावयवु नाहीं ? | परी तिये दिवशीं भेटे पाहीं| पूर्णता तया ||११२७|| तैसा मीचि ज्ञानद्वारें| दिसें परी हस्तांतरें| मग दृष्टृत्व तें सरे| मियांचि मी लाभें ||११२८|| म्हणौनि दृश्यपथा- | अतीतु माझा पार्था| भक्तियोगु चवथा| म्हणितला गा ||११२९|| भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः | ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ||५५|| या ज्ञान भक्ति सहज| भक्तु एकवटला मज| मीचि केवळ हें तुज| श्रुतही आहे ||११३०|| जे उभऊनियां भुजा| ज्ञानिया आत्मा माझा| हे बोलिलों कपिध्वजा| सप्तमाध्यायीं ||११३१|| ते कल्पादीं भक्ति मियां| श्रीभागवतमिषें ब्रह्मया| उत्तम म्हणौनि धनंजया| उपदेशिली ||११३२|| ज्ञानी इयेतें स्वसंवित्ती| शैव म्हणती शक्ती| आम्ही परम भक्ती| आपुली म्हणो ||११३३|| हे मज मिळतिये वेळे| तया क्रमयोगियां फळे| मग समस्तही निखिळें| मियांचि भरे ||११३४|| तेथ वैराग्य विवेकेंसी| आटे बंध मोक्षेंसीं| वृत्ती तिये आवृत्तीसीं| बुडोनि जाय ||११३५|| घेऊनि ऐलपणातें| परत्व हारपें जेथें| गिळूनि चाऱ्ही भूतें| आकाश जैसें ||११३६|| तया परी थडथाद| साध्यसाधनातीत शुद्ध| तें मी होऊनि एकवद| भोगितो मातें ||११३७|| घडोनि सिंधूचिया आंगा| सिंधूवरी तळपे गंगा| तैसा पाडु तया भोगा| अवधारी जो ||११३८|| कां आरिसयासि आरिसा| उटूनि दाविलिया जैसा| देखणा अतिशयो तैसा| भोगणा तिये ||११३९|| हे असो दर्पणु नेलिया| तो मुख बोधुही गेलिया| देखलेंपण एकलेया| आस्वादिजे जेवीं ||११४०|| चेइलिया स्वप्न नाशे| आपलें ऐक्यचि दिसे| ते दुजेनवीण जैसें| भोगिजे का ||११४१|| तोचि जालिया भोगु तयाचा| न घडे हा भावो जयांचा| तिहीं बोलें केवीं बोलाचा| उच्चारु कीजे ||११४२|| तयांच्या नेणों गांवीं| रवी प्रकाशी हन दिवी| कीं व्योमालागीं मांडवी| उभिली तिहीं ||११४३|| हां गा राजन्यत्व नव्हतां आंगीं| रावो रायपण काय भोगी ? | कां आंधारु हन आलिंगी| दिनकरातें ? ||११४४|| आणि आकाश जें नव्हे| तया आकाश काय जाणवे ? | रत्नाच्या रूपीं मिरवे| गुंजांचें लेणें ? ||११४५|| म्हणौनि मी होणें नाहीं| तया मीचि आहें केहीं| मग भजेल हें कायी| बोलों कीर ||११४६|| यालागीं तो क्रमयोगी| मी जालाचि मातें भोगी| तारुण्य कां तरुणांगीं| जियापरी ||११४७|| तरंग सर्वांगीं तोय चुंबी| प्रभा सर्वत्र विलसे बिंबीं| नाना अवकाश नभीं| लुंठतु जैसा ||११४८|| तैसा रूप होऊनि माझें| मातें क्रियावीण तो भजे| अलंकारु का सहजें| सोनयातें जेवीं ||११४९|| का चंदनाची द्रुती जैसी| चंदनीं भजे अपैसी| का अकृत्रिम शशीं| चंद्रिका ते ||११५०|| तैसी क्रिया कीर न साहे| तऱ्ही अद्वैतीं भक्ति आहे| हें अनुभवाचिजोगें नव्हे| बोलाऐसें ||११५१|| तेव्हां पूर्वसंस्कार छंदें| जें कांहीं तो अनुवादे| तेणें आळविलेनि वो दें| बोलतां मीचि ||११५२|| बोलतया बोलताचि भेटे| तेथें बोलिलें हें न घटे| तें मौन तंव गोमटें| स्तवन माझें ||११५३|| म्हणौनि तया बोलतां| बोली बोलतां मी भेटतां| मौन होय तेणें तत्वतां| स्तवितो मातें ||११५४|| तैसेंचि बुद्धी का दिठी| जें तो देखों जाय किरीटी| तें देखणें दृश्य लोटी| देखतेंचि दावी ||११५५|| आरिसया आधीं जैसें| देखतेंचि मुख दिसेअ| तयाचें देखणें तैसें| मेळवी द्रष्टें ||११५६|| दृश्य जाउनियां द्रष्टें| द्रष्टयासीचि जैं भेटे| तैं एकलेपणें न घटे| द्रष्टेपणही ||११५७|| तेथ स्वप्नींचिया प्रिया| चेवोनि झोंबो गेलिया| ठायिजे दोन्ही न होनियां| आपणचि जैसें ||११५८|| का दोहीं काष्ठाचिये घृष्टी- | माजीं वन्हि एक उठी| तो दोन्ही हे भाष आटी| आपणचि होय ||११५९|| नाना प्रतिबिंब हातीं| घेऊं गेलिया गभस्ती| बिंबताही असती| जाय जैसी ||११६०|| तैसा मी होऊनि देखतें| तो घेऊं जाय दृश्यातें| तेथ दृश्य ने थितें| द्रष्टृत्वेंसीं ||११६१|| रवि आंधारु प्रकाशिता| नुरेचि जेवीं प्रकाश्यता| तेंवीं दृश्यीं नाही द्रष्टृता| मी जालिया ||११६२|| मग देखिजे ना न देखिजे| ऐसी जे दशा निपजे| ते तें दर्शन माझें| साचोकारें ||११६३|| तें भलतयाही किरीटी| पदार्थाचिया भेटी| द्रष्टृदृश्यातीता दृष्टी| भोगितो सदा ||११६४|| आणि आकाश हें आकाशें| दाटलें न ढळें जैसें| मियां आत्मेन आपणपें तैसें| जालें तया ||११६५|| कल्पांतीं उदक उदकें| रुंधिलिया वाहों ठाके| तैसा आत्मेनि मियां येकें| कोंदला तो ||११६६|| पावो आपणपयां वोळघे ? | केवीं वन्हि आपणपयां लागे ? | आपणपां पाणी रिघे| स्नाना कैसें ? ||११६७|| म्हणौनि सर्व मी जालेपणें| ठेलें तया येणें जाणें| तेंचि गा यात्रा करणें| अद्वया मज ||११६८|| पैं जळावरील तरंगु| जरी धाविन्नला सवेगु| तरी नाहीं भूमिभागु| क्रमिला तेणें ||११६९|| जें सांडावें कां मांडावें| जें चालणें जेणें चालावें| तें तोयचि एक आघवें| म्हणौनियां ||११७०|| गेलियाही भलतेउता| उदकपणेंं पंडुसुता| तरंगाची एकात्मता| न मोडेचि जेवीं ||११७१|| तैसा मीपणें हा लोटला| तो आघवेंयाचि मजआंतु आला| या यात्रा होय भला| कापडी माझा ||११७२|| आणि शरीर स्वभाववशें| कांहीं येक करूं जरी बैसे| तरी मीचि तो तेणें मिषें| भेटे तया ||११७३|| तेथ कर्म आणि कर्ता| हें जाऊनि पंडुसुता| मियां आत्मेनि मज पाहतां| मीचि होय ||११७४|| पैं दर्पणातेंं दर्पणें| पाहिलिया होय न पाहणें| सोनें झांकिलिया सुवर्णें| ना झांकें जेवीं ||११७५|| दीपातें दीपें प्रकाशिजे| तें न प्रकाशणेंचि निपजे| तैसें कर्म मियां कीजे| तें करणें कैंचें ? ||११७६|| कर्मही करितचि आहे| जैं करावें हें भाष जाये| तैं न करणेंचि होये| तयाचें केलें ||११७७|| क्रियाजात मी जालेपणें| घडे कांहींचि न करणें| तयाचि नांव पूजणें| खुणेचें माझें ||११७८|| म्हणौनि करीतयाही वोजा| तें न करणें हेंचि कपिध्वजा| निफजे तिया महापूजा| पूजी तो मातें ||११७९|| एवं तो बोले तें स्तवन| तो देखे तें दर्शन| अद्वया मज गमन| तो चाले तेंचि ||११८०|| तो करी तेतुली पूजा| तो कल्पी तो जपु माझा| तो असे तेचि कपिध्वजा| समाधी माझी ||११८१|| जैसें कनकेंसी कांकणें| असिजे अनन्यपणें| तो भक्तियोगें येणें| मजसीं तैसा ||११८२|| उदकीं कल्लोळु| कापुरीं परीमळु| रत्नीं उजाळु| अनन्यु जैसा ||११८३|| किंबहुना तंतूंसीं पटु| कां मृत्तिकेसीं घटु| तैसा तो एकवटु| मजसीं माझा ||११८४|| इया अनन्यसिद्धा भक्ती| या आघवाचि दृश्यजातीं| मज आपणपेंया सुमती| द्रष्टयातें जाण ||११८५|| तिन्ही अवस्थांचेनि द्वारें| उपाध्युपहिताकारें| भावाभावरूप स्फुरे| दृश्य जें हें ||११८६|| तें हें आघवेंचि मी द्रष्टा| ऐसिया बोधाचा माजिवटा| अनुभवाचा सुभटा| धेंडा तो नाचे ||११८७|| रज्जु जालिया गोचरु| आभासतां तो व्याळाकारु| रज्जुचि ऐसा निर्धारु| होय जेवीं ||११८८|| भांगारापरतें कांहीं| लेणें गुंजहीभरी नाहीं| हें आटुनियां ठायीं| कीजे जैसे ||११८९|| उदका येकापरतें | तरंग नाहींचि हें निरुतें| जाणोनि तया आकारातें| न घेपे जेवीं ||११९०|| नातरी स्वप्नविकारां समस्तां| चेऊनियां उमाणें घेतां| तो आपणयापरौता| न दिसे जैसा ||११९१|| तैसें जें कांहीं आथी नाथी| येणें होय ज्ञेयस्फुर्ती| तें ज्ञाताचि मी हें प्रतीती| होऊनि भोगी ||११९२|| जाणे अजु मी अजरु| अक्षयो मी अक्षरु| अपूर्वु मी अपारु| आनंदु मी ||११९३|| अचळु मी अच्युतु| अनंतु मी अद्वैतु| आद्यु मी अव्यक्तु| व्यक्तुही मी ||११९४|| ईश्य मी ईश्वरु| अनादि मी अमरु| अभय मी आधारु| आधेय मी ||११९५|| स्वामी मी सदोदितु| सहजु मी सततु| सर्व मी सर्वगतु| सर्वातीतु मी ||११९६|| नवा मी पुराणु| शून्यु मी संपूर्णु| स्थुलु मी अणु| जें कांहीं तें मी ||११९७|| अक्रियु मी येकु| असंगु मी अशोकु| व्यापु मी व्यापकु| पुरुषोत्तमु मी ||११९८|| अशब्दु मी अश्रोत्रु| अरूपु मी अगोत्रु| समु मी स्वतंत्रु| ब्रह्म मी परु ||११९९|| ऐसें आत्मत्वें मज एकातें| इया अद्वयभक्ती जाणोनि निरुतें| आणि याही बोधा जाणतें| तेंही मीचि जाणें ||१२००|| पैं चेइलेयानंतरें| आपुलें एकपण उरे| तेंही तोंवरी स्फुरे| तयाशींचि जैसें ||१२०१|| कां प्रकाशतां अर्कु| तोचि होय प्रकाशकु| तयाही अभेदा द्योतकु| तोचि जैसा ||१२०२|| तैसा वेद्यांच्या विलयीं| केवळ वेएदकु उरे पाहीं| तेणें जाणवें तया तेंही| हेंही जो जाणे ||१२०३|| तया अद्वयपणा आपुलिया| जाणती ज्ञप्ती जे धनंजया| ते ईश्वरचि मी हे तया| बोधासि ये ||१२०४|| मग द्वैताद्वैतातीत| मीचि आत्मा एकु निभ्रांत| हें जाणोनि जाणणें जेथ| अनुभवीं रिघे ||१२०५|| तेथ चेइलियां येकपण| दिसे जे आपुलया आपण| तेंही जातां नेणों कोण| होईजे जेवीं ||१२०६|| कां डोळां देखतिये क्षणीं| सुवर्णपण सुवर्णीं| नाटितां होय आटणी| अळंकाराचीही ||१२०७|| नाना लवण तोय होये| मग क्षारता तोयत्वें राहे| तेही जिरतां जेवीं जाये| जालेपण तें ||१२०८|| तैसा मी तो हें जें असे | तें स्वानंदानुभवसमरसें| कालवूनिया प्रवेशे| मजचिमाजीं ||१२०९|| आणि तो हे भाष जेथ जाये| तेथे मी हें कोण्हासी आहे| ऐसा मी ना तो तिये सामाये| माझ्याचि रूपीं ||१२१०|| जेव्हां कापुर जळों सरे| तयाचि नाम अग्नि पुरेए| मग उभयतातीत उरे| आकाश जेवीं ||१२११|| का धाडलिया एका एकु| वाढे तो शून्य विशेखु| तैसा आहे नाहींचा शेखु| मीचि मग आथी ||१२१२|| तेथ ब्रह्मा आत्मा ईशु| यया बोला मोडे सौरसु| न बोलणें याही पैसु| नाहीं तेथ ||१२१३|| न बोलणेंही न बोलोनी| तें बोलिजे तोंड भरुनी| जाणिव नेणिव नेणोनी| जाणिजे तें ||१२१४|| तेथ बुझिजे बोधु बोधें| आनंंदु घेपे आनंदें| सुखावरी नुसधें| सुखचि भोगिजे ||१२१५|| तेथ लाभु जोडला लाभा| प्रभा आलिंगिली प्रभा| विस्मयो बुडाला उभा| विस्मयामाजीं ||१२१६|| शमु तेथ सामावला| विश्रामु विश्रांति आला| अनुभवु वेडावला| अनुभूतिपणें ||१२१७|| किंबहुना ऐसें निखळ| मीपण जोडे तया फळ| सेवूनि वेली वेल्हाळ| क्रमयोगाची ते ||१२१८|| पैं क्रमयोगिया किरीटी| चक्रवर्तीच्या मुकुटीं| मी चिद्रत्न तें साटोवाटीं| होय तो माझा ||१२१९|| कीं क्रमयोगप्रासादाचा| कळसु जो हा मोक्षाचा| तयावरील अवकाशाचा| उवावो जाला तो ||१२२०|| नाना संसार आडवीं| क्रमयोग वाट बरवी| जोडिली ते मदैक्यगांवीं| पैठी जालीसे ||१२२१|| हें असो क्रमयोगबोधें| तेणें भक्तिचिद्गांगें| मी स्वानंदोदधी वेगें| ठाकिला कीं गा ||१२२२|| हा ठायवरी सुवर्मा| क्रमयोगीं आहे महिमा| म्हणौनि वेळोवेळां तुम्हां| सांगतों आम्ही ||१२२३|| पैं देशें काळें पदार्थें| साधूनि घेइजे मातें| तैसा नव्हे मी आयतें| सर्वांचें सर्वही ||१२२४|| म्हणौनि माझ्या ठायीं| जाचावें न लगे कांहीं| मी लाभें इयें उपायीं| साचचि गा ||१२२५|| एक शिष्य एक गुरु| हा रूढला साच व्यवहारु| तो मत्प्राप्तिप्रकारु| जाणावया ||१२२६|| अगा वसुधेच्या पोटीं| निधान सिद्ध किरीटी| वन्हि सिद्ध काष्ठीं| वोहां दूध ||१२२७|| परी लाभे तें असतें| तया कीजे उपायातें| येर सिद्धचि तैसा तेथें| उपायीं मी ||१२२८|| हा फळहीवरी उपावो| कां पां प्रस्तावीतसे देवो| हे पुसतां परी अभिप्रावो| येथिंचा ऐसा ||१२२९|| जे गीतार्थाचें चांगावें| मोक्षोपायपर आघवें| आन शास्त्रोपाय कीं नव्हे| प्रमाणसिद्ध ||१२३०|| वारा आभाळचि फेडी| वांचूनि सूर्यातें न घडी| कां हातु बाबुळी धाडी| तोय न करी ||१२३१|| तैसा आत्मदर्शनीं आडळु| असे अविद्येचा जो मळु| तो शास्त्र नाशी येरु निर्मळु| मी प्रकाशें स्वयें ||१२३२|| म्हणौनि आघवींचि शास्त्रें| अविद्याविनाशाचीं पात्रें| वांचोनि न होतीं स्वतंत्रें| आत्मबोधीं ||१२३३|| तया अध्यात्मशास्त्रांसीं| जैं साचपणाची ये पुसी| तैं येइजे जया ठायासी| ते हे गीता ||१२३४|| भानुभूषिता प्राचिया| सतेजा दिशा आघविया| तैसी शास्त्रेश्वरा गीता या| सनाथें शास्त्रें ||१२३५|| हें असो येणें शास्त्रेश्वरें| मागां उपाय बहुवे विस्तारें| सांगितला जैसा करें| घेवों ये आत्मा ||१२३६|| परी प्रथमश्रवणासवें| अर्जुना विपायें हें फावे| हा भावो सकणवे| धरूनि श्रीहरी ||१२३७|| तेंचि प्रमेय एक वेळ| शिष्यीं होआवया अढळ| सांगतसे मुकुल| मुद्रा आतां ||१२३८|| आणि प्रसंगें गीता| ठावोही हा संपता| म्हणौनि दावी आद्यंता| एकार्थत्व ||१२३९|| जे ग्रंथाच्या मध्यभागीं| नाना अधिकारप्रसंगीं| निरूपण अनेगीं| सिद्धांतीं केलें ||१२४०|| तरी तेतुलेही सिद्धांत| इयें शास्त्रीं प्रस्तुत| हे पूर्वापर नेणत| कोण्ही जैं मानी ||१२४१|| तैं महासिद्धांताचा आवांका| सिद्धांतकक्षा अनेका| भिडऊनि आरंभु देखा| संपवीतु असे ||१२४२|| एथ अविद्यानाशु हें स्थळ| तेणें मोक्षोपादान फळ| या दोहीं केवळ| साधन ज्ञान ||१२४३|| हें इतुलेंचि नानापरी| निरूपिलें ग्रंथविस्तारीं| तें आतां दोहीं अक्षरीं| अनुवादावें ||१२४४|| म्हणौनि उपेयही हातीं| जालया उपायस्थिती| देव प्रवर्तले तें पुढती| येणेंचि भावें ||१२४५|| सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः | मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् ||५६|| मग म्हणे गा सुभटा| तो क्रमयोगिया निष्ठा| मी होउनी होय पैठा| माझ्या रूपीं ||१२४६|| स्वकर्माच्या चोखौळीं| मज पूजा करूनि भलीं| तेणें प्रसादें आकळी| ज्ञाननिष्ठेतें ||१२४७|| ते ज्ञाननिष्ठा जेथ हातवसे| तेथ भक्ति माझी उल्लासे| तिया भजन समरसें| सुखिया होय ||१२४८|| आणि विश्वप्रकाशितया| आत्मया मज आपुलिया| अनुसरे जो करूनियां| सर्वत्रता हे ||१२४९|| सांडूनि आपुला आडळ| लवण आश्रयी जळ| कां हिंडोनि राहे निश्चळ| वायु व्योमीं ||१२५०|| तैसा बुद्धी वाचा कायें| जो मातें आश्रऊनि ठाये| तो निषिद्धेंही विपायें| कर्में करूं ||१२५१|| परी गंगेच्या संबंधीं | बिदी आणि महानदी| येक तेवीं माझ्या बोधीं| शुभाशुभांसी ||१२५२|| कां बावनें आणि धुरें| हा निवाडु तंवचि सरे| जंव न घेपती वैश्वानरें| कवळूनि दोन्ही ||१२५३|| ना पांचिकें आणि सोळें| हें सोनया तंवचि आलें| जंव परिसु आंगमेळें| एकवटीना ||१२५४|| तैसें शुभाशुभ ऐसें| हें तंवचिवरी आभासे| जंव येकु न प्रकाशे| सर्वत्र मी ||१२५५|| अगा रात्री आणि दिवो| हा तंवचि द्वैतभावो| जंव न रिगिजे गांवो| गभस्तीचा ||१२५६|| म्हणौनि माझिया भेटी| तयाचीं सर्व कर्में किरीटी| जाऊनि बैसे तो पाटीं| सायुज्याच्या ||१२५७|| देशें काळें स्वभावें| वेंचु जया न संभवे| तें पद माझें पावे| अविनाश तो ||१२५८|| किंबहुना पंडुसुता| मज आत्मयाची प्रसन्नता| लाहे तेणें न पविजतां| लाभु कवणु असे ||१२५९|| चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः | बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव ||५७|| याकारणें गा तुवां इया| सर्व कर्मा आपुलिया| माझ्या स्वरूपीं धनंजया| संन्यासु कीजे ||१२६०|| परी तोचि संन्यासु वीरा| करणीयेचा झणें करा| आत्मविवेकीं धरा| चित्तवृत्ति हे ||१२६१|| मग तेणें विवेकबळें| आपणपें कर्मावेगळें| माझ्या स्वरूपीं निर्मळें| देखिजेल ||१२६२|| आणि कर्माचि जन्मभोये| प्रकृति जे का आहे| ते आपणयाहूनि बहुवे| देखसी दूरी ||१२६३|| तेथ प्रकृति आपणयां| वेगळी नुरे धनंजया| रूपेंवीण का छाया| जियापरी ||१२६४|| ऐसेनि प्रकृतिनाशु| जालया कर्मसंन्यासु| निफजेल अनायासु| सकारणु ||१२६५|| मग कर्मजात गेलया| मी आत्मा उरें आपणपयां| तेथ बुद्धि घापे करूनियां| पतिव्रता ||१२६६|| बुद्धि अनन्य येणें योगें| मजमाजीं जैं रिगे| तैं चित्त चैत्यत्यागें| मातेंचि भजे ||१२६७|| ऐसें चैत्यजातें सांडिलें| चित्त माझ्या ठायीं जडलें| ठाके तैसें वहिलें| सर्वदा करी ||१२६८|| मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि | अथ चेत्त्वमहंकारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि ||५८|| मग अभिन्ना इया सेवा| चित्त मियांचि भरेल जेधवां| माझा प्रसादु जाण तेधवां| संपूर्ण जाहला ||१२६९|| तेथ सकळ दुःखधामें| भुंजीजती जियें मृत्युजन्में| तियें दुर्गमेंचि सुगमें| होती तुज ||१२७०|| सूर्याचेनि सावायें| डोळा सावाइला होये| तैं अंधाराचा आहे| पाडु तया ? ||१२७१|| तैसा माझेनि प्रसादें| जीवकणु जयाचा उपमर्दे| तो संसराचेनी बाधे| बागुलें केवीं ? ||१२७२|| म्हणौनि धनंजया| तूं संसारदुर्गती यया| तरसील माझिया| प्रसादास्तव ||१२७३|| अथवा हन अहंभावें| माझें बोलणें हें आघवें| कानामनाचिये शिंवे| नेदिसी टेंकों ||१२७४|| तरी नित्य मुक्त अव्ययो| तूं आहासि तें होऊनि वावो| देहसंबंधाचा घावो| वाजेल आंगीं ||१२७५|| जया देहसंबंधा आंतु| प्रतिपदीं आत्मघातु| भुंजतां उसंतु| कहींचि नाहीं ||१२७६|| येवढेनि दारुणें| निमणेनवीण निमणें| पडेल जरी बोलणें| नेघसी माझें ||१२७७|| यदहंकारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे | मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ||५९|| पथ्यद्वेषिया पोषी ज्वरु| कां दीपद्वेषिया अंधकारु| विवेकद्वेषें अहंकारु| पोषूनि तैसा ||१२७८|| स्वदेहा नाम अर्जुनु| परदेहा नाम स्वजनु| संग्रामा नाम मलिनु| पापाचारु ||१२७९|| इया मती आपुलिया| तिघां तीन नामें ययां| ठेऊनियां धनंजया| न झुंजें ऐसा ||१२८०|| जीवामाजीं निष्टंकु| करिसी जो आत्यंतिकु| तो वायां धाडील नैसर्गिकु| स्वभावोचि तुझा ||१२८१|| आणि मी अर्जुन हे आत्मिक| ययां वधु करणें हें पातक| हे मायावांचूनि तात्त्विक| कांहीं आहे ? ||१२८२|| आधीं जुंझार तुवां होआवें| मग झुंजावया शस्त्र घेयावें| कां न जुंझावया करावें| देवांगण ||१२८३|| म्हणौनि न झुंजणें| म्हणसी तें वायाणें| ना मानूं लोकपणें| लोकदृष्टीही ||१२८४|| तऱ्ही न झुंजें ऐसें| निष्टंकीसी जें मानसें| तें प्रकृति अनारिसें| करवीलचि ||१२८५|| स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा | कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोपि तत् ||६०|| पैं पूर्वे वाहतां पाणी| पव्हिजे पश्चिमेचे वाहणीं| तरी आग्रहोचि उरे तें आणी| आपुलिया लेखा ||१२८६|| कां साळीचा कणु म्हणे| मी नुगवें साळीपणें| तरी आहे आन करणें| स्वभावासी ? ||१२८७|| तैसा क्षात्रंस्कारसिद्धा| प्रकृती घडिलासी प्रबुद्धा| आता नुठी म्हणसी हा धांदा| परी उठवीजसीचि तूं ||१२८८|| पैं शौर्य तेज दक्षता| एवमादिक पंडुसुता | गुण दिधले जन्मतां| प्रकृती तुज ||१२८९|| तरी तयाचिया समवाया- | अनुरूप धनंजया| न करितां उगलियां| नयेल असों ||१२९०|| म्हणौनियां तिहीं गुणीं| बांधिलासि तूं कोदंडपाणी| त्रिशुद्धी निघसी वाहणीं| क्षात्राचिया ||१२९१|| ना हें आपुलें जन्ममूळ| न विचारीतचि केवळ| न झुंजें ऐसें अढळ| व्रत जरी घेसी ||१२९२|| तरी बांधोनि हात पाये| जो रथीं घातला होये| तो न चाले तरी जाये| दिगंता जेवीं ||१२९३|| तैसा तूं आपुलियाकडुनी| मीं कांहींच न करीं म्हणौनि| ठासी परी भरंवसेनि| तूंचि करिसी ||१२९४|| उत्तरु वैराटींचा राजा| पळतां तूं कां निघालासी झुंजा ? | हा क्षात्रस्वभावो तुझा| झुंजवील तुज ||१२९५|| महावीर अकरा अक्षौहिणी| तुवां येकें नागविले रणांगणीं| तो स्वभावो कोदंडपाणी| झुंजवील तूंतें ||१२९६|| हां गा रोगु कायी रोगिया| आवडे दरिद्र दरिद्रिया ? | परी भोगविजे बळिया| अदृष्टें जेणें ||१२९७|| तें अदृष्ट अनारिसें| न करील ईश्वरवशें| तो ईश्वरुही असे | हृदयीं तुझ्या ||१२९८|| ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति | भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ||६१|| सर्व भूतांच्या अंतरीं| हृदय महाअंबरीं| चिद्वृत्तीच्या सहस्त्रकरीं| उदयला असे जो ||१२९९|| अवस्थात्रय तिन्हीं लोक| प्रकाशूनि अशेख| अन्यथादृष्टि पांथिक| चेवविले ||१३००|| वेद्योदकाच्या सरोवरीं| फांकतां विषयकल्हारीं| इंद्रियषट्पदा चारी| जीवभ्रमरातें ||१३०१|| असो रूपक हें तो ईश्वरु| सकल भूतांचा अहंकारु| पांघरोनि निरंतरु| उल्हासत असे ||१३०२|| स्वमायेचें आडवस्त्र| लावूनि एकला खेळवी सूत्र| बाहेरी नटी छायाचित्र| चौऱ्याशीं लक्ष ||१३०३|| तया ब्रह्मादिकीटांता| अशेषांही भूतजातां| देहाकार योग्यता| पाहोनि दावी ||१३०४|| तेथ जें देह जयापुढें| अनुरूपपणें मांडे| तें भूत तया आरूढे| हें मी म्हणौनि ||१३०५|| सूत सूतें गुंतलें| तृण तृणचि बांधलें| कां आत्मबिंबा घेतलें| बाळकें जळीं ||१३०६|| तयापरी देहाकारें| आपणपेंचि दुसरें| देखोनि जीव आविष्करें| आत्मबुद्धि ||१३०७|| ऐसेनि शरीराकारीं| यंत्रीं भूतें अवधारीं| वाहूनि हालवी दोरी| प्राचीनाची ||१३०८|| तेथ जया जें कर्मसूत्र| मांडूनि ठेविलें स्वतंत्र| तें तिये गती पात्र| होंचि लागे ||१३०९|| किंबहुना धनुर्धरा| भूतांतें स्वर्गसंसारा | - माजीं भोवंडी तृणें वारा| आकाशीं जैसा ||१३१०|| भ्रामकाचेनि संगें| जैसें लोहो वेढा रिगे| तैसीं ईश्वरसत्तायोगें| चेष्टती भूतें ||१३११|| जैसे चेष्टा आपुलिया| समुद्रादिक धनंजया| चेष्टती चंद्राचिया| सन्निधी येकीं ||१३१२|| तया सिंधू भरितें दाटें| सोमकांता पाझरु फुटे| कुमुदांचकोरांचा फिटे| संकोचु तो ||१३१३|| तैसीं बीजप्रकृतिवशें| अनेकें भूतें येकें ईशें| चेष्टवीजती तो असे | तुझ्या हृदयीं ||१३१४|| अर्जुनपण न घेतां| मी ऐसें जें पंडुसुता| उठतसे तें तत्वता| तयाचें रूप ||१३१५|| यालागीं तो प्रकृतीतें| प्रवर्तवील हें निरुतें| आणि तें झुंजवील तूंतें| न झुंजशी जऱ्ही ||१३१६|| म्हणौनि ईश्वर गोसावी| तेणें प्रकृती हे नेमावी| तिया सुखें राबवावीं| इंद्रियें आपुलीं ||१३१७|| तूं करणें न करणें दोन्हीं| लाऊनि प्रकृतीच्या मानीं| प्रकृतीही कां अधीनी| हृदयस्था जया ||१३१८|| तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत | तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् ||६२|| तया अहं वाचा चित्त आंग| देऊनिया शरण रिग| महोदधी कां गांग| रिगालें जैसें ||१३१९|| मग तयाचेनि प्रसादें| सर्वोपशांतिप्रमदे| कांतु होऊनिया स्वानंदें| स्वरूपींचि रमसी ||१३२०|| संभूति जेणें संभवे| विश्रांति जेथें विसंवे| अनुभूतिही अनुभवे| अनुभवा जया ||१३२१|| तिये निजात्मपदींचा रावो| होऊनि ठाकसी अव्यवो| म्हणे लक्ष्मीनाहो| पार्था तूं गा ||१३२२|| इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया | विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ||६३|| हें गीता नाम विख्यात| सर्ववाङ्गमयाचें मथित| आत्मा जेणें हस्तगत| रत्न होय ||१३२३|| ज्ञान ऐसिया रूढी| वेदांतीं जयाची प्रौढी| वानितां कीर्ति चोखडी| पातली जगीं ||१३२४|| बुद्ध्यादिकें डोळसें| हें जयाचें कां कडवसें| मी सर्वद्रष्टाही दिसें| पाहला जया ||१३२५|| तें हें गा आत्मज्ञान| मज गोप्याचेंही गुप्त धन| परी तूं म्हणौनि आन| केवीं करूं ? ||१३२६|| याकारणें गा पांडवा| आम्हीं आपुला हा गुह्य ठेवा| तुज दिधला कणवा| जाकळिलेपणें ||१३२७|| जैसी भुलली वोरसें| माय बोले बाळा दोषें| प्रीति ही परी तैसें| न करूंचि हो ||१३२८|| येथ आकाश आणि गाळिजे| अमृताही साली फेडिजे| कां दिव्याकरवीं करविजे| दिव्य जैसे ||१३२९|| जयाचेनि अंगप्रकाशें| पाताळींचा परमाणु दिसे| तया सूर्याहि का जैसे| अंजन सूदलें ||१३३०|| तैसें सर्वज्ञेंही मियां| सर्वही निर्धारूनियां| निकें होय तें धनंजया| सांगितलें तुज ||१३३१|| आतां तूं ययावरी| निकें हें निर्धारीं| निर्धारूनि करीं| आवडे तैसें ||१३३२|| यया देवाचिया बोला| अर्जुनु उगाचि ठेला| तेथ देवो म्हणती भला| अवंचकु होसी ||१३३३|| वाढतयापुढें भुकेला| उपरोधें म्हणे मी धाला| तैं तोचि पीडे आपुला| आणि दोषुही तया ||१३३४|| तैसा सर्वज्ञु श्रीगुरु| भेटलिया आत्मनिर्धारु| न पुसिजे जैं आभारु| धरूनियां ||१३३५|| तैं आपणपेंचि वंचे| आणि पापही वंचनाचें| आपणयाचि साचें| चुकविलें तेणें ||१३३६|| पैं उगेपणा तुझिया| हा अभिप्रावो कीं धनंजया| जें एकवेळ आवांकुनियां| सांगावें ज्ञान ||१३३७|| तेथ पार्थु म्हणे दातारा| भलें जाणसी माझिया अंतरा| हें म्हणों तरी दुसरा| जाणता असे काई ? ||१३३८|| येर ज्ञेय हें जी आघवें| तूं ज्ञाता एकचि स्वभावें| मा सूर्यु म्हणौनि वानावें| सूर्यातें काई ? ||१३३९|| या बोला श्रीकृष्णें| म्हणितलें काय येणें| हेंचि थोडें गा वानणें| जें बुझतासि तूं ||१३४०|| सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः | इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् ||६४|| तरी अवधान पघळ| करूनियाम् आणिक येक वेळ| वाक्य माझें निर्मळ| अवधारीं पां ||१३४१|| हें वाच्य म्हणौनि बोलिजे| कां श्राव्य मग आयिकिजे| तैसें नव्हें परी तुझें| भाग्य बरवें ||१३४२|| कूर्मीचिया पिलियां| दिठी पान्हा ये धनंजया| कां आकाश वाहे बापिया| घरींचें पाणी ||१३४३|| जो व्यवहारु जेथ न घडे| तयाचें फळचि तेथ जोडे| काय दैवें न सांपडे| सानुकूळें ? ||१३४४|| येऱ्हवीं द्वैताची वारी| सारूनि ऐक्याच्या परीवरीं| भोगिजे तें अवधारीं| रहस्य हें ||१३४५|| आणि निरुपचारा प्रेमा| विषय होय जें प्रियोत्तमा| तें दुजें नव्हे कीं आत्मा| ऐसेंचि जाणावें ||१३४६|| आरिसाचिया देखिलया| गोमटें कीजे धनंजया| तें तया नोहे आपणयां| लागीं जैसें ||१३४७|| तैसें पार्था तुझेनि मिषें| मी बोलें आपणयाचि उद्देशें| माझ्या तुझ्या ठाईं असे | मीतूंपण गा ||१३४८|| म्हणौनि जिव्हारींचें गुज| सांगतसे जीवासी तुज| हें अनन्यगतीचें मज| आथी व्यसन ||१३४९|| पैम् जळा आपणपें देतां| लवण भुललें पंडुसुता| कीं आघवें तयाचें होतां| न लजेचि तें ||१३५०|| तैसा तूं माझ्या ठाईं| राखों नेणसीचि कांहीं| तरी आतां तुज काई| गोप्य मी करूं ? ||१३५१|| म्हणौनि आघवींचि गूढें| जें पाऊनि अति उघडें| तें गोप्य माझें चोखडें| वाक्य आइक ||१३५२|| मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु | मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ||६५|| तरी बाह्य आणि अंतरा| आपुलिया सर्व व्यापारा| मज व्यापकातें वीरा| विषयो करीं ||१३५३|| आघवा आंगीं जैसा| वायु मिळोनि आहे आकाशा| तूं सर्व कर्मीं तैसा| मजसींचि आस ||१३५४|| किंबहुना आपुलें मन| करीं माझें एकायतन| माझेनि श्रवणें कान| भरूनि घालीं ||१३५५|| आत्मज्ञानें चोखडीं| संत जे माझीं रूपडीं| तेथ दृष्टि पडो आवडी| कामिनी जैसी ||१३५६|| मीं सर्व वस्तीचें वसौटें| माझीं नामें जियें चोखटें| तियें जियावया वाटे| वाचेचिये लावीं ||१३५७|| हातांचें करणें| कां पायांचें चालणें| तें होय मजकारणें| तैसें करीं ||१३५८|| आपुला अथवा परावा| ठायीं उपकरसी पांडवा| तेणें यज्ञें होईं बरवा| याज्ञिकु माझा ||१३५९|| हें एकैक शिकऊं काई| पैं सेवकें आपुल्या ठाईं| उरूनि येर सर्वही| मी सेव्यचि करीं ||१३६०|| तेथ जाऊनिया भूतद्वेषु| सर्वत्र नमवैन मीचि एकु| ऐसेनि आश्रयो आत्यंतिकु| लाहसी तूं माझा ||१३६१|| मग भरलेया जगाआंतु| जाऊनि तिजयाची मातु| होऊनि ठायील एकांतु| आम्हां तुम्हां ||१३६२|| तेव्हां भलतिये आवस्थे| मी तूतें तूं मातें| भोगिसी ऐसें आइतें| वाढेल सुख ||१३६३|| आणि तिजें आडळ करितें| निमालें अर्जुना जेथें| तें मीचि म्हणौनि तूं मातें| पावसी शेखीं ||१३६४|| जैसी जळींची प्रतिभा| जळनाशीं बिंबा| येतां गाभागोभा| कांहीं आहे ? ||१३६५|| पैं पवनु अंबरा| कां कल्लोळु सागरा| मिळतां आडवारा| कोणाचा गा ? ||१३६६|| म्हणौनि तूं आणि आम्हीं| हें दिसताहे देहधर्मीं| मग ययाच्या विरामीं| मीचि होसी ||१३६७|| यया बोलामाझारीं| होय नव्हे झणें करीं| येथ आन आथी तरी| तुझीचि आण ||१३६८|| पैं तुझी आण वाहणें| हें आत्मलिंगातें शिवणें| प्रीतीची जाति लाजणें| आठवों नेदी ||१३६९|| येऱ्हवीं वेद्यु निष्प्रपंचु| जेणें विश्वाभासु हा साचु| आज्ञेचा नटनाचु| काळातें जिणें ||१३७०|| तो देवो मी सत्यसंकल्पु| आणि जगाच्या हितीं बापु| मा आणेचा आक्षेपु| कां करावा ? ||१३७१|| परी अर्जुना तुझेनि वेधें| मियां देवपणाचीं बिरुदें| सांडिलीं गा मी हे आधें | सगळेनि तुवां ||१३७२|| पैं काजा आपुलिया| रावो आपुली आपणया| आण वाहे धनंजया| तैसें हें कीं ||१३७३|| तेथ अर्जुनु म्हणे देवें| अचाट हें न बोलावें| जे आमचें काज नांवें| तुझेनि एके ||१३७४|| यावरी सांगों बैससी | कां सांगतां भाषही देसी| या तुझिया विनोदासी| पारु आहे जी ? ||१३७५|| कमळवना विकाशु| करी रवीचा एक अंशु | तेथ आघवाचि प्रकाशु| नित्य दे तो ||१३७६|| पृथ्वी निवऊनि सागर| भरीजती येवढें थोर| वर्षे तेथ मिषांतर| चातकु कीं ||१३७७|| म्हणौनि औदार्या तुझेया| मज निमित्त ना म्हणावया| प्राप्ति असे दानीराया| कृपानिधी ||१३७८|| तंव देवो म्हणती राहें| या बोलाचा प्रस्तावो नोहे| पैं मातें पावसी उपायें | साचचि येणें ||१३७९|| सैंधव सिंधू पडलिया| जो क्षणु धनंजया| तेणें विरेचि कीं उरावया| कारण कायी ? ||१३८०|| तैसें सर्वत्र मातें भजतां| सर्व मी होतां अहंता| निःशेष जाऊनि तत्वता| मीचि होसी ||१३८१|| एवं माझिये प्राप्तीवरी| कर्मालागोनि अवधारीं| दाविली तुज उजरी| उपायांची ||१३८२|| जे आधीं तंव पंडुसुता| सर्व कर्में मज अर्पितां| सर्वत्र प्रसन्नता| लाहिजे माझी ||१३८३|| पाठीं माझ्या इये प्रसादीं| माझें ज्ञान जाय सिद्धी| तेणें मिसळिजे त्रिशुद्धी| स्वरूपीं माझ्या ||१३८४|| मग पार्था तिये ठायीं| साध्य साधन होय नाहीं| किंबहुना तुज कांहीं| उरेचि ना ||१३८५|| तरी सर्व कर्में आपलीं| तुवां सर्वदा मज अर्पिलीं| तेणें प्रसन्नता लाधली| आजि हे माझी ||१३८६|| म्हणौनि येणें प्रसादबळें| नव्हे झुंजाचेनि आडळें| न ठाकेचि येकवेळे| भाळलों तुज ||१३८७|| जेणें सप्रपंच अज्ञान जाये| एकु मी गोचरु होये| तें उपपत्तीचेनि उपायें| गीतारूप हें ||१३८८|| मियां ज्ञान तुज आपुलें| नानापरी उपदेशिलें| येणें अज्ञानजात सांडी वियालें| धर्माधर्म जें ||१३८९|| सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज | अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्ष्ययिष्यामि मा शुचः ||६६|| आशा जैसी दुःखातें| व्यालीं निंदा दुरितें| हे असो जैसें दैन्यातें| दुर्भगत्व ||१३९०|| तैसें स्वर्गनरकसूचक| अज्ञान व्यालें धर्मादिक| तें सांडूनि घालीं अशेख| ज्ञानें येणें ||१३९१|| हातीं घेऊन तो दोरु| सांडिजे जैसा सर्पाकारु| कां निद्रात्यागें घराचारु| स्वप्नींचा जैसा ||१३९२|| नाना सांडिलेनि कवळें| चंद्रींचें धुये पिंवळें| व्याधित्यागें कडुवाळें- | पण मुखाचें ||१३९३|| अगा दिवसा पाठीं देउनी| मृगजळ घापे त्यजुनी| कां काष्ठत्यागें वन्ही| त्यजिजे जैसा ||१३९४|| तैसें धर्माधर्माचें टवाळ| दावी अज्ञान जें कां मूळ| तें त्यजूनि त्यजीं सकळ| धर्मजात ||१३९५|| मग अज्ञान निमालिया| मीचि येकु असे अपैसया| सनिद्र स्वप्न गेलया| आपणपें जैसें ||१३९६|| तैसा मी एकवांचूनि कांहीं| मग भिन्नाभिन्न आन नाहीं| सोऽहंबोधें तयाच्या ठायीं| अनन्यु होय ||१३९७|| पैंं आपुलेनि भेदेंविण| माझें जाणिजे जें एकपण| तयाचि नांव शरण| मज येएणें गा ||१३९८|| जैसें घटाचेनि नाशें| गगनीं गगन प्रवेशे| मज शरण येणें तैसें| ऐक्य करी ||१३९९|| सुवर्णमणि सोनया| ये कल्लोळु जैसा पाणिया| तैसा मज धनंजया| शरण ये तूं ||१४००|| वांचूनि सागराच्या पोटीं| वडवानळु शरण आला किरीटी| जाळूनि ठाके तया गोठी| वाळूनि दे पां ||१४०१|| मजही शरण रिघिजे| आणि जीवत्वेंचि असिजे| धिग् बोली यिया न लजे| प्रज्ञा केवीं ||१४०२|| अगा प्राकृताही राया| आंगीं पडे जें धनंजया| तें दासिरूंहि कीं तया| समान होय ||१४०३|| मा मी विश्वेश्वरु भेटे| आणि जीवग्रंथी न सुटे| हे बोल नको वोखटें| कानीं ल्ॐ ||१४०४|| म्हणौनि मी होऊनि मातें| सेवणें आहे आयितें| तें करीं हातां येतें| ज्ञानें येणें ||१४०५|| मग ताकौनियां काढिलें| लोणी मागौतें ताकीं घातलें| परी न घेपेचि कांहींं केलें| तेणें जेवीं ||१४०६|| तैसें अद्वयत्वें मज| शरण रिघालिया तुज| धर्माधर्म हे सहज| लागतील ना ||१४०७|| लोह उभें खाय माती| तें परीसाचिये संगतीं| सोनें जालया पुढती| न शिविजे मळें ||१४०८|| हें असो काष्ठापासोनि| मथूनि घेतलिया वन्ही| मग काष्ठेंही कोंडोनी| न ठके जैसा ||१४०९|| अर्जुना काय दिनकरु| देखत आहे अंधारु| कीं प्रबोधीं होय गोचरु| स्वप्नभ्रमु ||१४१०|| तैसें मजसी येकवटलेया| मी सर्वरूप वांचूनियां| आन कांहीं उरावया| कारण असे ? ||१४११|| म्हणौनि तयाचें कांहीं| चिंतीं न आपुल्या ठायीं| तुझें पापपुण्य पाहीं| मीचि होईन ||१४१२|| तेथ सर्वबंधलक्षणें| पापें उरावें दुजेपणें| तें माझ्या बोधीं वायाणें| होऊनि जाईल ||१४१३|| जळीं पडिलिया लवणा| सर्वही जळ होईल विचक्षणा| तुज मी अनन्यशरणा| होईन तैसा ||१४१४|| येतुलेनि आपैसया| सुटलाचि आहसी धनंजया| घेईं मज प्रकाशोनियां| सोडवीन तूंतें ||१४१५|| याकारणें पुढती| हे आधी न वाहे चित्तीं| मज एकासि ये सुमती| जाणोनि शरण ||१४१६|| ऐसें सर्वरूपरूपसें| सर्वदृष्टिडोळसें| सर्वदेशनिवासें| बोलिलें श्रीकृष्णें ||१४१७|| मग सांवळा सकंकणु| बाहु पसरोनि दक्षिणु| आलिंगिला स्वशरणु| भक्तराजु तो ||१४१८|| न पवतां जयातें| काखे सूनि बुद्धीतें| बोंलणें मागौतें| वोसरलें ||१४१९|| ऐसें जें कांहीं येक| बोला बुद्धीसिही अटक| तें द्यावया मिष| खेवाचें केलें ||१४२०|| हृदया हृदय येक जाले| ये हृदयींचें ते हृदयीं घातलें| द्वैत न मोडितां केलें | आपणाऐसें अर्जुना ||१४२१|| दीपें दीप लाविला| तैसा परीष्वंगु तो जाला| द्वैत न मोडितां केला| आपणपें पार्थुं ||१४२२|| तेव्हां सुखाचा मग तया| पूरु आला जो धनंजया| तेथ वाडु तऱ्हीं बुडोनियां| ठेला देवो ||१४२३|| सिंधु सिंधूतें पावों जाये| तें पावणें ठाके दुणा होये| वरी रिगे पुरवणिये| आकाशही ||१४२४|| तैसें तयां दोघांचें मिळणें| दोघां नावरे जाणावें कवणें| किंबहुना श्रीनारायणें| विश्व कोंदलें ||१४२५|| एवं वेदाचें मूळसूत्र| सर्वाधिकारैकपवित्र| श्रीकृष्णें गीताशास्त्र| प्रकट केलें ||१४२६|| येथ गीता मूळ वेदां| ऐसें केवीं पां आलें बोधा| हें म्हणाल तरी प्रसिद्धा| उपपत्ति सांगों ||१४२७|| तरी जयाच्या निःश्वासीं| जन्म झाले वेदराशी| तो सत्यप्रतिज्ञ पैजेसीं| बोलला स्वमुखें ||१४२८|| म्हणौनि वेदां मूळभूत| गीता म्हणों हें होय उचित| आणिकही येकी येथ| उपपत्ति असे ||१४२९|| जें न नशतु स्वरूपें| जयाचा विस्तारु जेथ लपे| तें तयांचें म्हणिपे| बीज जगीं ||१४३०|| तरी कांडत्रयात्मकु| शब्दराशी अशेखु| गीतेमाजीं असे रुखु| बीजीं जैसा ||१४३१|| म्हणौनि वेदांचें बीज| श्रीगीता होय हें मज| गमे आणि सहज| दिसतही आहे ||१४३२|| जे वेदांचे तिन्ही भाग| गीते उमटले असती चांग| भूषणरत्नीं सर्वांग| शोभलें जैसें ||१४३३|| तियेचि कर्मादिकें तिन्ही| कांडें कोणकोणे स्थानीं| गीते आहाति तें नयनीं| दाखऊं आईक ||१४३४|| तरी पहिला जो अध्यावो| तो शास्त्रप्रवृत्तिप्रस्तावो| द्वितीयीं साङ्ख्यसद्भावो| प्रकाशिला ||१४३५|| मोक्षदानीं स्वतंत्र| ज्ञानप्रधान हें शास्त्र| येतुलालें दुजीं सूत्र| उभारिलें ||१४३६|| मग अज्ञानें बांधलेयां| मोक्षपदीं बैसावया| साधनारंभु तो तृतीया- | ध्यायीं बोलिला ||. १४३७|| जे देहाभिमान बंधें| सांडूनि काम्यनिषिद्धें| विहित परी अप्रमादें| अनुष्ठावें ||१४३८|| ऐसेनि सद्भावें कर्म करावें| हा तिजा अध्यावो जो देवें| निर्णय केला तें जाणावें| कर्मकांड येथ ||१४३९|| आणि तेंचि नित्यादिक| अज्ञानाचें आवश्यक| आचरतां मोंचक| केवीं होय पां ||१४४०|| ऐसी अपेक्षा जालिया| बद्ध मुमुक्षुते आलिया| देवें ब्रह्मार्पणत्वें क्रिया| सांगितली ||१४४१|| जे देहवाचामानसें| विहित निपजे जें जैसें| तें एक ईश्वरोद्देशें| कीजे म्हणितलें ||१४४२|| हेंचि ईश्वरीं कर्मयोगें| भजनकथनाचें खागें| आदरिलें शेषभागें | चतुर्थाचेनी ||१४४३|| तें विश्वरूप अकरावा| अध्यावो संपे जंव आघवा. तंव कर्में ईशु भजावा| हें जें बोलिलें ||१४४४|| तें अष्टाध्यायीं उघड| जाण येथें देवताकांड| शास्त्र सांगतसे आड| मोडूनि बोलें ||१४४५|| आणि तेणेंचि ईशप्रसादें| श्रीगुरुसंप्रदायलब्धें| साच ज्ञान उद्बोधे| कोंवळें जें ||१४४६|| तें अद्वेष्टादिप्रभृतिकीं| अथवा अमानित्वादिकीं| वाढविजे म्हणौनि लेखी| बारावा गणूं ||१४४७|| तो बारावा अध्याय आदी| आणि पंधरावा अवधी| ज्ञानफळपाकसिद्धी| निरूपणासीं ||१४४८|| म्हणौनि चहूंही इहीं| ऊर्ध्वमूळांतीं अध्यायीं| ज्ञानकांड ये ठायीं| निरूपिजे ||१४४९|| एवं कांडत्रयनिरूपणी| श्रुतीचि हे कोडिसवाणी| गीतापद्यरत्नांचीं लेणीं| लेयिली आहे ||१४५०|| हें असो कांडत्रयात्मक| श्रुति मोक्षरूप फळ येक| बोभावे जें आवश्यक| ठाकावें म्हणौनि ||१४५१|| तयाचेनि साधन ज्ञानेंसीं| वैर करी जो प्रतिदिवशीं| तो अज्ञानवर्ग षोडशीं| प्रतिपादिजे ||१४५२|| तोचि शास्त्राचा बोळावा| घेवोनि वैरी जिणावा| हा निरोपु तो सतरावा| अध्याय येथ ||१४५३|| ऐसा प्रथमालागोनि| सतरावा लाणी करूनी| आत्मनिश्वास विवरूनी| दाविला देवें ||१४५४|| तया अर्थजातां अशेषां| केला तात्पर्याचा आवांका| तो हा अठरावा देखा| कलशाध्यायो ||१४५५|| एवं सकळसंख्यासिद्धु| श्रीभागवद्गीता प्रबंधु| हा औदार्यें आगळा वेदु| मूर्तु जाण ||१४५६|| वेदु संपन्नु होय ठाईं| परी कृपणु ऐसा आनु नाहीं| जे कानीं लागला तिहीं| वर्णांच्याचि ||१४५७|| येरां भवव्याथा ठेलियां| स्त्रीशूद्रादिकां प्राणियां| अनवसरू मांडूनियां| राहिला आहे ||१४५८|| तरी मज पाहतां तें मागील उणें| फेडावया गीतापणें| वेदु वेठला भलतेणें| सेव्य होआवया ||१४५९|| ना हे अर्थु रिगोनि मनीं| श्रवणें लागोनि कानीं| जपमिषें वदनीं| वसोनियां ||१४६०|| ये गीतेचा पाठु जो जाणे| तयाचेनि सांगातीपणें| गीता लिहोनि वाहाणें| पुस्तकमिषें ||१४६१|| ऐसैसा मिसकटां| संसाराचा चोहटा| गवादी घालीत चोखटा| मोक्षसुखाची ||१४६२|| परी आकाशीं वसावया| पृथ्वीवरी बैसावया| रविदीप्ति राहाटावया| आवारु नभ ||१४६३|| तेवीं उत्तम अधम ऐसें| सेवितां कवणातेंही न पुसे| कैवल्यदानें सरिसें| निववीत जगा ||१४६४|| यालागीं मागिली कुटी| भ्याला वेदु गीतेच्या पोटीं| रिगाला आतां गोमटी| कीर्ति पातला ||१४६५|| म्हणौनि वेदाची सुसेव्यता| ते हे मूर्त जाण श्रीगीता| श्रीकृष्णें पंडुसुता| उपदेशिली ||१४६६|| परी वत्साचेनि वोरसें| दुभतें होय घरोद्देशें| जालें पांडवाचेनि मिषें| जगदुद्धरण ||१४६७|| चातकाचियें कणवें| मेघु पाणियेसिं धांवे| तेथ चराचर आघवें| निवालें जेवीं ||१४६८|| कां अनन्यगतिकमळा- | लागीं सूर्य ये वेळोवेळां| कीं सुखिया होईजे डोळां| त्रिभुवनींचा ||१४६९|| तैसें अर्जुनाचेनि व्याजें| गीता प्रकाशूनि श्रीराजें| संसारायेवढें थोर ओझें| फेडिलें जगाचें ||१४७०|| सर्वशास्त्ररत्नदीप्ती| उजळिता हा त्रिजगतीं| सूर्यु नव्हें लक्ष्मीपती| वक्त्राकाशींचा ||१४७१|| बाप कुळ तें पवित्र| जेथिंचा पार्थु या ज्ञाना पात्र| जेणें गीता केलें शास्त्र| आवारु जगा ||१४७२|| हें असो मग तेणें| सद्गुरु श्रीकृष्णें| पार्थाचें मिसळणें| आणिलें द्वैता ||१४७३|| पाठीं म्हणतसे पांडवा| शास्त्र हें मानलें कीं जीवा| तेथ येरु म्हणे देवा| आपुलिया कृपा ||१४७४|| तरी निधान जोडावया| भाग्य घडे गा धनंजया| परी जोडिलें भोगावया | विपायें होय ||१४७५|| पैं क्षीरसागरायेवढें| अविरजी दुधाचें भांडें| सुरां असुरां केवढें| मथितां जालें ||१४७६|| तें सायासही फळा आलें| जें अमृतही डोळां देखिलें| परी वरिचिली चुकलें| जतनेतें ||१४७७|| तेथ अमरत्वा वोगरिलें| तें मरणाचिलागीं जालें| भोगों नेणतां जोडलें| ऐसें आहे ||१४७८|| नहुषु स्वर्गाधिपति जाहला| परी राहाटीं भांबावला| तो भुजंगत्व पावला| नेणसी कायी ? ||१४७९|| म्हणौनि बहुत पुण्य तुवां| केलें तेणें धनंजया| आजि शास्त्रराजा इया| जालासि विषयो ||१४८०|| तरी ययाचि शास्त्राचेनि| संप्रदायें पांघुरौनि| शास्त्रार्थ हा निकेनि| अनुष्ठीं हो ||१४८१|| येऱ्हवीं अमृतमंथना- | सारिखें होईल अर्जुना| जरी रिघसी अनुष्ठाना| संप्रदायेंवीण ||१४८२|| गाय धड जोडे गोमटी| ते तैंचि पिवों ये किरीटी| जैं जाणिजे हातवटी| सांजवणीची ||१४८३|| तैसा श्रीगुरु प्रसन्न होये| शिष्य विद्याही कीर लाहे| परी ते फळे संप्रदायें| उपासिलिया ||१४८४|| म्हणौनि शास्त्रीं जो इये| उचितु संप्रदायो आहे| तो ऐक आतां बहुवें| आदरेंसीं ||१४८५|| इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन | न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ||६७|| तरी तुवां हें जें पार्था| गीताशास्त्र लाधलें आस्था| तें तपोहीना सर्वथा| सांगावें ना हो ||. १४८६|| अथवा तापसुही जाला | परी गुरूभक्तीं जो ढिला| तो वेदीं अंत्यजु वाळिळा| तैसा वाळीं ||१४८७|| नातरी पुरोडाशु जैसा| न घापे वृद्ध तरी वायसा| गीता नेदी तैसी तापसा| गुरुभक्तिहीना ||१४८८|| कां तपही जोडे देहीं| भजे गुरुदेवांच्या ठायीं| परी आकर्णनीं नाहीं| चाड जरी ||१४८९|| तरी मागील दोन्हीं आंगीं| उत्तम होय कीर जगीं| परी या श्रवणालागीं| योग्यु नोहे ||१४९०|| मुक्ताफळ भलतैसें| हो परी मुख नसे| तंव गुण प्रवेशे| तेथ कायी ? ||१४९१|| सागरु गंभीरु होये| हें कोण ना म्हणत आहे| परी वृष्टि वायां जाये| जाली तेथ ||१४९२|| धालिया दिव्यान्न सुवावें| मग जें वायां धाडावें| तें आर्तीं कां न करावें| उदारपण ||१४९३|| म्हणौनि योग्य भलतैसें| होतु परी चाड नसे| तरी झणें वानिवसें| देसी हें तयां ||१४९४|| रूपाचा सुजाणु डोळा| वोढवूं ये कायि परिमळा ? | जेथ जें माने ते फळा| तेथचि ते गा ||१४९५|| म्हणौनि तपी भक्ति| पाहावे ते सुभद्रापती| परी शास्त्रश्रवणीं अनासक्ती| वाळावेचि ते ||१४९६|| नातरी तपभक्ति| होऊनि श्रवणीं आर्ति| आथी ऐसीही आयती| देखसी जरी ||१४९७|| तरी गीताशास्त्रनिर्मिता| जो मी सकळलोकशास्ता| तया मातें सामान्यता| बोलेल जो ||१४९८|| माझ्या सज्जनेंसिं मातें| पैशुन्याचेनि हातें| येक आहाती तयांतें| योग्य न म्हण ||१४९९|| तयांची येर आघवी| सामग्री ऐसी जाणावी| दीपेंवीण ठाणदिवी| रात्रीची जैसी ||१५००|| अंग गोरें आणि तरुणें| वरी लेईलें आहे लेणें| परी येकलेनि प्राणें| सांडिलें जेवीं ||१५०१|| सोनयाचें सुंदर| निर्वाळिलें होय घर| परी सर्पांगना द्वार| रुंधलें आहे ||१५०२|| निपजे दिव्यान्न चोखट| परी माजीं काळकूट| असो मैत्री कपट- | गर्भिणी जैसी ||१५०३|| तैसी तपभक्तिमेधा| तयाची जाण प्रबुद्धा| जो माझयांची कां निंदा| माझीचि करी ||१५०४|| याकारणें धनंजया| तो भक्तु मेधावीं तपिया| तरी नको बापा इया| शास्त्रा आतळों देवों ||१५०५|| काय बहु बोलों निंदका| योग्य स्रष्टयाहीसारिखा| गीता हे कवतिका- | लागींही नेदीं ||१५०६|| म्हणौनि तपाचा धनुर्धरा| तळीं दाटोनि गाडोरा| वरी गुरुभक्तीचा पुरा| प्रासादु जो जाला ||१५०७|| आणि श्रवणेच्छेचा पुढां| दारवंटा सदा उघडा| वरी कलशु चोखडा| अनिंदारत्नांचा ||१५०८|| य इदं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति | भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः ||६८|| ऐशा भक्तालयीं चोखटीं| गीतारत्नेश्वरु हा प्रतिष्ठीं| मग माझिया संवसाटी| तुकसी जगीं ||१५०९|| कां जे एकाक्षरपणेंसीं| त्रिमात्रकेचिये कुशीं| प्रणवु होतां गर्भवासीं| सांकडला ||१५१०|| तो गीतेचिया बाहाळींं| वेदबीज गेलें पाहाळीँ| कीं गायत्री फुलींफळीं| श्लोकांच्या आली ||१५११|| ते हे मंत्ररहय गीता| मेळवी जो माझिया भक्ता| अनन्यजीवना माता| बाळका जैसी ||१५१२|| तैसी भक्तां गीतेसीं| भेटी करी जो आदरेंसीं| तो देहापाठीं मजसीं| येकचि होय ||१५१३|| न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः | भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि ||६९|| आणि देहाचेंही लेणें| लेऊनि वेगळेपणें| असे तंव जीवेंप्राणें| तोचि पढिये ||१५१४|| ज्ञानियां कर्मठां तापसां| यया खुणेचिया माणुसां- | माजीं तो येकु गा जैसा| पढिये मज ||१५१५|| तैसा भूतळीं आघवा| आन न देखे पांडवा| जो गीता सांगें मेळावा| भक्तजनांचा ||१५१६|| मज ईश्वराचेनि लोभें| हे गीता पढतां अक्षोभें| जो मंडन होय सभे| संतांचिये ||१५१७|| नेत्रपल्लवीं रोमांचितु| मंदानिळें कांपवितु| आमोदजळें वोलवितु| फुलांचे डोळें ||१५१८|| कोकिळा कलरवाचेनि मिषें| सद्गद बोलवीत जैसें| वसंत का प्रवेशे| मद्भक्त आरामीं ||१५१९|| कां जन्माचें फळ चकोरां| होत जैं चंद्र ये अंबरा| नाना नवघन मयूरां| वो देत पावे ||१५२०|| तैसा सज्जनांच्या मेळापीं| गीतापद्यरत्नीं उमपीं| वर्षे जो माझ्या रूपीं| हेतु ठेऊनि ||१५२१|| मग तयाचेनि पाडें| पढियंतें मज फुडें| नाहींचि गा मागेंपुढें| न्याहाळितां ||१५२२|| अर्जुना हा ठायवरी| मी तयातें सूयें जिव्हारीं| जो गीतार्थाचें करी| परगुणें संतां ||१५२३|| अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः | ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः ||७०|| पैं माझिया तुझिया मिळणीं| वाढिनली जे हे कहाणी| मोक्षधर्म का जिणीं| आलासे जेथें ||१५२४|| तो हा सकळार्थप्रबोधु| आम्हां दोघांचा संवादु| न करितां पदभेदु| पाठेंचि जो पढे ||१५२५|| तेणें ज्ञानानळीं प्रदीप्तीं| मूळ अविद्येचिया आहुती| तोषविला होय सुमती| परमात्मा मी ||१५२६|| घेऊनि गीतार्थ उगाणा| ज्ञानिये जें विचक्षणा| ठाकती तें गाणावाणा| गीतेचा तो लाहे ||१५२७|| गीता पाठकासि असे | फळ अर्थज्ञाचि सरिसें| गीता माउलियेसि नसे| जाणें तान्हें ||१५२८|| श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः | सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् ||७१|| आणि सर्वमार्गीं निंदा| सांडूनि आस्था पैं शुद्धा| गीताश्रवणीं श्रद्धा| उभारी जो ||१५२९|| तयाच्या श्रवणपुटीं| गीतेचीं अक्षरें जंव पैठीं| होतीना तंव उठाउठीं| पळेचि पाप ||१५३०|| अटवियेमाजीं जैसा| वन्हि रिघतां सहसा| लंघिती का दिशा| वनौकें तियें ||१५३१|| कां उदयाचळकुळीं| झळकतां अंशुमाळी| तिमिरें अंतराळीं| हारपती ||१५३२|| तैसा कानाच्या महाद्वारीं| गीता गजर जेथ करी| तेथ सृष्टीचिये आदिवरी| जायचि पाप ||१५३३|| ऐसी जन्मवेली धुवट| होय पुण्यरूप चोखट| याहीवरी अचाट| लाहे फळ ||१५३४|| जें इये गीतेचीं अक्षरें| जेतुलीं कां कर्णद्वारें| रिघती तेतुले होती पुरे| अश्वमेध कीं ||१५३५|| म्हणौनि श्रवणें पापें जाती| आणि धर्म धरी उन्नती| तेणें स्वर्गराज संपत्ती| लाहेचि शेखीं ||१५३६|| तो पैं मज यावयालागीं| पहिलें पेणें करी स्वर्गीं| मग आवडे तंव भोगी| पाठीं मजचि मिळे ||१५३७|| ऐसी गीता धनंजया| ऐकतया आणि पढतया| फळे महानंदें मियां| बहु काय बोलों ||१५३८|| याकारणें हें असो| परी जयालागीं शास्त्रातिसो| केला तें तंव तुज पुसों| काज तुझें ||१५३९|| कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा | कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय ||७२|| तरी सांग पां पांडवा| हा शास्त्रसिद्धांतु आघवा| तुज एकचित्तें फावा| गेला आहे ? ||१५४०|| आम्हीं जैसें जया रीतीं| उगाणिलें कानांच्या हातीं| येरीं तैसेंचि तुझ्या चित्तीं | पेठें केलें कीं ? ||१५४१|| अथवा माझारीं| गेलें सांडीविखुरी| किंवा उपेक्षेवरी| वाळूनि सांडिलें ||१५४२|| जैसें आम्हीं सांगितलें| तैसेंचि हृदयीं फावलें| तरी सांग पां वहिलें| पुसेन तें मी ||१५४३|| तरी स्वाज्ञानजनितें| मागिलें मोहें तूतें| भुलविलें तो येथें| असे कीं नाहीं ? ||१५४४|| हें बहु पुसों काई| सांगें तूं आपल्या ठायीं| कर्माकर्म कांहीं| देखतासी ? ||१५४५|| पार्थु स्वानंदैकरसें| विरेल ऐसा भेददशे| आणिला येणें मिषें| प्रश्नाचेनि ||१५४६|| पूर्णब्रह्म जाला पार्थु| तरी पुढील साधावया कार्यार्थु| मर्यादा श्रीकृष्णनाथु| उल्लंघों नेदी ||१५४७|| येऱ्हवीं आपुलें करणें| सर्वज्ञ काय तो नेणें ? | परी केलें पुसणें| याचि लागीं ||१५४८|| एवं करोनियां प्रश्न| नसतेंचि अर्जुनपण| आणूनियां जालें पूर्णपण| तें बोलवी स्वयें ||१५४९|| मग क्षीराब्धीतें सांडितु| गगनीं पुंजु मंडितु| निवडे जैसा न निवडितु| पूर्णचंद्रु ||१५५०|| तैसा ब्रह्म मी हें विसरे| तेथ जगचि ब्रह्मत्वें भरे| हेंही सांडी तरी विरे| ब्रह्मपणही ||१५५१|| ऐसा मोडतु मांडतु ब्रह्में| तो दुःखें देहाचिये सीमे| मी अर्जुन येणें नामें| उभा ठेला ||१५५२|| मग कांपतां करतळीं| दडपूनि रोमावळी| पुलिका स्वेदजळीं| जिरऊनियां ||१५५३|| प्राणक्षोभें डोलतया| आंगा आंगचि टेंकया| सूनि स्तंभु चाळया| भुलौनियां ||१५५४|| नेत्रयुगुळाचेनि वोतें| आनंदामृताचें भरितें| वोसंडत तें मागुतें| काढूनियां ||१५५५|| विविधा औत्सुक्यांची दाटी| चीप दाटत होती कंठीं| ते करूनियां पैठी| हृदयामाजीं ||१५५६|| वाचेचें वितुळणें| सांवरूनि प्राणें| अक्रमाचें श्वसणें| ठेऊनि ठायीं ||१५५७|| अर्जुन उवाच | नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत | स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव ||७३|| मग अर्जुन म्हणे काय देवो| | पुसताति आवडे मोहो| तरी तो सकुटुंब गेला जी ठावो| घेऊनि आपला ||१५५८|| पासीं येऊनि दिनकरें| डोळ्यातें अंधारें| पुसिजे हें कायि सरे| कोणे गांवीं ? ||१५५९|| तैसा तूं श्रीकृष्णराया| आमुचिया डोळयां| गोचर हेंचि कायिसया| न पुरे तंव ||१५६०|| वरी लोभें मायेपासूनी| तें सांगसी तोंड भरूनी| जें कायिसेनिही करूनी| जाणूं नये ||१५६१|| आतां मोह असे कीं नाहीं| हें ऐसें जी पुससी काई| कृतकृत्य जाहलों पाहीं| तुझेपणें ||१५६२|| गुंतलों होतों अर्जुनगुणें| तो मुक्त जालों तुझेपणें| आतां पुसणें सांगणें| दोन्ही नाहीं ||१५६३|| मी तुझेनि प्रसादें| लाधलेनि आत्मबोधें| मोहाचे तया कांदे| नेदीच उरों ||१५६४|| आतां करणें कां न करणें| हें जेणें उठी दुजेपणें| तें तूं वांचूनि नेणें| सर्वत्र गा ||१५६५|| ये विषयीं माझ्या ठायीं| संदेहाचे नुरेचि कांहीं| त्रिशुद्धि कर्म जेथ नाहीं| तें मी जालों ||१५६६|| तुझेनि मज मी पावोनी| कर्तव्य गेलें निपटूनी| परी आज्ञा तुझी वांचोनि| आन नाहीं प्रभो ||१५६७|| कां जें दृश्य दृश्यातें नाशी| जें दुजें द्वैतातें ग्रासी| जें एक परी सर्वदेशीं| वसवी सदा ||१५६८|| जयाचेनि संबंधें बंधु फिटे| जयाचिया आशा आस तुटे| जें भेटलया सर्व भेटे| आपणपांचि ||१५६९|| तें तूं गुरुलिंग जी माझें| जें येकलेपणींचें विरजें| जयालागीं वोलांडिजे| अद्वैतबोधु ||१५७०|| आपणचि होऊनि ब्रह्म| सारिजे कृत्याकृत्यांचें काम| मग कीजे का निःसीम| सेवा जयाची ||१५७१|| गंगा सिंधू सेवूं गेली| पावतांचि समुद्र जाली| तेवीं भक्तां सेल दिधली| निजपदाची ||१५७२|| तो तूं माझा जी निरुपचारु| श्रीकृष्णा सेव्य सद्गुरु| मा ब्रह्मतेचा उपकारु| हाचि मानीं ||१५७३|| जें मज तुम्हां आड| होतें भेदाचें कवाड| तें फेडोनि केलें गोड| सेवासुख ||१५७४|| तरी आतां तुझी आज्ञा| सकळ देवाधिदेवराज्ञा| करीन देईं अनुज्ञा| भलतियेविषयीं ||१५७५|| यया अर्जुनाचिया बोला| देवो नाचे सुखें भुलला| म्हणे विश्वफळा जाला| फळ हा मज ||१५७६|| उणेनि उमचला सुधाकरु| देखुनी आपला कुमरु| मर्यादा क्षीरसागरु| विसरेचिना ? ||१५७७|| ऐसे संवादाचिया बहुलां| लग्न दोघांचियां आंतुला| लागलें देखोनि जाला| निर्भरु संजयो ||१५७८|| तेणें म्हणतसे संजयो | बाप कृपानिधी रावो | तो आपुला मनोभावो | अर्जुनेंसी केला ||१५७९ || तेणें उचंबळलेपणें| संजय धृतराष्ट्रातें म्हणे| जी कैसे बादरायणें| रक्षिलों दोघे ? ||१५८०|| आजि तुमतें अवधारा| नाहीं चर्मचक्षूही संसारा| कीं ज्ञानदृष्टिव्यवहारा आणिलेती ||१५८१|| आणि रथींचिये राहाटी| घेई जो घोडेयासाठीं| तया आम्हां या गोष्टी| गोचरा होती ||१५८२|| वरी जुंझाचें निर्वाण| मांडलें असे दारुण| दोहीं हारीं आपण| हारपिजे जैसें ||१५८३|| येवढा जिये सांकडां| कैसा अनुग्रहो पैं गाढा| जे ब्रह्मानंदु उघडा| भोगवीतसे ||१५८४|| ऐसें संजय बोलिला| परी न द्रवे येरु उगला| चंद्रकिरणीं शिवतला| पाषाणु जैसा ||१५८५|| हे देखोनि तयाची दशा| मग करीचिना सरिसा| परी सुखें जाला पिसा| बोलतसे ||१५८६|| भुलविला हर्षवेगें| म्हणौनि धृतराष्ट्रा सांगे| येऱ्हवीं नव्हे तयाजोगें| हें कीर जाणें ||१५८७|| सञ्जय उवाच | इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः | संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम् ||७४|| मग म्हणे पैं कुरुराजा| ऐसा बंधुपुत्र तो तुझा| बोलिला तें अधोक्षजा| गोड जालें ||१५८८|| अगा पूर्वापर सागर| ययां नामसीचि सिनार| येर आघवें तें नीर| एक जैसें ||१५८९|| तैसा श्रीकृष्ण पार्थ ऐसें| हें आंगाचिपासीं दिसे| मग संवादीं जी नसे| कांहींचि भेदु ||१५९० || पैं दर्पणाहूनि चोखें| दोन्ही होती सन्मुखें| तेथ येरी येर देखे| आपणपें जैसें ||१५९१|| तैसा देवेसीं पंडुसुतु| आपणपें देवीं देखतु| पांडवेंसीं देखे अनंतु| आपणपें पार्थीं ||१५९२|| देव देवो भक्तालागीं| जिये विवरूनि देखे आंगीं| येरु तियेचेही भागीं| दोन्ही देखे ||१५९३|| आणिक कांहींच नाहीं| म्हणौनि करिती काई| दोघे येकपणें पाहीं| नांदताती ||१५९४|| आतां भेदु जरी मोडे| तरी प्रश्नोत्तर कां घडे ? | ना भेदुचि तरी जोडे| संवादसुख कां ? ||१५९५|| ऐसें बोलतां दुजेपणें| संवादीं द्वैत गिळणें| तें ऐकिलें बोलणें| दोघांचें मियां ||१५९६|| उटूनि दोन्ही आरिसे| वोडविलीया सरिसे| कोण कोणा पाहातसे| कल्पावें पां ? ||१५९७|| कां दीपासन्मुखु| ठेविलया दीपकु| कोण कोणा अर्थिकु| कोण जाणें ||१५९८|| नाना अर्कापुढें अर्कु| उदयलिया आणिकु| कोण म्हणे प्रकाशकु| प्रकाश्य कवण ? ||१५९९|| हें निर्धारूं जातां फुडें| निर्धारासि ठक पडे| ते दोघे जाले एवढे| संवादें सरिसे ||१६००|| जी मिळतां दोन्ही उदकें | माजी लवण वारूं ठाके| कीं तयासींही निमिखें| तेंचि होय ||१६०१|| तैसे श्रीकृष्ण अर्जुन दोन्ही| संवादले तें मनीं| धरितां मजही वानी| तेंचि होतसे ||१६०२|| ऐसें म्हणे ना मोटकें | तंव हिरोनि सात्विकें| आठव नेला नेणों कें| संजयपणाचा ||१६०३|| रोमांच जंव फरके| तंव तंव आंग सुरके| स्तंभ स्वेदांतें जिंके| एकला कंपु ||१६०४|| अद्वयानंदस्पर्शें| दिठी रसमय जाली असे | ते अश्रु नव्हती जैसें| द्रवत्वचि ||१६०५|| नेणों काय न माय पोटीं| नेणों काय गुंफे कंठीं| वागर्था पडत मिठी| उससांचिया ||१६०६|| किंबहुना सात्विकां आठां| चाचरु मांडतां उमेठा| संजयो जालासे चोहटां| संवादसुखाचा ||१६०७|| तया सुखाची ऐसी जाती| जे आपणचि धरी शांती| मग पुढती देहस्मृती| लाधली तेणें ||१६०८|| व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम् | योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम् ||७५|| तेव्हां बैसतेनि आनंदें| म्हणे जी जें उपनिषदें| नेणती तें व्यासप्रसादें| ऐकिलें मियां ||१६०९|| ऐकतांचि ते गोठी| ब्रह्मत्वाची पडिली मिठी| मीतूंपणेंसीं दृष्टी| विरोनि गेली ||१६१०|| हे आघवेचि का योग| जया ठाया येती मार्ग| तयाचें वाक्य सवंग| केलें मज व्यासें ||१६११|| अहो अर्जुनाचेनि मिषें| आपणपेंचि दुजें ऐसें| नटोनि आपणया उद्देशें| बोलिलें जें देव ||१६१२|| तेथ कीं माझें श्रोत्र| पाटाचें जालें जी पात्र| काय वानूं स्वतंत्र| सामर्थ्य श्रीगुरुचें ||१६१३|| राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम् | केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः ||७६|| राया हें बोलतां विस्मित होये| तेणेंचि मोडावला ठाये| रत्नीं कीं रत्नकिळा ये| झांकोळित जैसी ||१६१४|| हिमवंतींचीं सरोवरें| चंद्रोदयीं होती काश्मीरें| मग सूर्यागमीं माघारें| द्रवत्व ये ||१६१५|| तैसा शरीराचिया स्मृती| तो संवादु संजय चित्तीं| धरी आणि पुढती| तेंचि होय ||१६१६|| तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः | विस्मयो मे महान् राजन्हृष्यामि च पुनः पुनः ||७७|| मग उठोनि म्हणे नृपा| श्रीहरीचिया विश्वरूपा| देखिलया उगा कां पां| असों लाहसी ? ||१६१७|| न देखणेनि जें दिसे| नाहींपणेंचि जें असे | विसरें आठवे तें कैसें| चुकऊं आतां ||१६१८|| देखोनि चमत्कारु| कीजे तो नाहीं पैसारु| मजहीसकट महापूरु| नेत आहे ||१६१९|| ऐसा श्रीकृष्णार्जुन- | संवाद संगमीं स्नान| करूनि देतसे तिळदान| अहंतेचें ||१६२०|| तेथ असंवरें आनंदें| अलौकिकही कांहीं स्फुंदे| श्रीकृष्ण म्हणे सद्गदें| वेळोवेळां ||१६२१|| या अवस्थांची कांहीं| कौरवांतें परी नाहीं| म्हणौनि रायें तें कांहीं| कल्पावें जंव ||१६२२|| तंव जाला सुखलाभु| आपणया करूनि स्वयंभु| बुझाविला अवष्टंभु| संजयें तेणें ||१६२३|| तेथ कोणी येकी अवसरी| होआवी ते करूनि दुरी| रावो म्हणे संजया परी| कैसी तुझी गा ? ||१६२४|| तेणें तूंतें येथें व्यासें| बैसविलें कासया उद्देशें| अप्रसंगामाजीं ऐसें| बोलसी काई ? ||१६२५|| रानींचें राउळा नेलिया| दाही दिशा मानी सुनिया| कां रात्री होय पाहलया| निशाचरां ||१६२६|| जो जेथिंचें गौरव नेणें| तयासि तें भिंगुळवाणें| म्हणौनि अप्रसंगु तेणें| म्हणावा कीं तो ||१६२७|| मग म्हणे सांगें प्रस्तुत| उदयलेंसे जें उत्कळित| तें कोणासि बा रे जैत| देईल शेखीं ? ||१६२८|| येऱ्हवीं विशेषें बहुतेक| आमुचें ऐसें मानसिक| जे दुर्योधनाचे अधिक| प्रताप सदा ||१६२९|| आणि येरांचेनि पाडें| दळही याचें देव्हडें| म्हणौनि जैत फुडें| आणील ना तें ? ||१६३०|| आम्हां तंव गमे ऐसें| मा तुझें ज्योतिष कैसें| तें नेणों संजया असे | तैसें सांग पां ||१६३१|| यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः | तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ||७८|| ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे मोक्षसंन्यासयोगो नाम अष्टादशोऽध्यायः ||१८अ || यया बोला संजयो म्हणे| जी येरयेरांचें मी नेणें| परी आयुष्य तेथें जिणें| हें फुडें कीं गा ||१६३२|| चंद्रु तेथें चंद्रिका| शंभु तेथें अंबिका| संत तेथें विवेका| असणें कीं जी ||१६३३|| रावो तेथें कटक| सौजन्य तेथें सोयरीक| वन्हि तेथें दाहक| सामर्थ्य कीं ||१६३४|| दया तेथें धर्मु| धर्मु तेथें सुखागमु| सुखीं पुरुषोत्तमु| असे जैसा ||१६३५|| वसंत तेथें वनें| वन तेथें सुमनें| सुमनीं पालिंगनें| सारंगांचीं ||१६३६|| गुरु तेथ ज्ञान| ज्ञानीं आत्मदर्शन| दर्शनीं समाधान| आथी जैसें ||१६३७|| भाग्य तेथ विलासु| सुख तेथ उल्लासु| हें असो तेथ प्रकाशु| सूर्य जेथें ||१६३८|| तैसे सकल पुरुषार्थ| जेणें स्वामी कां सनाथ| तो श्रीकृष्ण रावो जेथ| तेथ लक्ष्मी ||१६३९|| आणि आपुलेनि कांतेंसीं| ते जगदंबा जयापासीं| अणिमादिकीं काय दासी| नव्हती तयातें ? ||१६४०|| कृष्ण विजयस्वरूप निजांगें| तो राहिला असे जेणें भागें| तैं जयो लागवेगें| तेथेंचि आहे ||१६४१|| विजयो नामें अर्जुन विख्यातु| विजयस्वरूप श्रीकृष्णनाथु| श्रियेसीं विजय निश्चितु| तेथेंचि असे ||१६४२|| तयाचिये देशींच्या झाडीं| कल्पतरूतें होडी| न जिणावें कां येवढीं| मायबापें असतां ? ||१६४३|| ते पाषाणही आघवें| चिंतारत्नें कां नोहावे ? | तिये भूमिके कां न यावें| सुवर्णत्व ? ||१६४४|| तयाचिया गांवींचिया| नदी अमृतें वाहाविया| नवल कायि राया| विचारीं पां ||१६४५|| तयाचे बिसाट शब्द| सुखें म्हणों येती वेद| सदेह सच्चिदानंद| कां न व्हावे ते ? ||१६४६|| पैं स्वर्गापवर्ग दोन्ही| इयें पदें जया अधीनीं| तो श्रीकृष्ण बाप जननी| कमळा जया ||१६४७|| म्हणौनि जिया बाहीं उभा| तो लक्ष्मीयेचा वल्लभा| तेथें सर्वसिद्धी स्वयंभा| येर मी नेणें ||१६४८|| आणि समुद्राचा मेघु| उपयोगें तयाहूनि चांगु| तैसा पार्थीं आजि लागु| आहे तये ||१६४९|| कनकत्वदीक्षागुरू| लोहा परिसु होय कीरू| परी जगा पोसिता व्यवहारु| तेंचि जाणें ||१६५०|| येथ गुरुत्वा येतसे उणें| ऐसें झणें कोण्ही म्हणे| वन्हि प्रकाश दीपपणें| प्रकाशी आपुला ||१६५१|| तैसा देवाचिया शक्ती| पार्थु देवासीचि बहुती| परी माने इये स्तुती| गौरव असे ||१६५२|| आणि पुत्रें मी सर्व गुणीं| जिणावा हे बापा शिराणी| तरी ते शारङ्गपाणी| फळा आली ||१६५३|| किंबहुना ऐसा नृपा| पार्थु जालासे कृष्णकृपा| तो जयाकडे साक्षेपा| रीति आहे ||१६५४|| तोचि गा विजयासि ठावो| येथ तुज कोण संदेहो ? | तेथ न ये तरी वावो| विजयोचि होय ||१६५५|| म्हणौनि जेथ श्री तेथें श्रीमंतु| जेथ तो पंडूचा सुतु| तेथ विजय समस्तु| अभ्युदयो तेथ ||१६५६|| जरी व्यासाचेनि साचें| धिरे मन तुमचें| तरी या बोलाचें| ध्रुवचि माना ||१६५७|| जेथ तो श्रीवल्लभु| जेथ भक्तकदंबु| तेथ सुख आणि लाभु| मंगळाचा ||१६५८|| या बोला आन होये| तरी व्यासाचा अंकु न वाहे| ऐसें गाजोनि बाहें| उभिली तेणें ||१६५९|| एवं भारताचा आवांका| आणूनि श्लोका येका| संजयें कुरुनायका| दिधला हातीं ||१६६०|| जैसा नेणों केवढा वन्ही| परी गुणाग्रीं ठेऊनी| आणिजे सूर्याची हानी| निस्तरावया ||१६६१|| तैसें शब्दब्रह्म अनंत| जालें सवालक्ष भारत| भारताचें शतें सात| सर्वस्व गीता ||१६६२|| तयांही सातां शतांचा| इत्यर्थु हा श्लोक शेषींचा| व्यासशिष्य संजयाचा| पूर्णोद्गारु जो ||१६६३|| येणें येकेंचि श्लोकें| राहे तेणें असकें| अविद्याजाताचें निकें| जिंतलें होय ||१६६४|| ऐसें श्लोक शतें सात| गीतेचीं पदें आंगें वाहत| पदें म्हणों कीं परमामृत| गीताकाशींचें ||१६६५|| कीं आत्मराजाचिये सभे| गीते वोडवले हे खांबे| मज श्लोक प्रतिभे| ऐसे येत ||१६६६|| कीं गीता हे सप्तशती| मंत्रप्रतिपाद्य भगवती| मोहमहिषा मुक्ति| आनंदली असे ||१६६७|| म्हणौनि मनें कायें वाचा| जो सेवकु होईल इयेचा| तो स्वानंदासाम्राज्याचा| चक्रवर्ती करी ||१६६८|| कीं अविद्यातिमिररोंखें| श्लोक सूर्यातें पैजा जिंकें| ऐसे प्रकाशिले गीतामिषें| रायें श्रीकृष्णें ||१६६९|| कीं श्लोकाक्षरद्राक्षलता| मांडव जाली आहे गीता| संसारपथश्रांता| विसंवावया ||१६७०|| कीं सभाग्यसंतीं भ्रमरीं| केले ते श्लोककल्हारीं| श्रीकृष्णाख्यसरोवरीं| सासिन्नली हे ||१६७१|| कीं श्लोक नव्हती आन| गमे गीतेचें महिमान| वाखाणिते बंदीजन| उदंड जैसे ||१६७२|| कीं श्लोकांचिया आवारा| सात शतें करूनि सुंदरा| सर्वागम गीतापुरा| वसों आले ||१६७३|| कीं निजकांता आत्मया| आवडी गीता मिळावया| श्लोक नव्हती बाह्या| पसरु का जो ||१६७४|| कीं गीताकमळींचे भृंग| कीं हे गीतासागरतरंग| कीं हरीचे हे तुरंग| गीतारथींचे ||१६७५|| कीं श्लोक सर्वतीर्थ संघातु| आला श्रीगीतेगंगे आंतु| जे अर्जुन नर सिंहस्थु| जाला म्हणौनि ||१६७६|| कीं नोहे हे श्लोकश्रेणी| अचिंत्यचित्तचिंतामणी| कीं निर्विकल्पां लावणी| कल्पतरूंची ||१६७७|| ऐसिया शतें सात श्लोकां| परी आगळा येकयेका| आतां कोण वेगळिका| वानावां पां ||१६७८|| तान्ही आणि पारठी| इया कामधेनूतें दिठी| सूनि जैसिया गोठी| कीजती ना ||१६७९|| दीपा आगिलु मागिलु| सूर्यु धाकुटा वडीलु| अमृतसिंधु खोलु| उथळु कायसा ||१६८०|| तैसे पहिले सरते| श्लोक न म्हणावे गीते| जुनीं नवीं पारिजातें| आहाती काई ? ||१६८१|| आणि श्लोका पाडु नाहीं| हें कीर समर्थु काई| येथ वाच्य वाचकही| भागु न धरी ||१६८२|| जे इये शास्त्रीं येकु| श्रीकृष्णचि वाच्य वाचकु| हें प्रसिद्ध जाणे लोकु| भलताही ||१६८३|| येथें अर्थें तेंचि पाठें| जोडे येवढेनि धटें| वाच्यवाचक येकवटें| साधितें शास्त्र ||१६८४|| म्हणौनि मज कांहीं| समर्थनीं आतां विषय नाहीं| गीता जाणा हे वाङ्ग्मयी| श्रीमूर्ति प्रभूचि ||१६८५|| शास्त्र वाच्यें अर्थें फळे| मग आपण मावळे| तैसें नव्हें हें सगळें| परब्रह्मचि ||१६८६|| कैसा विश्वाचिया कृपा| करूनि महानंद सोपा| अर्जुनव्याजें रूपा| आणिला देवें ||१६८७|| चकोराचेनि निमित्तें| तिन्ही भुवनें संतप्तें| निवविलीं कळांवतें| चंद्रें जेवीं ||१६८८|| कां गौतमाचेनि मिषें| कळिकाळज्वरीतोद्देशें| पाणिढाळु गिरीशें| गंगेंचा केला ||१६८९|| तैसें गीतेचें हें दुभतें| वत्स करूनि पार्थातें| दुभिन्नली जगापुरतें| श्रीकृष्ण गाय ||१६९०|| येथे जीवें जरी नाहाल| तरी हेंचि कीर होआल| नातरी पाठमिषें तिंबाल| जीभचि जरी ||१६९१|| तरी लोह एकें अंशें| झगटलिया परीसें| येरीकडे अपैसें| सुवर्ण होय ||१६९२|| तैसी पाठाची ते वाटी| श्लोकपाद लावा ना जंव वोठीं| तंव ब्रह्मतेची पुष्टी| येईल आंगा ||१६९३|| ना येणेसीं मुख वांकडें| करूनि ठाकाल कानवडें| तरी कानींही घेतां पडे| तेचि लेख ||१६९४|| जे हे श्रवणें पाठें अर्थें| गीता नेदी मोक्षाआरौतें| जैसा समर्थु दाता कोण्हातें| नास्ति न म्हणे ||१६९५|| म्हणौनि जाणतया सवा| गीताचि येकी सेवा| काय कराल आघवां| शास्त्रीं येरीं ||१६९६|| आणि कृष्णार्जुनीं मोकळी| गोठी चावळिली जे निराळी| ते श्रीव्यासें केली करतळीं| घेवों ये ऐसी ||१६९७|| बाळकातें वोरसें| माय जैं जेवऊं बैसे| तैं तया ठाकती तैसे| घांस करी ||१६९८|| कां अफाटा समीरणा| आपैतेंपण शाहाणा| केलें जैसें विंजणा| निर्मूनियां ||१६९९|| तैसें शब्दें जें न लभे| तें घडूनिया अनुष्टुभें| स्त्रीशूद्रादि प्रतिभे| सामाविलें ||१७००|| स्वातीचेनि पाणियें| न होती जरी मोतियें| तरी अंगीं सुंदरांचिये| कां शोभिती तियें ? ||१७०१|| नादु वाद्या न येतां| तरी कां गोचरु होता| | फुलें न होतां घेपता| आमोदु केवीं ? ||१७०२|| गोडीं न होती पक्वान्नें| तरी कां फावती रसनें ? | दर्पणावीण नयनें| नयनु कां दिसे ? ||१७०३|| द्रष्टा श्रीगुरुमूर्ती| न रिगता दृश्यपंथीं| तरी कां ह्या उपास्ती| आकळता तो ? ||१७०४|| तैसें वस्तु जें असंख्यात| तया संख्या शतें सात| न होती तरी कोणा येथ| फावों शकतें ? ||१७०५|| मेघ सिंधूचें पाणी वाहे| तरी जग तयातेंचि पाहे| कां जे उमप ते नोहें| ठाकतें कोण्हा ||१७०६|| आणि वाचा जें न पवे| तें हे श्लोक न होते बरवे| तरी कानें मुखें फावे| ऐसें कां होतें ? ||१७०७|| म्हणौनि श्रीव्यासाचा हा थोरु| विश्वा जाला उपकारु| जे श्रीकृष्ण उक्ती आकारु| ग्रंथाचा केला ||१७०८|| आणि तोचि हा मी आतां| श्रीव्यासाचीं पदें पाहतां पाहतां| आणिला श्रवणपथा| मऱ्हाठिया ||१७०९|| व्यासादिकांचे उन्मेख| राहाटती जेथ साशंक| तेथ मीही रंक येक| चावळी करीं ||१७१०|| परी गीता ईश्वरु भोळा| ले व्यासोक्तिकुसुममाळा| तरी माझिया दुर्वादळा| ना न म्हणे कीं ||१७११|| आणि क्षीरसिंधूचिया तटा| पाणिया येती गजघटा| तेथ काय मुरकुटा| वारिजत असे ? ||१७१२|| पांख फुटे पांखिरूं| नुडे तरी नभींच स्थिरू| गगन आक्रमी सत्वरू| तो गरुडही तेथ ||१७१३|| राजहंसाचें चालणें| भूतळीं जालिया शाहाणें| आणिकें काय कोणें| चालावेचिना ? ||१७१४|| जी आपुलेनि अवकाशें| अगाध जळ घेपे कलशें| चुळीं चूळपण ऐसें| भरूनि न निघे ? ||१७१५|| दिवटीच्या आंगीं थोरी| तरी ते बहु तेज धरी| वाती आपुलिया परी| आणीच कीं ना ? ||१७१६|| जी समुद्राचेनि पैसें| समुद्रीं आकाश आभासे| थिल्लरीं थिल्लराऐसें| बिंबेचि पैं ||१७१७|| तेवीं व्यासादिक महामती| वावरों येती इये ग्रंथीं| मा आम्ही ठाकों हे युक्ति| न मिळे कीर ? ||१७१८|| जिये सागरीं जळचरें| संचरती मंदराकारें| तेथ देखोनि शफरें येरें| पोहों न लाहती ? ||१७१९|| अरुण आंगाजवळिके| म्हणौनि सूर्यातें देखें| मा भूतळींची न देखे| मुंगी काई ? ||१७२०|| यालागीं आम्हां प्राकृतां| देशिकारें बंधें गीता| म्हणणें हें अनुचिता| कारण नोहे ||१७२१|| आणि बापु पुढां जाये| ते घेत पाउलाची सोये| बाळ ये तरी न लाहे| पावों कायी ? ||१७२२|| तैसा व्यासाचा मागोवा घेतु| भाष्यकारातें वाट पुसतु| अयोग्यही मी न पवतु| कें जाईन ? ||१७२३|| आणि पृथ्वी जयाचिया क्षमा| नुबगे स्थावर जंगमा| जयाचेनि अमृतें चंद्रमा| निववी जग ||१७२४|| जयाचें आंगिक असिकें| तेज लाहोनि अर्कें| आंधाराचें सावाइकें| लोटिजत आहे ||१७२५|| समुद्रा जयाचें तोय| तोया जयाचें माधुर्य| माधुर्या सौंदर्य| जयाचेनि ||१७२६|| पवना जयाचें बळ| आकाश जेणें पघळ| ज्ञान जेणें उज्वळ| चक्रवर्ती ||१७२७|| वेद जेणें सुभाष| सुख जेणें सोल्लास| हें असो रूपस| विश्व जेणें ||१७२८|| तो सर्वोपकारी समर्थु| सद्गुरु श्रीनिवृत्तिनाथु| राहाटत असे मजही आंतु| रिघोनियां ||१७२९|| आतां आयती गीता जगीं| मी सांगें मऱ्हाठिया भंगीं| येथ कें विस्मयालागीं| ठावो आहे ||१७३०|| श्रीगुरुचेनि नांवें माती| डोंगरीं जयापासीं होती| तेणें कोळियें त्रिजगतीं| येकवद केली ||१७३१|| चंदनें वेधलीं झाडें| जालीं चंदनाचेनि पाडें| वसिष्ठें मांनिली कीं भांडे| भानूसीं शाटी ||१७३२|| मा मी तव चित्ताथिला| आणि श्रीगुरु ऐसा दादुला| जो दिठीवेनि आपुला| बैसवी पदीं ||१७३३|| आधींचि देखणी दिठी| वरी सूर्य पुरवी पाठी| तैं न दिसे ऐसी गोठी| केंही आहे ? ||१७३४|| म्हणौनि माझें नित्य नवे| श्वासोश्वासही प्रबंध होआवे| श्रीगुरुकृपा काय नोहे| ज्ञानदेवो म्हणे ||१७३५|| याकारणें मियां| श्रीगीतार्थु मऱ्हाठिया| केला लोकां यया| दिठीचा विषो ||१७३६|| परी मऱ्हाठे बोलरंगें| कवळितां पैं गीतांगें| तैं गातयाचेनि पांगें| येकाढतां नोहे ||१७३७|| म्हणौनि गीता गावों म्हणे| तें गाणिवें होती लेणें| ना मोकळे तरी उणें| गीताही आणित ||१७३८|| सुंदर आंगीं लेणें न सूये| तैं तो मोकळा शृंगारु होये| ना लेइलें तरी आहे| तैसें कें उचित ? ||१७३९|| कां मोतियांची जैसी जाती| सोनयाही मान देती| नातरी मानविती| अंगेंचि सडीं ||१७४०|| नाना गुंफिलीं कां मोकळीं| उणीं न होती परीमळीं| वसंतागमींचीं वाटोळीं| मोगरीं जैसीं ||१७४१|| तैसा गाणिवेतें मिरवी| गीतेवीणही रंगु दावीं| तो लाभाचा प्रबंधु ओंवी| केला मियां ||१७४२|| तेणें आबालसुबोधें| ओवीयेचेनि प्रबंधें| ब्रह्मरससुस्वादें| अक्षरें गुंथिलीं ||१७४३|| आतां चंदनाच्या तरुवरीं| परीमळालागीं फुलवरीं| पारुखणें जियापरी| लागेना कीं ||१७४४|| तैसा प्रबंधु हा श्रवणीं| लागतखेंवो समाधि आणी| ऐकिलियाही वाखाणी| काय व्यसन न लवी ? ||१७४५|| पाठ करितां व्याजें| पांडित्यें येती वेषजे| तैं अमृतातें नेणिजे| फावलिया ||१७४६|| तैसेंनि आइतेपणें| कवित्व जालें हें उपेणें| मनन निदिध्यास श्रवणें| जिंतिलें आतां ||१७४७|| हे स्वानंदभोगाची सेल| भलतयसीचि देईल| सर्वेंद्रियां पोषवील| श्रवणाकरवीं ||१७४८|| चंद्रातें आंगवणें| भोगूनि चकोर शाहाणे| परी फावे जैसें चांदिणें| भलतयाही ||१७४९|| तैसें अध्यात्मशास्त्रीं यिये| अंतरंगचि अधिकारिये| परी लोकु वाक्चातुर्यें| होईल सुखिया ||१७५०|| ऐसें श्रीनिवृत्तिनाथाचें| गौरव आहे जी साचें| ग्रंथु नोहे हें कृपेचें| वैभव तिये ||१७५१|| क्षीरसिंधु परिसरीं| शक्तीच्या कर्णकुहरीं| नेणों कैं श्रीत्रिपुरारीं| सांगितलें जें ||१७५२|| तें क्षीरकल्लोळाआंतु| मकरोदरीं गुप्तु| होता तयाचा हातु| पैठें जालें ||१७५३|| तो मत्स्येंद्र सप्तशृंगीं| भग्नावयवा चौरंगी| भेटला कीं तो सर्वांगीं| संपूर्ण जाला ||१७५४|| मग समाधि अव्युत्थया| भोगावी वासना यया| ते मुद्रा श्रीगोरक्षराया| दिधली मीनीं ||१७५५|| तेणें योगाब्जिनीसरोवरु| विषयविध्वंसैकवीरु| तिये पदीं कां सर्वेश्वरु| अभिषेकिला ||१७५६|| मग तिहीं तें शांभव| अद्वयानंदवैभव| संपादिलें सप्रभव| श्रीगहिनीनाथा ||१७५७|| तेणें कळिकळितु भूतां| आला देखोनि निरुता| ते आज्ञा श्रीनिवृत्तिनाथा| दिधली ऐसी ||१७५८|| ना आदिगुरु शंकरा- | लागोनि शिष्यपरंपरा| बोधाचा हा संसरा| जाला जो आमुतें ||१७५९|| तो हा तूं घेऊनि आघवा| कळीं गिळितयां जीवां| सर्व प्रकारीं धांवा| करीं पां वेगीं ||१७६०|| आधींच तंव तो कृपाळु| वरी गुरुआज्ञेचा बोलू| जाला जैसा वर्षाकाळू| खवळणें मेघां ||१७६१|| मग आर्ताचेनि वोरसें| गीतार्थग्रंथनमिसें| वर्षला शांतरसें| तो हा ग्रंथु ||१७६२|| तेथ पुढां मी बापिया| मांडला आर्ती आपुलिया| कीं यासाठीं येवढिया| आणिलों यशा ||१७६३|| एवं गुरुक्रमें लाधलें| समाधिधन जें आपुलें| तें ग्रंथें बोधौनि दिधलें| गोसावी मज ||१७६४|| वांचूनि पढे ना वाची| ना सेवाही जाणें स्वामीची| ऐशिया मज ग्रंथाची| योग्यता कें असे ? ||१७६५|| परी साचचि गुरुनाथें| निमित्त करूनि मातें| प्रबंधव्याजें जगातें| रक्षिलें जाणा ||१७६६|| तऱ्ही पुरोहितगुणें| मी बोलिलों पुरें उणें| तें तुम्हीं माउलीपणें| उपसाहिजो जी ||१७६७|| शब्द कैसा घडिजे| प्रमेयीं कैसें पां चढिजें| अळंकारु म्हणिजे| काय तें नेणें ||१७६८|| सायिखडेयाचें बाहुलें| चालवित्या सूत्राचेनि चाले| तैसा मातें दावीत बोले| स्वामी तो माझा ||१७६९|| यालागीं मी गुणदोष- | विषीं क्षमाविना विशेष| जे मी संजात ग्रंथलों देख| आचार्यें कीं ||१७७०|| आणि तुम्हां संतांचिये सभे| जें उणीवेंसी ठाके उभें| तें पूर्ण नोहे तरी तैं लोभें| तुम्हांसीचि कोपें ||१७७१|| सिवतलियाही परीसें| लोहत्वाचिये अवदसे| न मुकिजे आयसें| तैं कवणा बोलु ||१७७२|| वोहळें हेंचि करावें| जे गंगेचें आंग ठाकावें| मगही गंगा जरी नोहावें| तैं तो काय करी ? ||१७७३|| म्हणौनि भाग्ययोगें बहुवें| तुम्हां संतांचें मी पाये| पातलों आतां कें लाहे| उणें जगीं ||१७७४|| अहो जी माझेनि स्वामी| मज संत जोडुनि तुम्हीं| दिधलेति तेणें सर्वकामीं| परीपूर्ण जालों ||१७७५|| पाहा पां मातें तुम्हां सांगडें| माहेर तेणें सुरवाडें| ग्रंथाचें आळियाडें| सिद्धी गेलें ||१७७६|| जी कनकाचें निखळ| वोतूं येईल भूमंडळ| चिंतारत्नीं कुळाचळ| निर्मूं येती ||१७७७|| सातांही हो सागरांतें| सोपें भरितां अमृतें| दुवाड नोहे तारांतें| चंद्र करितां ||१७७८|| कल्पतरूचे आराम| लावितां नाहीं विषम| परी गीतार्थाचें वर्म| निवडूं न ये ||१७७९|| तो मी येकु सर्व मुका| बोलोनि मऱ्हाठिया भाखा| करी डोळेवरी लोकां| घेवों ये ऐसें जें ||१७८०|| हा ग्रंथसागरु येव्हढा| उतरोनि पैलीकडा| कीर्तिविजयाचा धेंडा| नाचे जो कां ||१७८१|| गीतार्थाचा आवारु| कलशेंसीं महामेरु| रचूनि माजीं श्रीगुरु- | लिंग जें पूजीं ||१७८२|| गीता निष्कपट माय| चुकोनि तान्हें हिंडे जें वाय| तें मायपूता भेटी होय| हा धर्म तुमचा ||१७८३|| तुम्हां सज्जनांचें केलें| आकळुनी जी मी बोलें| ज्ञानदेव म्हणे थेंकुलें| तैसें नोहें ||१७८४|| काय बहु बोलों सकळां| मेळविलों जन्मफळा| ग्रंथसिद्धीचा सोहळा| दाविला जो हा ||१७८५|| मियां जैसजैसिया आशा| केला तुमचा भरंवसा| ते पुरवूनि जी बहुवसा| आणिलों सुखा ||१७८६|| मजलागीं ग्रंथाची स्वामी| दुजीं सृष्टी जे हे केली तुम्ही| तें पाहोनि हांसों आम्हीं| विश्वामित्रातेंही ||१७८७|| जे असोनि त्रिशंकुदोषें| धातयाही आणावें वोसें| तें नासतें कीजे कीं ऐसें| निर्मावें नाहीं ||१७८८|| शंभू उपमन्युचेनि मोहें| क्षीरसागरूही केला आहे| येथ तोही उपमे सरी नोहे| जे विषगर्भ कीं ||१७८९|| अंधकारु निशाचरां| गिळितां सूर्यें चराचरां| धांवा केला तरी खरा| ताउनी कीं तो ||१७९०|| तातलियाही जगाकारणें| चंद्रें वेंचिलें चांदणें| तया सदोषा केवीं म्हणे| सारिखें हें ||१७९१|| म्हणौनि तुम्हीं मज संतीं| ग्रंथरूप जो हा त्रिजगतीं| उपयोग केला तो पुढती| निरुपम जी ||१७९२|| किंबहुना तुमचें केलें| धर्मकीर्तन हें सिद्धी नेलें| येथ माझें जी उरलें| पाईकपण ||१७९३|| आतां विश्वात्मकें देवें| येणें वाग्यज्ञें तोषावें| तोषोनि मज द्यावें| पसायदान हें ||१७९४|| जे खळांची व्यंकटी सांडो| तयां सत्कर्मीं रती वाढो| भूतां परस्परें पडो| मैत्र जीवाचें ||१७९५|| दुरिताचें तिमिर जावो| विश्व स्वधर्मसूर्यें पाहो| जो जें वांछील तो तें लाहो| प्राणिजात ||१७९६|| वर्षत सकळमंगळीं| ईश्वर निष्ठांची मांदियाळी| अनवरत भूमंडळीं| भेटतु या भूतां ||१७९७|| चलां कल्पतरूंचे अरव| चेतना चिंतामणीचें गांव| बोलते जे अर्णव| पीयूषाचे ||१७९८|| चंद्रमे जे अलांछन| मार्तंड जे तापहीन| ते सर्वांही सदा सज्जन| सोयरे होतु ||१७९९|| किंबहुना सर्वसुखीं| पूर्ण होऊनि तिहीं लोकीं| भजिजो आदिपुरुखीं| अखंडित ||१८००|| आणि ग्रंथोपजीविये| विशेषीं लोकीं इयें| दृष्टादृष्ट विजयें| होआवें जी ||१८०१|| तेथ म्हणे श्रीविश्वेशरावो| हा होईल दानपसावो| येणें वरें ज्ञानदेवो| सुखिया झाला ||१८०२|| ऐसें युगीं परी कळीं| आणि महाराष्ट्रमंडळीं| श्रीगोदावरीच्या कूलीं| दक्षिणलिंगीं ||१८०३|| त्रिभुवनैकपवित्र| अनादि पंचक्रोश क्षेत्र| जेथ जगाचें जीवनसूत्र| श्रीमहालया असे ||१८०४|| तेथ यदुवंशविलासु| जो सकळकळानिवासु| न्यायातें पोषी क्षितीशु| श्रीरामचंद्रु ||१८०५|| तेथ महेशान्वयसंभूतें| श्रीनिवृत्तिनाथसुतें| केलें ज्ञानदेवें गीते| देशीकार लेणें ||१८०६|| एवं भारताच्या गांवीं| भीष्मनाम प्रसिद्ध पर्वीं| श्रीकृष्णार्जुनीं बरवी| गोठी जे केली ||१८०७|| जें उपनिषदांचें सार| सर्व शास्त्रांचें माहेर| परमहंसीं सरोवर| सेविजे जें ||१८०८|| तियें गीतेचा कलशु| संपूर्ण हा अष्टादशु| म्हणे निवृत्तिदासु| ज्ञानदेवो ||१८०९|| पुढती पुढती पुढती| इया ग्रंथपुण्यसंपत्ती| सर्वसुखीं सर्वभूतीं| संपूर्ण होईजे ||१८१०|| शके बाराशतें बारोत्तरें| तैं टीका केली ज्ञानेश्वरें| सच्चिदानंदबाबा आदरें| लेखकु जाहला ||१८११|| इति श्री ज्ञानदेवविरचितायां भावार्थदीपिकायां अष्टादशोध्यायः || श्रीशके पंधराशें साहोत्तरीं| तारणनामसंवत्सरीं| एकाजनार्दनें अत्यादरीं| गीता- ज्ञानेश्वरी प्रतिशुद्ध केली ||१|| ग्रंथ पूर्वींच अतिशुद्ध| परी पाठांतरीं शुद्ध अबद्ध| तो शोधूनियां एवंविध| प्रतिशुद्ध सिद्धज्ञानेश्वरी ||२|| नमो ज्ञानेश्वरा निष्कलंका| जयाची गीतेची वाचितां टीका| ज्ञान होय लोकां| अतिभाविकां ग्रंथार्थियां ||३|| बहुकाळपर्वणी गोमटी| भाद्रपदमास कपिलाषष्ठी| प्रतिष्ठानीं गोदातटीं| लेखनकामाठी संपूर्ण जाली ||४|| ज्ञानेश्वरीपाठीं| जो ओंवी करील मऱ्हाटी| तेणें अमृताचे ताटीं| जाण नरोटी ठेविली ||५|| ||श्रीकृष्णार्पणमस्तु || ||शुभं भवतु || ||श्री परमात्मने नमः || ||तत्सत् ब्रह्मार्पणमस्तु ||

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